Thursday, 31 December 2009

फिल्मी वैरी फिल्मी

वो बचपन से ही काफी फ़िल्मी मिजाज़ का था।
बिहार के एक छोटे से गाँव (वैसे गाँव तो बहुत बड़ा है, लेकिन अक्सर लेखक छोटे गाँव का ज़िक्र करते हैं इसलिए...) का रहने वाला संटू (संतोष) हमेशा से फिल्मों से प्रभावित रहा।
स्कूल में था तभी उसने माधुरी दीक्षित को ख़त लिखा है। ख़त में क्या लिखा था ये तो नहीं मालूम जनाब लेकिन जवाब में दीक्षित जी की एक औटोग्राफ की हुई फोटोग्राफ ज़रूर आई। चर्चा पूरे टोले, पूरे गाँव में ही नहीं बाकि आस पास के पाच- दस गावों तक पहुची।
मैंने भी बचपन में गाँव के छोटे थेटर (जहाँ बेंचें लगी हुई थीं और टीवी और वीसीआर पर पिक्चर दिखाई जाती थी) संटू के साथ दो चार पिक्चर देखी होगी। एक याद है मुझे, 'सनम बेवफा'।

खैर फ़िल्मी अंदाज़ और फिल्मों का शौक़ीन संटू आगे चल के सेना में भारती हो गया।
पोस्टिंग हुई जम्मू कश्मीर में। पहरा था वैष्णोदेवी के रास्ते में। भक्तों की सुरक्षा की ज़िम्मेदारी।

एक दिन, एक लड़की माता के दर्शन को चली।
लम्बे रास्ते और लगातार चढ़ाई के कारण रास्ते में ही थकान के कारण गिर पड़ी बेहोशी से।
माता की माया देखिये, भक्त को गिरने नहीं दिया।

पास ही संटू का पहरा था। जैसे ही लड़की गिरने लगी, संटू ने कूद कर उसे अपनी मज़बूत बाँहों का सहारा दिया।
(जैसे की ये सीन स्लो मोसन में हुआ हो और पीछे गाना बज रहा हो.....तुझे...देखा..... तो ये जाना....सनम...)

खैर लड़की को सहारा दिया, संभाल कर कैंप हॉस्पिटल ले गए।
लड़की को होश आया। "कहाँ हूँ में? कौन हैं आप?"
"राहुल, नाम तो सुना ही होगा आपने।"
नहीं नहीं। ऐसी कोई डायलोगबाज़ी नहीं हुई (लेखक की कल्पना)

खैर साहब, इस फ़िल्मी सीन से शुरू हुई एक प्रेम कहानी।
लड़की मुंबई (फिल्म नगरी) की और लड़का बिहारी (फिल्म नगरी की चाहत वाला)।

आज दोनों हप्पिली मैरिड हैं दो नन्हे मुन्नों के साथ।

क्यों है न..... फ़िल्मी वैरी फिल्मी

Tuesday, 15 December 2009

अगले जनम इन्हें बिटिया ही दीजो

बड़कू के लिए रिश्ता आया है। चौबे जी की लड़की का।
बड़ा अच्छा परिवार है। चौबे जी की 4 बीवियों से 6 बेटियां हैं।
और आख़िर में इश्वर की दया से एक बेटा।

पुत्र मोह में क्या क्या पापड़ बेले।
4 विवाह। लोग तो एक सह नहीं पाते हैं। और चौबे जी ने 4 किले फतेह किए।
आज कल की दुनियां में लोग एक बेटी के विवाह के लिए परेशान रहते हैं। चौबे जी 4 को निबटा कर पांचवी का काम तमाम करने निकले हैं। छठ्ठी तक पहुचते पहुचते छठ्ठी का दूध न याद आ जाए।

पुत्र का पता नहीं कौन सा ऐसा मोह था जो चौबे जी ने इतने युद्ध लड़े। वंश के ख़त्म होने का भय या दहीज़ की इक्षा?
खैर जो भी बात रही हो चौबे जी की कथा सुन कर अनायास ही मेरे मन से आवाज़ आई....

अगले जनम भी इन्हें बिटिया ही दीजो........

Monday, 14 December 2009

यमदूत को रोज़ाना चकमा

शाम ढल चुकी थी। अँधेरा घिर रहा है।
ऑफिस से एक बहुराष्ट्रीय कंपनी में काम करने वाला रजनीश अपनी "पक्की मर्द" मोटर साइकिल से घर की ओर निकला।
सड़क के किनारे काफ़ी धूल और मिटटी पड़ी हुई है। गाड़ी फिसलते फिसलते बची।
आगे जाके, सड़क पर तेज़ चलती और गाड़ियों से बचा कर यू टार्न लिया।
सड़क पर अँधेरा है (स्ट्रीट लाइट जैसी चीज़ से अंजान हैं यहाँ के लोग)। सड़क टूटी फूटी। कब कोई गड्ढा सामने आ जाए पता ही न चले। खैर, बचते बचाते मोटर साइकिल आगे बढ़ी।
आगे गोलचक्कर से दायें जाना है। सामने वाले ट्रक को ओवर टेक किया और दाई ओर का सिग्नल दिया। दायें मुड़ने वाले ही थे की बगल में वही ट्रक तेज़ी से आता हुआ दिखा। अगर अभी मुड गए होते तो बस शरीर पर ट्रक के चक्कों के निशान होते।
चलो यमदूत नंबर वन से बचा।

अगले गोलचक्कर से जैसे ही आगे बढ़ी मोटर साइकिल, तो अंधेरे में से अचानक उजागर हुआ एक ठेला। ठेले पर लदी लम्बी लम्बी लोहे की छरें शेषनाग की जीभ की तरह लपलपा रही थीं। अचानक ब्रेक मारा और बच कर निकला।
यमदूत नंबर टू भी फेल।

आगे चले। सड़क पर घुप अँधेरा (पहले बताया था, स्ट्रीट लाइट से अनिभिज्ञ हैं यहाँ के लोग)। सामने से आते वाहनों से चकाचौंध रौशनी (सब के सब हाई बीम में चलते हैं गाड़ी)। आँखें चोंधिया रहीं थी। रजनीश ने सोचा धीरे धीरे सड़क के किनारे में चलता हूँ मोटर साइकिल।
और तभी अंधेरे में सड़क के किनारे प्रकट हुए ट्रक महोदय। पीछे से शिव जी के त्रिशूल की भांति बांस की बल्लियाँ निकल रहीं थी। रीढ़ की नस ने इशारा किया, पैरों और हाथों ने ब्रेक को झट से दबाया और....
यमदूत नंबर थ्री को भी चकमा।

आगे बढ़ी "पक्की मर्द" मोटर साइकिल अपनी "कच्चे मर्द" सवारी को लेकर। अरे ट्रेफिक लाइट फेल। गाड़ियों ने तो अभी चौराहे पर ग़दर मचा दिया होगा। चौराहे पर पहुचते ही अंधेरे में दिखे हमारे मेहनती ट्रेफिक पुलिस। घुप्प अंधेरे में, चौराहे के बीचों बीच, बिना किसी रौशनी या इंडिकेटर के गाड़ियों को इधर उधर जाने का इशारा दे रहे हैं। समय पर घ्यान नहीं जाता तो आज या तो उनकी टक्कर "पक्के मर्द" से हो जाती, या "कच्चे मर्द" का आज चालान कट जाता।
खैर यमदूत नंबर फोर भी कुछ न बिगाड़ सका।

रोज़ इस रास्ते पर चलने का "पक्के मर्द" और "कच्चे मर्द" दोनों को एक्स्पीरिएंस है।

लोग कहते हैं, भाई जब रोज़ इतने खतरे से जूझते हो तो या तो एक कार खरीद लो या फिर सेना में भरती हो जाओ, कम से कम देश के लिए तो शहीद होगे।

साहब इस प्रगतिशील भारत की यही कहानी है। हम पश्चिमी देशों को उत्पादन के मामले में टक्कर दे रहे हैं। वो जो माल बनाते हैं, जो सेवायें वो देते हैं, वही हम उनसे आधे दामों में दे कर उनसे बाज़ी मार रहे हैं।
परिणाम ये है की जो बांस और सरिया उनके यहाँ बंद कंटेनर में ले जाए जाते हैं (ताकि राहगीरों को परेशानी न हो), वो हमारे यहाँ खुले ठेलों या ट्रकों पर जाते हैं और दूसरों के लिए यमदूत का रूप बनते हैं।

रही कार लेने की बात, तो साहब रजनीश बेचारे को दफ्तर से महीने में जो "मूंगफलियाँ" मिलती हैं, उनमें या तो वो अपना पेट ही भर ले या कार में तेल ही डलवा ले।
सुना ही होगा आपने, "नंगा नहाए क्या और निचोरे क्या?"

Wednesday, 9 December 2009

दहेज़ मर्दों के लिए परेशानी

हमारे इलाके में यदि आप लड़की के पिता हैं तो उसके पैदा होते ही आपकी चिंता शुरू हो जाती है। पैसे जोड़ना शुरू कर दिया जाता है। सामन संजोये जाते हैं।
यदि आप अपनी लड़की के लिए अच्छा लड़का चाहते हैं तो आपको उसके लिए अच्छी पेमेंट करने के लिए तैयार रहना चाहिए। अगर आप ऐसा कर सकते हैं तो जैसा चाहें लड़का आपका दामाद बन सकता है।

ये तो साहब पेमेंट की बात थी।
ज़माना बदल रहा है। आज कल पढ़ी लिखी, आउटगोइंग लडकिया होती हैं। तो साहब अगर आपकी लड़की इस तरह की है और आपके पास माल भी है तब तो बेस्ट डील मिल सकती है।
तो आज कल की एवेलेवल लड़कियों और उनके लिए ढूंढें जा रहे लड़कों की थोड़ी जानकारी देन आपको:
1. थोड़ी पढ़ी लिखी लड़की। पैसे वाला बाप:
बढ़िया इंजिनियर, डॉक्टर या ऍम बी ए लड़का ढूंढेंगे और बस पेमेंट कर देंगे।
2. बढ़िया पढ़ी लिखी समझदार लड़की, ठीक ठाक पैसे वाला बाप:
और बेहतर लड़का ढूंढेंगे। काबिल लड़की और पैसे का मिश्रण कर के फाइनल।

अब सिचुएसन यह है कि बेचारा रमेश एक नारमल सा इंजिनियर है और बढ़िया पढ़ी लिखी लड़की चाहता है।
उसके पास पैसे वाले बाप अपनी लड़की के लिए उसको खरीदने आ रहे हैं और जो पढ़े लिखे केंडिडेट हैं उनका दिमाग चढ़ा हुआ है (पढ़ाई + पैसा)। रमेश को दहेज़ से मतलब नहीं है लेकिन लड़की के पिता को तो है।

तो कैसे होगी रमेश कि शादी? जो दहीज़ (पेमेंट पर जैसा चाहें लड़का खरीद सकें) प्रथा लड़कियों के लिए अभिशाप थी, क्या आज एक नारमल लडको को बढ़िया लड़की से शादी करने का हक़ खोना पड़ेगा?
शायद हाँ।

तो हमारे इलाके में आप अगर एक नारमल लड़के के पिता हैं तो आपकी चिंता शुरू हो गई है।

Sunday, 6 December 2009

मेहनत की कीमत २

मेहनत की कीमत क्या है?

सतीश कई सालों से सरकारी कर्मचारी है। मेहनत से काम करता है। खून तो नहीं पर पसीना बहुत बहाता है।
इमानदारी से काम करने की वजह से कई बार तबादले हुए हैं। लेकिन मेहनत और इमानदारी का कीड़ा गया नहीं।
वैसे यह भी मानना पड़ेगा कि सतीश के काम से उसके बॉस खुश भी रहते हैं (उनपर लोड कम पड़ता है)।

15 साल कि नौकरी के बाद सतीश को और पढ़ाई करने के कीड़े ने काट लिया। फोरेन के किसी देश जा कर पी एच डी करना चाहता है। परीक्षाएं दी। सफलता भी मिली।
इंग्लैंड कि एक बड़ी यूनिवर्सिटी के एक मशहूर प्रोफेसर ने सतीश को पूरी स्कालर्शिप देते हुए अपने साथ पे एच डी करने का मौका दिया। गोल्डेन आपर्टूनीटी।
अब बस 2-3 साल कि छुट्टी चाहिए। इतने साल इतनी मेहनत से काम किया। सब लोग काम से खुश रहे हैं। छुट्टी मिलने में परेशानी नहीं होनी चाहिए।
अपलाय किया। अर्जी खारिज।
सतीश के एक और सहकर्मी ने भी इसी तरह के कार्य के लिए छुट्टी कि खातिर अपलाय किया परन्तु उसकी अर्जी मंज़ूर हो गई। ऐसा क्यों? कारण क्या था?

कारण सिम्पल है साहब। सतीश ने काफ़ी मेहनत की है और उसके सहकर्मी ने उतनी नहीं। सतीश काफ़ी काम करता है पर उसका सहकर्मी उतना काम नहीं करता। सतीश की मेहनत से उसके बॉस पर लोड कम रहता है। सतीश के जाने से बॉस को ज्यादा काम करना पड़ेगा पर सहकर्मी के जाने से ऐसा कुछ नहीं होगा।
तो साधारण सी बात है की बॉस सतीश को जाने नहीं दे सकता है क्योंकि फिर उसकी जिंदगी मुश्किल हो जायेगी। सतीश की जिंदगी कैसी भी रहे इससे किसी को क्या वास्ता।

तो साहब क्या कीमत है मेहनत की?
मेहनत की कीमत है "और मेहनत"।

Tuesday, 1 December 2009

तनख्वाह का तमाशा

मीठा है खाना आज पहली तारीख है,
खुश है ज़माना आज पहली तारीख है।

रजनीश को आज न सिर्फ़ तनख्वाह मिलनी है बल्कि उसकी तनख्वाह आज बढ़नी भी है।
पिछले दिनों रजनीश ने काफ़ी मेहनत से काम भी किया है, इसलिए उसे उम्मीद है.......

तनख्वाह बढ़ गई......... 3% का इज़ाफा। आज तो किस्मत खुल गई, पूरे 3% का इज़ाफा।

रजनीश और सुकेश साथ ही काम करते हैं और घनिष्ट मित्र हैं। एक ही ओहदा, एक ही इज्ज़त, एक ही काम।
"क्यों भाई सुकेश कितनी बढ़ी तुम्हारी?"
"भाई 4%"
"क्या???मेरी तो 3% ही।""यह तो नाइंसाफी है।" "मैं चला मालिक से पूछने।"

मालिक से कान्वरसेसन

"सरकार, सुकेश की तनख्वाह 4% बढाई, मेरी 3% ही।""ऐसा क्यों?"
"देखो रजनीश, बात को समझो, सुकेश तुमसे ज्यादा पढ़ा लिखा है। तुमने 2 साल की पढ़ाई की है और उसने उसके बाद 6 महीने और। तो वो ज्यादा पढ़े होने के कारण ज्यादा तनख्वाह कमांड कर सकता है।"
"जैसा आप कहें सरकार।"

रजनीश और सुकेश
"यार सुकेश, तुम्हें वो 6 महीने वाला कोर्स करने का फायदा हो गया। एक ही ओहदा, एक ही इज्ज़त, एक ही काम फिर भी तुम अब ज्यादा तनख्वाह पा सकते हो।"
"यार लेकिन इस हिसाब से तो मुझे नंदिता से ज्यादा मिलना चाहिए। उसकी तो 5% बढ़ी है और मेरी 4 ही। उसने भी तुम्हारी तरह 2 साल ही पढ़ाई की है।"

सुकेश और मालिक
"सरकार, मैंने ज्यादा पढ़ाई की है तो मुझे नंदिता से ज्यादा तनख्वाह मिलनी चाहिए, उसने मुझसे कम पढ़ाई की है।"
"देखो सुकेश, बात को समझो, नंदिता का काम का एक्सपीरिएंस तुमसे ज्यादा है। उसने तुमसे 6 महीने ज्यादा काम किया है।"
"लेकिन मेरी 6 महीने ज्यादा पढ़ाई......."
"नहीं बात एक्सपीरिएंस की है।"
"टीक है मालिक, जैसा आप कहें।"

तो इस प्रकार भाइयों और बहनों, आज की बहुराष्ट्रीय कंपनियों का मोटो है
"काम में नो कॉमप्रोमाइज, और दाम में हेरा फेरी।"




Saturday, 28 November 2009

ज्ञान और अज्ञान का कानवरसेसन

इस लेख में नए ज़माने की नई भाषा का बहुत प्रयोग हुआ है। समझने की कोशिश करें।

अज्ञान: हाँ मैं पुरूष नहीं हूँ

ज्ञान: महा पुरूष हो
अज्ञान: हाँ येही तो बनना होता है जीवन मे। बन गया में।
मोक्ष
ज्ञान: नही गुरु के बिना मोक्ष नही होता।
अज्ञान: यह तो तुम्हारी सोच है न।
ज्ञान: और मोक्ष प्राप्त करने का एक ही रास्ता है जो सतगुरु से होके गुज़रता है।
नही मेरी सोच नही है।
आदि काल से यही होता है।
this is a rule which creator has made and even he has not ever defied this rule whenever he incarnated on this earth (यह नियम विधाता ने बनाया है और उसने भी इसका उलंघन नहीं किया है जब जब उसने अवतार लिया है।)
अज्ञान: all right (ठीक है)
ज्ञान: रामायण में लिखा है
जाने बिन न हुए परतीति, बिन परतीति हुए नही प्रीती, बिन प्रीती नही भक्ति द्रिधई
किसी से प्यार करने के लिए सबसे पहले ज़रूरी है उससे देखना
एंड मोक्ष है तो merge in the source of origin
पर जब तक यही नही पता की origin क्या है merge कैसे होंगे
अज्ञान: ठीक है
तूने अज्ञानी मनुष्य की कहानी सुनी है
ज्ञान: मतलब
अज्ञान: अज्ञानी मनुष्य
उसकी कहानी है एक
ज्ञान: वो कौन है
सुनाओ
btw (by the way) यह है कौन
अज्ञान: एक बच्चा पैदा हुआ
है एक
ज्ञान: ओके
कौन एक
अज्ञान: स्कूल गया
वहां खूब पढ़ाई की
khela kooda
ज्ञान: ok
अज्ञान: लोग क्या करते हैं दुनिया में क्या होता है उससे कोई मतलब नहीं
अपने में मस्त
बड़ा हुआ
कॉलेज गया
खूब मौज मस्ती
पार्टी एडवेंचर
ज्ञान: hmmm
अज्ञान: बड़ा हुआ नौकरी की
अच्छे पैसे कमाए
खूब मौज मस्ती
पार्टी एडवेंचर
उसके बाद
बुड्ढा हुआ
मर गया
बिना किसी टेंशन के
ज्ञान: hmmmm
अज्ञान: कि कहाँ से आया कहाँ गया
तो कैसी रही उसकी लाइफ?
ज्ञान: like an escapist
because he also feel कि कुछ missing hai वो भी खुशी चाहता है।
उसे भी peace चाहिए
पर उसने क्या किया जब भी उसे peace चाहिए वो क्लब में गया दोस्तों के साथ पार्टी कि
और बिना चिंता के मर ही नही सकता
अज्ञान: तू assume कर रही है
ज्ञान: हमेशा किसी चीज़ कि तलाश में वो इन चीज़ों में indulge होता रहा
अज्ञान: क्यों नहीं मर सकता
ज्ञान: but he never tried to find the real source of peace
अज्ञान: ये तो ज़बरदस्ती है न
नहीं है उसे कोई तलाश
ज्ञान: dat u will knw when u die
अज्ञान: ok
ज्ञान: इस संसार में अगर सबसे बड़ा डर कोई है तो वो है मौत का
अज्ञान: ok
ज्ञान: ये किसकी कहानी है
अज्ञान: ये अज्ञानी मनुष्य की कहानी है
ज्ञान: और अज्ञानी मनुष्य को कोई चिंता नही होती
who sed this
अज्ञान: ऐसा ही है अज्ञानी मनुष्य
ज्ञान: ok
अज्ञान: उसको जनम मृत्यु की चिंता नही है
ज्ञान: thats ur philoshphy coz u see ppl at a distance
बहार से सब खुश लगते हैं पास जाके देखो अन्दर से हर इंसान किलसा हुआ है
अज्ञान: हाँ
ज्ञान: हाँ तो क्यूँ किलसे हैं लोग?
अगर उन्हें कोई चिंता नही है
जनम मृत्यु की चिंता नही है
y r ppl running in a rat race
who asked dem to run
अज्ञान: येही तो basic है
ज्ञानी: y does अज्ञानी मनुष्य doesnt think twice playing with any ones feeling
अज्ञानी: अज्ञानी मनुष्य यह नहीं सोचता
ज्ञानी: who sed yeh basic hai
अज्ञानी: कि वो यहाँ क्यों है
यह क्यों कर रहा है
ज्ञानी: and if its basic
अज्ञानी: वो बस जीता है
ज्ञानी: wat drives this basic
u question 100 times and 100 things before buying a meager camera
अज्ञानी: हाँ
ज्ञानी: but no one wants to question y we are doing all dis
अज्ञानी: येही तो
ज्ञानी: ppl feel dat they are just getting driven
अज्ञानी: यह अगर question कर दे वो
तो वोह ज्ञानी बन जाएगा
ज्ञानी: but they dont want to come out it
अज्ञानी: लेकिन वोह तो अज्ञानी है
ज्ञानी: if some one comes and tells them कि ज़िन्दगी कुछ और है इससे बेहतर है
तो वो उस solution को try करना ही नही चाहते
अज्ञानी तब होता है जब उससे पता न चले
अज्ञानी वो नही होता जिसके आगे कोई रोज़ सच का ढोल पीते पर वो फ़िर भी कान में रोई दाल के पढ़ा रहे
अज्ञानी: येही तो अज्ञानी का main character है
ज्ञानी: today the state of world is dat we dont want to awake to reality we dont want to even try a diff viewpoint
वो अज्ञानी नही है
वो मूढ़ बुद्धि है
एंड अंत समय में उसका पछताना निश्चित है
its the higest state of माया
कि सच जान के भी हम आत्मा कि आवाज़ को दबाना चाहते हैं
अज्ञानी: ठीक है ठीक है
मान गए अज्ञानी actually मंद बुद्धि है
ज्ञानी: हम materialism में इतने ग्रसित हैं कि आँख खोलके देखना ही नही चाहते कि सचाई क्या है
अज्ञानी: और उसको पछताना पक्का है
ज्ञानी: our criteria of truth is what is practised by masses
but i can write it on a stamp paper for this अज्ञानी man
कि यह दुनिया की भेड़ चल है सच से विमुख
और आज यह सब जो भी होरहा है यह मार काट, emotions का हनन, breach of all relationships is all coz of the chaos within us....we are so caught in rule of our ego that we dont even feel bad after doing the lowly acts
अज्ञानता के अंधेरे से निकालने वो भगवन ख़ुद इस कीचड में आता है
पर माया का ऐसा परदा है और ego इतना जादा है की हम अपनी गन्दगी को भी उस इश्वर को नही देना चाहते
और उसकी selflessness देखो वो कह रहा है चिला के की अपना बूझ मुझे दे दो में बदले में तुम्हे अता प्रेम और पूर्ण आनंद दे दूंगा पर we silly humans/ animals want to treasure our odds
अज्ञानी: समझ गया
ज्ञानी: i dont knw samjhe ke nahi
अगर समझ गए तो atleast open ur own eyes
अपनी जिद्द पर आधे रहने से कुछ नही होता
अज्ञानी: आज के लिए इतना काफ़ी है
ज्ञानी: तुम्हे जो यह सब बातें बताई जा रही है doesnt leave u an अज्ञानी
समझी गई कितना समझे
बहुत कृपा कर ली उसने तुमपे
और वो करता ही जा रहा है
पर मुझे बहुत दुःख है की तुम उस उलटे बर्तन की तरह पड़े हो जो बारिश होने पे भी खली पढ़ा है (बेहतरीन उपमा)
der is nothing to loose u will gain and gain and gain so please open ur eyes and see wat u r getting grab it its the most precious thing in this universe
अज्ञानी: उल्टा बर्तन
वाह
बहुत बढ़िया use किया उपमा अलंकार का
ज्ञानी: बढ़िया तभी है अगर उसका मतलब समझ जाओ

समझने वाले समझ गए, ना समझे वो अनारी हैं।

Thursday, 26 November 2009

भगवान् का कन्सट्रकसन

कैसे बने भगवान्? किसने बनाया?

सैकरो साल पुराना मन्दिर। पत्थर को तराश कर बनाया गया।
यहीं आस पास बसते हैं वो कलाकार जिनके पूर्वजों ने ये मन्दिर बनाया था।
बेहतरीन कलाकार। बेहतरीन मूर्तियाँ।

कंसलटेंट साहब कुछ मूर्तियाँ खरीदने गए एक कलाकार की दुकान में । एक से एक मूर्तियाँ।
अलग अलग रैक पर सजे अलग अलग भगवान्।
इधर एक लाइन से गणेश जी हैं। उधर एक के ऊपर एक रखे बुद्ध भगवान्।
मनोरम दृश्य।

"वो वाली मूर्ती दिखाइएगा भाई साहब।"
"अरे! अरे! ध्यान से, हनुमान जी गिरे......"
और देखते ही देखते ऊपर के रैक से गिर कर हनुमान जी टूट गए। गए डस्ट बिन में।

इन सारी मूर्तियों में एक भगवान् जो सबसे ज्यादा हैं वो हैं शिव जी। चारो ओर शिव लिंगों की भरमार है।
कोई हथेली में समां जाए, तो कोई ४ लोग मिल कर भी न उठा सकें। हर प्रकार के; बड़े छोटे।

"अरे भाई ज़रा लाइट जला देना।" "उधर ऊपर स्विच है।"
लड़का पहुँच नहीं पा रहा था स्विच तक। वहीँ नीचे रखे बड़े शिव लिंग पर चढ़ा और ऑन कर दिया स्विच।

अरे ये क्या, शिव लिंग पर चढ़ कर, भगवान् पर चढ़ कर।

न न, ऐसा न सोचिये। अभी ये भगवान् नहीं बने हैं। अभी बस मूर्ती हैं।
अभी को इन्हें चूज़ कर के किसी मन्दिर में स्थापित करने ले जाया जाएगा।
फिर पंडितजी इनकी प्राण प्रतिष्ठा करेंगे।
तब होगा इश्वर का पूर्ण निर्माण। अभी तो अधूरे हैं।

तो भाई साहब कनक्लूजन ये है की, इश्वर का निर्माण जिस प्रक्रिया से होता है, वो दो कदम की है।
पहला कदम: कलाकार एक कोरे पत्थर को तराश कर अपनी खूबसूरत, स्मार्ट, हैन्डसम मूर्ती का रूप देता है।
दूसरा कदम: मन्दिर में स्थापना और पूजनीय पंडितजी के द्वारा उनकी प्राण प्रतिष्ठा।

एक साधारण दो कदम की प्रक्रिया। ख़ुद ट्राय करें और फर्क देखें।

Wednesday, 25 November 2009

मेहनत की कीमत

रजनीश एक बहुराष्ट्रिय कम्पनी में काम करता है। भारत की, भारत में, अपनी फील्ड में एक अग्रिणी कम्पनी।
हर आम आदमी की तरह वो भी आगे बढ़ना चाहता है।
पैसे, इज्ज़त, ओहदा। वही जो हर (नॉर्मल) इंसान चाहता है।

मेहनत से पसीना बहाता है। फील्ड वर्क पर ऐसी जगह जाना जहाँ लोग जाना नहीं चाहते हैं (सिक्यूरिटी इस्सुज़)।
गर्मी हो या सर्दी, धुप हो या छाव, सूखा हो या बरसात। कभी दौड़ भाग करने में एक बार भी नहीं सोचा।
थ्योरी: मेहनत से इंसान सब कुछ पा सकता है।

रजनीश को मिली उसकी मेहनत की कीमत:
ओहदा: साल दर साल वही जो पहले था
(लोग रजनीश के बाद आए, उसके ऊपर काम किया, गए। और लोग आए, उसके ऊपर काम किया, गए। रजनीश ऊपर न उठ सका, आज भी वहीं है।)
इज्ज़त: वही जो तब थी जब काम शुरू किया था, या शायद उससे कम।
पैसा: मूंगफलियाँ (अंग्रेज़ी में कहते हैं पीनटस)।

हर बार जब रजनीश काम करके ऑफिस लौटता है, तो मन में सोचता है," इस बार बड़ी मेहनत से काम किया है, शायद अब आगे बढ़ने का मौका मिले।"
परन्तु हर बार काम में कुछ कमी, कुछ गलती निकल ही आती है। आज काम भी वहीं है, और रजनीश भी।

शायद गलती रजनीश की ही है। शायद वो काम ठीक से नहीं कर पाता है। शायद आगे बढ़ने के लिए और इम्प्रूवमेंट की ज़रूरत है।

क्नक्लूजन: मेहनत की क्या कीमत है? कोई कीमत नहीं हैं।
कीमत है परिणाम की।
चाहे आपकी गलती हो न हो (पूरी या आधी), अगर काम सही नहीं तो दाम सही नहीं।


Saturday, 21 November 2009

जनम मृत्यु

जिले का हेडक्वार्टर।
कांसलटेंट साहब कुछ कृषि से सम्बंधित डाटा की तलाश में भटक रहे थे।

कृषि विभाग वाले कृषि मेला को लेकर बहुत बिजी चल रहे हैं। तो साहब आप जाकर सांख्यिकी (स्टेटिसटिक्स) वालों से संपर्क करें।

एक अंधेरे कोठरी। छत पर मकरी के जाले। एक दो पुराने बल्ब लटक रहें हैं छत से लंबे वायर्स के द्वारा। एक बल्ब जल भी रहा है। कमरे में 8-10 पुरानी अलमारियां। अलमारियों से फाइलें और अन्य सरकारी कागज़ झांक रहे हैं। अलमारियों के ऊपर उन्ही फाइलो और कागजों के पहाड़। ऐसी ही हालत कमरे में पड़ी मेजों की भी है।

दो बाबु बैठे हैं। पान को मुह में दबाने ही वाले हैं कि कांसलटेंट साहब ने टोका....
"साहब ये कृषि से सम्बंधित कुछ डाटा चाहिए था।"
"क्या चाहिए?"
"जी यही कुछ उपज, आछादन इत्यादि के बारे में।"
"तो यह सब तो कृषि विभाग में मिलेगा।"
"जी वो तो आज कल बिजी है। कृषि मेला चल रहा है न।"
"अच्छा तो यहाँ तो मिल जाएगा लेकिन....."
(कमबख्त यह लेकिन हमेशा आ जाता है)
"लेकिन ये काम सिया बाबु के जिम्मे है।"
"जी कब तक आएंगे वो।"
"देखिये, कुछ कह नहीं सकते हैं।" "आप ऐसा कीजिये, नगर पालिका में, जनम मृत्यु में चले जाइए।"
"वहां मिलेंगे क्या वो?"
"हाँ उनपे अतिरिक्त भार है, जनम मृत्यु का। सो, देख लीजिये एक बार।""वहां पूछ लीजिये गा, सिया राम सिंह (सिया बाबु) को।"

चल पड़े कांसलटेंट साहब नगर पालिका में जनम मृत्यु की ओर।

नगर पालिका के गेट में एंट्री। बायीं ओर मसाले बेचने वाला। आगे सब्जी की मिनी मंडी लगी हुई है।
आलू, प्याज़, टमाटर, बैगन से सज़ा हुआ है नगर पालिका। साथ ही इन सब से निकली गंदगी। आलू के छिलके, गोभी के पत्ते, प्याज़ के छिलके चार चाँद लगा रहे हैं।
इन सब के बीच में पानी और कीचड़ जमा हुआ।
किसी तरह बचते बचाते, फिसलते संभलते आगे बढे।

नाला बह रहा है। सामने एक टूटा फूटा दो महला घर सा दिख रहा है।
"अरे भाई! ये जनम मृत्यु......?"
"सामने.... ऊपर चले जाइए।"

सकरी सी सीढ़ी। ऊपर पहुचे।
"ये, जनम मृत्यु...?"
"उधर।"

जनम मृत्यु के एक छोटे से कमरे में बैठे एक बाबु। साक्षात चित्रगुप्त। जन्म मृत्यु का हिसाब चल रहा है।
"जी सिया बाबु.....?"
"कहिये, हम ही है।"

पते की बात ये है की जिस विकट जगह पर जनम मृत्यु का पंजीकरण करने वाले ये संकट मोचन, सिया बाबु बैठे हुए हैं, मैं शर्त के साथ कहता हूँ की अगर कोई जनम का पंजीकरण करवाने आएगा तो वापस जाते जाते मृत्यु का पंजीकरण अवश्य करवाता जाएगा।

इश्वर हर पंजीकरण करवाने वाले और उसकी आत्मा को शान्ति दे।

Friday, 20 November 2009

तेरी परवाह करता हूँ मैं माँ

छोटा सा गाँव, एक छोटा सा घर।
खपरे से बनी छत, मिटटी से बनी दीवारें।

शाम ढल चुकी है। ठंढ का मौसम।

बरामदे में लालटेन की मद्धम रौशनी में बैठी माँ स्वेटर बुन रही है।

छोटे कूदता फांदता हुआ खेल कर लौटा।
झटाक से कूद कर माँ की गोद में।
वो आराम, ठंढ से बचाओ, सुरक्षा का एहसास और कहाँ?

माँ कहती है: चलो उठो खाना बनाना है।
छोटे: नहीं!!!!
माँ: ऐसे बैठे रहेंगे तो खाना कौन बनाएगा?
नन्हाँ छोटे: माँ मेरी शादी करवा दो।
फिर मेरी बीवी खाना बनाएगी और तुम मुझे गोद में ले के बैठना.......


Thursday, 19 November 2009

प्रेसर जो न करवाए

आज कल लोग प्रेसर में क्या क्या नहीं करते?

चिंटू के प्रेसर में न चाहते हुए भी पापा को उसे सनेमा दिखाने ले जाना पड़ता है।
पापा के प्रेसर में संगीत की शिक्षा प्राप्त करने की इक्षा रकने वाले चिंटू को इंजिनियर बनना पड़ता है।

लोगों के प्रेसर में नेताजी को संसद रोकना पड़ता है।
नेताजी के गुंडों के प्रेसर में आके लोगों को नेताजी को वोट देना पड़ता है।

शराब के प्रेसर में आके जीतेंद्र को गाड़ी तेज़ चलानी पड़ती है।
गाड़ी के प्रेसर में आके शराब से धुत्त जीतेंद्र की सड़क पे जान चली जाती है।

बॉस के प्रेसर में आके राहुल को टेंशन हो जाता है।
टेंशन के प्रेसर में आके राहुल का बॉस से झगड़ा हो जाता है।

लड़के वालों के प्रेसर में आके लड़की वालों को ज़मीन बेच के दहेज़ पूरा करना पड़ता है।
लड़की के प्रेसर में आके लड़के को अपने घर वालों से अलग होना पड़ता है।


साहब इतना कुछ करते हैं लोग प्रेसर में.......

और हम बेचारे तो बस प्रेसर में, सड़क के किनारे, दीवाल के पीछे, पेड़ के बगल में
सुसु ही तो करते हैं.......

साहब प्रेसर होता ही है ऐसा। क्या क्या नहीं करवाता है आदमी से।

Wednesday, 18 November 2009

किसान और बैल

गाँव का एक घर। घर में ही है पोस्ट ऑफिस गाँव का।
कुर्सियाँ लगी हुई हैं। खटिया बिची हुई थी।
बेदा बाबु (वेद प्रकाश शर्मा) और कंसलटेंट साहब बैठे हुए हैं। और ग्रामीण भी हैं।

बेदा बाबु: 'सर ई खेती से तो इतना परेशान हैं। एगो ट्रक्टर भाड़ा पे चलवाते हैं तो साल में उससे भी खेती से जादे पैसा बच जाता है। खेती में तो कुछ कामे नै चल रहा है।"
कंसलटेंट साहब: "लेकिन बेदा बाबु, सब लोग ट्रक्टर चलवाने लगेगा त खेती कौन करेगा?"

बेदा बाबु: "एगो बात बताते हैं सर।"

"खेत में मेहनत के करता है?
बैल।
उपज जो धान का होता है ऊ खाते हैं हमलोग।
अ बेचारा बैल को त बाजरा भी नै मिलता है खाने के लिए। उसको मिलता है भुस्सा।

बैल कोनो दिन काम करने से मन कर दिया त?
लेकिन बैल ऐसा कर सकता है?

इहे हाल है किसान का सर।"

Monday, 16 November 2009

औरत और भैंस

राल रंग की सूमो गाड़ी तेज़ी से चली जा रही थी।
गाड़ी मैं दो प्राणी।
एक ड्राईवर
और दूसरे थे एक कंसलटेंट साहब।

आपकी जानकारी के लिए बता दूँ की ये जो कंसलटेंट होते हैं, ये एक ख़ास प्रजाति के लोग होते हैं।
कंसलटेंट होता है एक्सपर्ट।
किस चीज़ का?
साहब कंसलटेंट का काम होता है राय देना। और यह लोग हर चीज़ पर राय दे सकते हैं।
कंसलटेंट को हर चीज़ की जानकारी होती है और वो हर चीज़ पर राय दे सकता है।

तो जो कंसलटेंट साहब सवार थे, वो थे भी बड़े पुराने आदमी। उनकी जानकारी के दायरे में कृषि, पर्यावरण, उर्जा, अर्थव्यवस्था से ले कर बाकि जितनी चीज़ें गिन सकते हैं, आप वो सब चीज़ें थी।
तो आप तो अंदाजा लगा ही सकते हैं उनके ज्ञान का और उनकी कही बात के वज़न का।

तो इस तेज़ चलती गाड़ी के सामने अचाना सड़क पार करने को एक महिला दौड़ी। ड्राईवर दूर से ही होर्न बजा रहा था लेकिन महिला जान देने पर उतारू थी।
बमुश्किल एक्सिडेंट होने से बचा।

ड्राईवर ने कंसलटेंट साहब के सामने अपने सही होने का तर्क दिया।
"साहब में तो दूर से ही होर्न बजाता आ रहा था।"

कंसलटेंट साहब
"अरे बेवकूफ! गलती तुम्हारी ही तो है। तुम्हें पता नहीं है की औरत और भैंस पर होर्न का कोई असर नै पड़ता।"
"औरत और भैंस को होर्न मारोगे तो वो और तुम्हारी ही तरफ़ भागेगी।"
"तो ध्यान से चलाओ। गलती तुम्हारी है।"

तो साहब बच के रहें, 'औरत और भैंस' से।

Thursday, 12 November 2009

नज़रिए का नजराना

हिंदुस्तान
बोध गया:
मेरी समझ से ये है, बोध + गया।
मतलब गया, जहाँ बोध की प्राप्ति हुई।
इम्पोर्टेंट गया है। यहाँ बोध की प्राप्ति होती है। या यहाँ बोध की प्राप्ति हुई थी।
बुद्ध गया के कारण हुए। यहाँ उन्हें ज्ञान की प्राप्ति हुई थी।

श्रीलंका
बुद्ध गया (बोध गया को श्रीलंका में इसी नाम से बुलाते हैं):
मेरी समझ से, बुद्ध + गया।
मतलब बुद्ध का गया।
इम्पोर्टेंट हैं बुद्ध। गया का नाम बुद्ध से है। बुद्ध के कारण गया है।

मेरे हिसाब से दोनों शायद सही हैं। बस नज़रिए का फर्क है। अपना हिसाब है और अपनी किताब है।


नोट: ये मेरे कानफ्यूजड दिमाग की कानफ्यूजन भरी उपज है। कृपया बुरा न मानें।



Wednesday, 11 November 2009

औकाद क्या है तुम्हारी

छोटी सी नदी। सूखी हुई।
उसपर छोटा सा एक पुल।

थोड़ा पानी बचा हुआ है नदी में। सकरी सी एक धारा बह रही है।

पुल के ठीक नीचे, धारा में पुआल के कुछ पुलिंदे पड़े हुए हैं।
एक आकार सा है पुलिंदों से बना हुआ।

एक छोटा सा सर।
एक छरहरा बदन।
दो पैर।
दो हाथ।

शायद कोई पुतला रहा होगा।

नदी में पड़ा हुआ है। ज़रूर किसी भगवान् का रहा होगा जिनका विसर्जन हो गया।

यह पुआल का पुलिंदा कुछ दिन पहले दुर्गा माँ, काली माँ, सरस्वती माँ, गणेश भगवान्, शिवजी इत्यादि इत्यादि में से कोई रहा होगा कुछ दिन पहले।
कुछ दिन पहले, दिन रात इसकी पूजा हो रही होगी।
फूल, धुप, दीप, अगरबत्ती से इसे खुश करने की कोशिश की जा रही होगी।
फल, मिठाइयों इत्यादि के चढावे चढ़ रहे होंगे।

और आज।
एक छोटी सी सूखी नदी के, एक छोटे से पुल के नीचे, एक छोटी सी धारा में पड़ा पुआल का एक पुलिंदा मात्र है।

यह तो हश्र हो गया है उसका जो कुछ दिन पहले भगवान् था,
तो
औकाद क्या है तुम्हारी.........और मेरी।

Tuesday, 10 November 2009

माँ सा एहसास: होस्टेस आंटी

एयर इंडिया में सफर (हिन्दी और अंग्रेज़ी दोनों में) करने की एक ही अच्छी बात है।
बढ़िया खाना।

और अगर आपको घर के बाहर होते हुए भी बढ़िया खाना मिले तो क्या बात।
और सोने पे सुहागा, खाना मिले माँ के हाथों से।

बस यही तो यू एस पी है एयर इंडिया की।
बढ़िया खाना माँ तो न सही, लेकिन उनसे बहुत ही करीबी दिखने वाली और व्यवहार करने वाली 'आंटियों'(चाचियों) से मिले। बस मन मोह ले जाती हैं यह अदा।

सेक्टर: दिल्ली से पटना
कैरियर: एयर इंडिया

पटना तक बहुत बार सफर किया है मैंने। कई बार हमारे जैसे ही देसी लोग मिलते हैं हवाई जहाज में। थोड़े सोफेस्टिकेटेड मैनर्स की कमी वाले। इन चीज़ों की जानकारी से अनिभिज्ञ हैं थोड़े।

पैसेंजर एयर होस्टेस से (पानी चाहिए था) : स्स्स्स्स्स्स्स्स्स स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स पानी मिलेगा क्या?
आंटी: नहीं! स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स नहीं बोलते। 'एक्सक्यूज़ मी' बोलते हैं।

खैर! पानी तो पिला ही दिया आंटी ने उन साहब को (बोतल और बातों दोनों से)

माँ सा एहसास,
आपके लिए ख़ास।
आपका ही अपना, एयर इंडिया।

Monday, 9 November 2009

राष्ट्र और महाराष्ट्र

भारत क्या है?

एक राष्ट्र।

और राष्ट्र में है महाराष्ट्र।

ऐसा कैसे हो सकता है?

महा - राष्ट्र तो ज़ाहिर सी बात है राष्ट्र से बड़ा होगा।

तभी तो भइया राष्ट्र भाषा का इतना विरोध।
छोटे से राष्ट्र की छोटी सी भाषा की क्या औकाद, महा - राष्ट्र के सामने।


Saturday, 7 November 2009

भावी प्रधानमन्त्री

पटना से बेगूसराय की ओर।

रास्ता एहसास दिला रहा है कि अभी कुछ दिन पहले एक बड़ी पार्टी की रैली हुई थी।
रा ज द (राज्य जालदल में)

जगह जगह बैनर, पोस्टर। नेताओं के स्वागत में पंक्तियाँ।
फोटो लगे हुए थे महान नेता श्री भालू प्रशाद बाअदब और उनकी वाईफ मलाई देवी की।

लेकिन यह सब तो आम बात है।
ख़ास बात जो मैंने देखि वो बस एक लाइन में लिखी हुई थी। एक बैनर...

"स्वागत है भावी प्रधानमन्त्री जी श्री भालू प्रशाद बाअदब का।"
'भावी प्रधानमन्त्री?' यह कब, कैसे कहाँ हुआ?
इनोवेशन की हद है साहब।

खैर एक पार्टी जिसके लोक सभा में सिर्फ़ 3 ऍम पी हों वो अपने नेता को प्रधानमन्त्री बना सके या न, सोचने का पैसे थोड़े लगेगा। तो सोचें ज़रूर सोचें।

हम भी स्वागत करते हैं महान नेता और भावी प्रधानमन्त्री जी का।

Tuesday, 3 November 2009

मेरी वाली

बिहार का कॉलेज:

एक लड़के को एक लड़की पसंद आ गई।
लड़की को पता नहीं।

एक दूसरा लड़के ने लड़की को लाइन मारी (कैसे मारते हैं मत पूछियेगा, कोई डेफिनिशन नहीं है अक्चुअली)।

पहले लड़के ने पकड़ के उसे बहुत पीटा।
"साले! 'मेरी वाली' को लाइन मारता है।"

सवाल: क्यों भइया? लड़की आपकी बपौती है क्या? आपके लड़की को देखते ही एन्गेजमेंट हो गई है उससे आपकी?

मिलता जुलता किस्सा:
तुम जो कर रहे हो वो सही नहीं है। ऐसे भगवान् अप्रसन्न हो जायेंगे।
तुम जीवन सही नहीं जी रहे हो। ये तरीका नहीं है भगवान् को पाने का।
मैं जो बता रहा हूँ वो रास्ता सही है। उसपर चलो।

सवाल: क्यों भइया? धर्म और इश्वर आपकी बपौती हैं क्या?

आज कल रोज़ धर्म और इश्वर के एक ठेकेदार पैदा हो रहे हैं।

नोट:मुझे ज्ञान नहीं है कि इस केस में लड़की (इश्वर) को पता है या बस लड़के (ठेकेदार) को वो पसंद आ गई है तो वो बाकी लाइन मारने वालो (अपने तरीक से अराधना करने वाले) को पीट रहा है।




Friday, 30 October 2009

ई मेल का ऑपरेशन

एक ई मेल आया:
विश्व की एक बहुत बड़ी कंपनी अपना पैसा लोगों के साथ बाँटना चाहती है। अगर आप इस ई मेल को आगे भेजेंगे तो हर एक ई मेल के लिए आपको ४०० डालर मिलेंगे।

बस फिर क्या, पूरी एड्रेस बुक खोली और सबको भेज दिया ई मेल।
विचार: ई मेल आगे भेजने में मेरा कोई पैसा तो लग नहीं रहा है। तो क्यों न चांस ले लूँ?
जिसको मेरी तरफ़ से ई मेल मिलेगा उसे कोई परेशानी नहीं होनी चाहिए मेरी तरफ़ से मिले एक ई मेल से। (जिसे अंग्रेज़ी में 'विन विन सिचुएशन' कहते हैं)
और फिर अगर ऐसा कोई चांस बनता है तो और लोग भी फायदा उठाएं उसका (ऐसा नहीं सोचा था मैंने)।

खैर इस 2 सेकंड के विचार पर और कुछ बिना सोचे समझे मैंने लोगों को भेज दिया ई मेल।

कहाँ सोचा था मैंने कि ये ई मेल मेरे गले का कांटा बन जाएगा।

कहाँ मैं और कहाँ मेरे दोस्त। मेरे कुछ समझदार और बुद्धिमान दोस्त हैं। हॉस्टल में उनके लिए एक ख़ास शब्द इस्तेमाल करते थे, 'इंटेल'।

तो मेरे इन इंटेल दोस्तों ने मुझ पर मेहेरबानी कर के अपना समय लगाया और इस ऐ मेल के बारे में तरह तरह के जवाब भेजे।

इंटेल 1: यारों, तुमने उस ऐ-मेल में कंपनी के निशान पर ध्यान नहीं दिया? (शायद निशान ग़लत रहा होगा)।
बारीकी पर ध्यान देन जनाब। कितना ख्याल है मेरे मित्र को।

इंटेल 2: यारों, अगर यह लोग 400 डालर इस दुनिया के हर एक आदमी को देने लग गए तो यह जो संख्या आयेगे वोह तो पूरे विश्व के सकल घरेलू उत्पाद से भी ज्यादा हो जाएगा। इस तरह कि चीज़ पर विश्वास कैसे कर सकते हो? यह तो इम्पासिबल है।
कैलकुलेशन और ऍप्लिकेशन पर ध्यान देन जनाब। वैसे मेरे पास इतनी अक्ल होती तो मैं इस ई मेल को आगे नहीं बढाता बल्कि डिलीट कर देता।

इंटेल 3: क्यों बे, अपनी मेहनतt पर भरोसा नहीं है तुझे?
अब इसका विश्लेषण क्या करूँ मैं। साफ़ झलक रहा है कि मेरे यह मित्र कितना मेरा उत्साह वर्धन करने कि कोशिश कर रहे हैं ओज पूर्ण भाषा का प्रयोग कर के।

तो दोस्तों आप देख ही रहे हैं कि कितनी बारीकी रखते हैं मेरे मित्र। मैं जितना समय नहीं व्यतीत कर पाया इस ई मेल पर, मेरे दोस्तों ने उससे कहीं ज्यादा समय लगाकर चिंतन और विश्लेषण किया इसका।
इसके लिए उनका हार्दिक धन्यवाद।

वैसे मुझे इन जवाबों के बाद ये भी एहसास हुआ कि मेरे इस ई मेल को आगे बढ़ाने से कई लोगों को परेशानी भी हुई है। इसके लिए मैं तहे दिल से छमा याचना करता हूँ उनसे। इस परेशानी के बारे मैं ही सोच कर मैंने छमा याचना का ई मेल नहीं किया कि और ई मेल भेजने से कहीं उनके परेशानी न बढ़ जाए। मेरी इस चुप्पी को ही कृपया मेरे छमा याचना समझें।

आशा है कि ई मेल आने जाने का सिलसिला चलता रहे और साथ ही ऑपरेशन का भी.......

Thursday, 29 October 2009

चाटा स्काई

पार्ट 1: मैच का मज़ा
अरे भाई भारत मैच हार गया।
क्या बात कर रहे हो? मैं नहीं मानता। तुम्हें कैसे पता की हार गया?
मैच तो नहीं देख पाया यार लेकिन समाचार में देखा और रास्ते में लोगों से सुना।

सुनी सुनाई बात। हुंह! मैं नहीं मानता। मेरे 'चाटा स्काई' पर मैच रिकॉर्ड हो रखा है। मैं तो उस पर मैच के मज़े लूँगा।

मज़े कैसे भाई। मैच का फ़ैसला तो हो चुका है। रिजल्ट आउट होने के बाद क्या मज़ा?

हुह! तुम्हें क्या मालूम। तुम्हारे पास तो नहीं है 'चाटा स्काई'।

पार्ट 2: सिनेमा रिकॉर्ड कर के देखो
बड़ा हीरो: अरे यार! जब टीवी पर अच्छी पिक्चर आ रही होती है तब ही बीवी को डिनर के लिए बहार जाना होता है।
आम आदमी: हाँ यार! मेरे साथ भी ऐसा होता है।
बड़ा हीरो: लेकिन मैं तो डिनर से वापस आके पिक्चर देख लूँगा क्योंकि वो मेरी 'चाटा स्काई' पर रिकॉर्ड हो रही है।
आम आदमी: लेकिन मैं तो डिनर से पहले ही देख चुका हूँ 50 रुपये की डीवीडी भारे पर लाके। कौन वोह रिकॉर्डिंग को एड्स(प्रचार) के साथ देखे। 3 घंटे की पिक्चर रिकॉर्ड कर के 6 घंटे मैं।
बड़ा हीरो: हुह! तुम्हें क्या मालूम। तुम्हारे पास तो नहीं है 'चाटा स्काई'।

पार्ट 3: फैमली डिनर
बड़ा हीरो: हमारी फैमली कुछ अलग है। हमलोग एक दूसरे के साथ डिनर करते हैं न कि टीवी के साथ।
आम आदमी: वह भाई! कमाल। वोह कैसे? फिर अपने दिन के कोटे का एन्टरटेनमेंट कैसे पूरा करते हो।
बड़ा हीरो: अरे यार! वोह हो रहे हैं न हमारे फेवरेट सीरियल रिकॉर्ड हमारे 'चाटा स्काई' पर।
आम आदमी: यार ये मेट्रो जीवन में आदमी 8 बजे काम से घर वापस आता है। फ्रेश होके 9 बजे खाने पीने बैठता है। उसके बाद अगर 9-11 देखने वाले सीरियल एक घंटे खाना खा के 10-१२ रिकॉर्ड कर के देखे तो सूयेगा कब और 8 बजे शुरू होने वाले ऑफिस के लिए पहुचेगा कब।
खैर ये सब छोड़ो, यह बताओ कि अगर खाते वक्त टीवी नहीं देखते तो फैमली डिनर में करते क्या हो?
बड़ा हीरो: बिना एक दूसरे से बातें किए चुप चाप खाना खाते हैं। टीवी पर देखा नहीं क्या तुमने?
हुह! तुम्हें क्या मालूम। तुम्हारे पास तो नहीं है 'चाटा स्काई'।

वह रे नए जमाने के सपूत 'चाटा स्काई'।
हम 'शेयर टेल डिजिटल' वाले (बन्दर) क्या जाने 'चाटा स्काई' (अदरक) का स्वाद।

Wednesday, 28 October 2009

पंजे से गंजा

कुछ दिन पहले....

शाम में ऑफिस से निकला। सामने सरसराता हुआ एक गाड़ियों का काफिला निकला।
गाड़ियों पर झंडे, पोस्टर और न जाने क्या क्या। हवा को चीरती हुई लाउडस्पीकर की आवाज़।

दरअसल उन दिनों हरियाणा में चुनाव का प्रचार चल रहा था।

सामने से निकलते काफिले के लाउडस्पीकर से बार बार आवाज़ आ रही थी।
"पंजे के निशान पर मुहर लगाए,
कां....स को विजय बनाएं"

मैंने पहले सुना था कि कां....स का चुनाव चिन्ह हाथ है।
लोग कहते थे
"कां....स का हाथ, गरीबों के साथ।"

पर ये पंजा।
फिर तो एक ही पासीबीलीटी है।
"कां....स का पंजा, गरीबों को करे गंजा।"

सिविल सर्विस का चमत्कार

अजब दुनिया का गजब स्टाइल है।

राकेश हो गया "राकेश जी"

किशोरी हो गया "किशोरी जी"

बेचारा राम तो राम ही रह गया, "राम जी" न हो पाया।

राकेश और किशोरी पहले "तुम" हुआ करते थे। अब वोह "आप" हो गए हैं।

बेचारा राम तो "तुम" ही रह गया।

हुआ क्या?

कुछ ख़ास नहीं साहब।
राकेश, किशोरी और राम एक ही कालोनी के रहने वाले हैं। साथ ही स्कूल में थे।

आज राकेश और किशोरी आई ए एस और आई पी एस अफसर हैं।
बेचारा राम तो बस इंजिनियर ही बन पाया। कमाता राकेश और किशोरी से शायद ज्यादा है लेकिन बेचारा न "जी" बन पाया न ही "आप"।

वैसे आपको बता दूँ की यह आप कहने वाले लोग कोई बहार के नहीं हैं। अपने ही घर के लोग, रिश्तेदार, दोस्त, मुहीम, जो पहले "तुम" कहा करते थे वोह अब "आप का प्रयोग करते हैं। मैं भी .........

अजब दुनिया तेरा गजब स्टाइल

Saturday, 24 October 2009

बंगाली बाबु

"हेलो !!!!!"

"बंगाली बाबू?"

"किनसे बात करनी है आपको?"

"बंगाली बाबू से। "

"भाई साहब, यहाँ बंगाली बाबू तो नहीं बिहारी बाबू रहते हैं।"

"अरे जहाँ बिहारी बाबू हैं वहीँ तो बंगाली बाबू होंगे।"

"लेकिन यहाँ तो कोई बंगाली बाबू नहीं रहते हैं।"

"लेकिन नम्बर तो यही है।"

"लेकिन यहाँ रहते तो नहीं हैं कोई बंगाली बाबू।"

"देखिये भाई साहब, हमने नम्बर सही लगाया है, आप हमें भुलावे मैं डालने की कोशिश न करें।"

नोट: कभी कभी रोंग नम्बर पर भी बात करने का मज़ा आ जाता है, ख़ास कर जब भाषा का प्रयोग इतना उत्तम हो।

Thursday, 8 October 2009

आप तो लड़के हैं

एक ऑटो रिक्शा।
सवारी की सीट पर एक लड़का, दो लड़कियां।

तीनो बातों मैं मशगूल।

"अरे अरे!! भइया यहीं तो बाएँ मोड़ना था।"

ऑटो का ब्रेक तेज़ी से लगा। मोड़ पीछे छूट गया।

ऑटो वाला गुस्से मैं पीछे देखते हुए।
"आप लोग पहले नहीं बता सकते थे क्या? एक्सीडेंट हो जाता तो?"

तीनों यात्री
"अब बता दिया ना भइया। आराम से घुमा लो।"

झल्लाया हुआ ऑटो वाला, लड़के से
"भाई साहब, आप लो लड़के हैं।"
"आप तो समझ सकते हैं।"

नोट: महिलायें वाहन चालन के बारे मैं कम जानती हैं, एक सार्वभौमिक सत्य है।
ऐसा ऑटो वाला समझता था।




Sunday, 4 October 2009

हैप्पी बर्थडे पापाजी

अभी कुछ दिनों पहले 'पापाजी' का जन्मदिन था। आप लोग शायद उन्हें राष्ट्रपिता के नाम से जानते होंगे।

क्या कहा आपने? कैसी रही बर्थडे पार्टी?
भाई साहब मेरे लिए तो पार्टी मस्त रही। दिन भर 'पापाजी को याद किया, उनके रास्ते पर चला।
और मुझे यकीन है की मेरे बाकी भाइयों ने भी येही किया होगा।

क्या कहा आपने? लेकिन किया क्या?
बताता हूँ।

सुबह देर से उठा। जैसा 'पापाजी' कहते थे। (भाई साहब छुट्टी किस लिए होती है)
१२ बजे तक ब्रश किया और फिर नाश्ता, बिना नहाए। जैसा 'पापाजी' कहते थे।
फिर कंप्यूटर पर अंग्रेज़ी सनेमा देखा। पता नहीं 'पापाजी' ऐसा कहते थे या नहीं।
और फिर दोपहर मैं सो गया। शाम तक कोई काम नहीं किया। जैसा 'पापाजी' कहते थे।
रात मैं घर पर नॉन भेज बना था। उसका आनंद लिया। जैसा की 'पापाजी' कहते थे।

तो जैसा मैंने कहा था साहब। सुबह से शाम था बस उनकी बताई राह पर चला।

और मुझे यकीन सा है की मेरे बाकी भाइयों ने भी ऐसा ही किया होगा। (भाई साहब आख़िर छुट्टी होती किस लिए है)

जय हो 'पापाजी' की। 'पापाजी' अमर रहें।

*वैसे सुना है हमारे नेताओं ने भी बड़े अच्छे से बर्थडे मनाया पापाजी का। लेकिन उनकी बात अगली बार।

Thursday, 1 October 2009

दुखी हूँ एक जैसे नोटों को देख कर

१० का नोट। राष्ट्रपिता
२० का नोट। राष्ट्रपिता
५० का नोट। राष्ट्रपिता
१०० का नोट। राष्ट्रपिता
५०० का नोट। राष्ट्रपिता
१००० का नोट। राष्ट्रपिता

परेशान हूँ मैं।
नहीं नहीं, राष्ट्रपिता से नहीं।
नोटों से।

थोड़ा मोनोटोनस सा हो गया है।

इससे भी ज्यादा, शायद जिस देश का ये किस्सा है, वहां महान लोगों की कमी नही है।
ऐसे लोगों की कमी नही है जिन्होंने राष्ट्रनिर्माण में गहरा योगदान किया है।

तो फिर परेशानी क्या है? क्यों नहीं मौका मिल सकता है और लोगों को?

अमेरिका के नोट बड़ा प्रभावित करते हैं। अलग अलग नोटों पर अलग अलग लोगों की तस्वीरें।
२ फायदे हैं। एक तो काफ़ी लोगों को समान मिला है। और काफ़ी ज्ञानवर्धक हैं।
उस देश के इतिहास मैं महत्वपूर्ण योगदान देने वाले लोगों की जानकारी।

इस देश मैं भी थोडी वेराएटी मिले तो मज़ा आ जाए।

जय हो राष्ट्रपिता की।

Sunday, 27 September 2009

वह रे पॉलिटिक्स

"जब हवाई जहाज में जाएँ तो आम श्रेणी में ही सफर करें"
आज कल यह होड़ लगी है जन सेवकों (माने हमारे नेता ) में।

किसी कोई होटल का आरामदायक कमरा खाली करने का आदेश मिल रहा है। कोई विमान में आम श्रेणी में सफर कर रहा है।

एक महाशय तो अपनी पुरी सुरक्षा की बटालियन ले कर ट्रेन में सफर करने लग गए। ये तक न सोचा की आम आदमी के सफर पर इसका क्या असर पड़ेगा? क्या स्टेशन पर औरों को परेशानी होगी? ज़रूरत क्या है सोचने की, हम तो आम बन गए, आम आदमी के साथ हो गए। तो फिर आम आदमी को अब और क्या परेशानी?

जिंदगी भर जो लोग ख़ास रहे हैं। जिंदगी भर जो लोग ख़ास रहेंगे।
जिन्होंने आज तक ख़ास श्रेणी में सफर किया है विमानों में, ख़ास हेलीकॉप्टर मंगवाए हैं अपनी यात्रा के लिए।
वो आज आम बनने की होड़ में लगे हुए हैं।

वह रे पॉलिटिक्स! क्या क्या न करवाए तू?

Sunday, 20 September 2009

ईट हैपेन्स ओनली इन इंडिया

हिंदुस्तान माडर्न हो रहा है। चीज़ें बदल रही हैं।
हम पस्चिमी सभ्यता को आजमा रहे हैं, अपना रहे हैं।

इन सब का एक बहुत बड़ा उदाहरण मिलता है आज कल के मॉलों में।
नए तरेह की दुकानें, नए परिधान। नए रूप रंग, नए ढंग।

एक मॉल में सुबह सुबह। दुकाने अभी अपनी उंघती आंखों से पलकें उठा ही रही हैं।
ऊपर शीशे की छत से चन कर आती रौशनी मॉल के वातानुकूलित वातावरण को हल्का हल्का ठंढा कर रही है।

बेंच पर बैठा एक लड़के के कानों में आई पॉड की झंकार गूँज रही है।
एक खूबसूरत लड़की उसकी ओर आरही है।

लड़की आकर बगल में बठी। हाथ में एक डायरी जैसी चीज़ है।
डायरी खुली।
अरे! हनुमान चालीसा।
लड़की मंत्र बुदबुदा रही है। जल्दी जल्दी चालीसा ख़त्म करी है।

डायरी बैग के अन्दर गई। बैग से मोबाइल निकला।
कान में ईयरफोन लगाया। आगे बढ़ गई लड़की।

यही है असली भारत। नई चीज़ को भी अपनाया और पुराना भी नहीं गवाया।

ईट हप्पेंस ओनली इन इंडिया।


Saturday, 19 September 2009

गाय, भैंस और हमारे नेताजी

सुना है आज कल इंसानों की तुलना गायों से की जा रही है।
इससे भी बड़ी बात, कुछ नेता ऐसा कर रहे हैं और कुछ नेताओं को इसका बुरा लग रहा है।

हमारी भोली गौ माता। उनसे तुलना तो हमारे लिए इज्ज़त की बात है।
वैसे जिन्होंने ये तुलना की उनका इंसानों की बेचारे बेजुबान जानवर से तुलना करने की मंशा बिल्कुल नहीं रही होगी।

मैं बस यह सोच रहा था की ये नेता इंसान और गाय की तुलना को भूल यह क्यों नहीं सोच रहे की आम आदमी की परेशानियां और देश की समस्याओं की बारे मैं विचार करने और उनके समाधान निकालने की अपेक्षा उनसे रखना "भैंस के आगे बीन बजाने" जैसा हो गया है।

जी हाँ नेता जी। आप ही से कहा। आप तो बिल्कुल भैंस की तरह हो गए हैं।

"भैंस के आगे बीन बजाये (आम जनता), भैंस खड़ी पगुराए (नेताजी जिनकी भी सरकार खड़ी होती है)।

तो कृपया गाय को भूलें और अपने भैंस के अंदाज़ को बदलें। आम जनता न सही आप ही गाय बन जाएँ जो कम से कम देश के लोगों को दूध (उन्नती) दे।

Friday, 18 September 2009

बी डी ओ साहब

पतली सड़क। सामने से आता ट्रक।
सड़क के एक तरफ़ एक टाटा सूमो लगी हुई है। लाल बत्ती के साथ।
लिखा है।
नगर विकास पदाधिकारी।

ट्रैफिक रुक गया। आने जाने की जगह नहीं है।
"अरे भाई कोई पदाधिकारी साहब की गाड़ी को हटाओ।"

गाड़ी के पास बैठे आदमी से पूछने पर वो गाड़ी के यात्रियों के बारे में अनिभिग्यता प्रकट करता है।
"अरे भाई आइसे कैसे काम चलेगा।" "कब तक रुके रहेंगे हम।"

बी डी ओ साहब आते हैं। अनिभिग्यता प्रकट करने वाला व्यक्ति ड्राईवर की सीट में बैठता है।

यही हैं हमारे विकास पदाधिकारी।

वकील साहब, "अरे साहब, यह प्रखंड विकास पदाधिकारी नहीं हैं। ये हैं प्रखंड विनाश पदाधिकारी।"

Saturday, 12 September 2009

बरखा बहार आई.....

नाले में बाढ़ आई.....

गुरु का गाँव, मिलिनिअम सिटी। अजब तेरे जलवे अजब तेरा स्टाइल।

पिछले दो दिन मस्त हुई बारिश। गर्मी से मिली निजाद। मौसम हुआ खुशगवार।
पिछले दो दिन अस्त व्यस्त हुई जिंदगी।

घर से निकला ऑफिस जाने को। दो पहिया वहां। भारी बारिश।
लाल बत्ती पर भयंकर जल जमाव है। गाडियां तैर रही हैं। नजाने कैसे पार करूँगा यह नदी।
हिलते डुलते, तैरते उबरते, गिरते उठते।
पार हो गया।
पानी जमने का कारन। ऊपर से पानी बहुत आ रहा है। लेकिन नीचे का क्या?
लाल बत्ती के पास वाला मैन होल तो मस्त फवारा बना हुआ है। सरकार को येहाँ सजावट करवाने की ज़रूरत नही है।
काले पानी का फवारा है, काले पानी की नदी है। लोग खूब मज़ा कर सकते हैं।

खैर किसी तरह नदी पार तो हुई। अब आराम से ऑफिस पहुच जाऊँगा।

अगला चौक। एक और नदी। आज तो जिनगी भर की जो साहसिक खेलों की कसार रही थी उसको पूरी कर ही लूँगा। एक बार और दोपहिये को नदी में घुसा दिया।
हिलते डुलते, तैरते उबरते, गिरते उठते।
पार हो गया।

चलो आज तो गंगा नहा लिया। अब तो पहुच जाऊं ऑफिस आराम से।
गंगा। गंगा तो अब नहाओ बेटा। ऑफिस के बहार तो सही में गंगा बह रही है।
"मेरा ऑफिस है उस पार, में इस पार।"
"मेरे मांजी (मेरी दो पहिया पल्सर), ले चल पार, अब की बार।"

एक बार और कान घुमाया दोपहिया का।
हिलते डुलते, तैरते उबरते, गिरते उठते।
पार हो गया।

सच में गंगा (गन्दा) नहा लिया बेटा।
जूतों में पानी। चड्डी में पानी। गीले मौजे।बैठो गिले। एसी में। बदन से पानी बहाते हुए।

यही हैं मज़े मिलिनिअम सिटी में रहने के। मुफ्त के फवारे। मुफ्त की तैराकी। साहसिक खेलों का मज़ा रोजाना की जिंदगी में। और क्या चाहिए?

Friday, 4 September 2009

वर्दी वाला गुंडा

अरे हमारी कालोनी के बहार इतनी सुरक्षा। बढ़िया है यह तो।
"रुक भाई रुक।" "गाड़ी के कागज़ निकाल।"
"ये लो साहब।"
"इंश्योरेंस दिखा।"
"साहब वो तो घर पर है।"
"गड्डी साइड में लगा।"
"बात क्या है साहब, में तो यहीं रहता हूँ।"
"रहता है तो क्या? अभी तो बहार से आ रहा है।"
"पोल्लूशन का कागज़ है।"
"साहब वोह तो............"
पुलिस वाला चुप खड़ा हो जाता है।
"बताओ साहब इसका क्या करें?"
"करना क्या है, चालान कटेगा और क्या?"
"अरे साहब! चालान मत काटो, गरीब आदमी हूँ।"
"गरीब आदमी है! 60 हज़ार की गड्डी चालाता है और गरीब।"

एक तरफ़ खड़े अपने सहकर्मी के पास चला जाता है। चालक दोपहिया खड़ी कर के उनके पास जाता है।
"चल हेल्मेट उतार।
चालाक हेल्मेट उतारता है।

"साहब मैं तो यहीं रहता हूँ।"
"कहाँ रहता है?"
"साहब '२५३३' क में।"
"कितने टाइम से रह रहा है?"
"साहब एक डेढ़ साल से।"
"कहाँ का रहने वाला है?"
"साहब बिहार का।"
"ऑफिस कहाँ है?"
"साहब सेक्टर 33 में।"
"क्या काम करता है?"
"साहब कन्सल्तैंत हूँ।"

गाड़ी के कागज़ पकड़ाते हुए जाने का इशारा करता है।

चालक चैन की साँस लेते हुए......

दो आम हवालदार। जिनका काम उस जगह की सुरक्षा करना है। ये कहानी थी उनकी।


Thursday, 3 September 2009

पुलिसिया बाबा

पुलिस मैं बड़े अफसर। कितने लोगों की जान बचाई।
कितने जुर्म रोके। कितने लोगों की जिंदगी बेहतर की।
कितनी सेवा की देश की।

यह हैं हमारे संजय कुमार सिंह।
बड़े ही गुड लुकिंग। बड़े ही स्मार्ट। एक "पर्फेक्ट मैन।"

आज भी उतने ही स्मार्ट हैं। उतने ही गुड लुकिंग हैं। और अब तो "पर्फेक्टेस्ट मैन" हैं।

बदला क्या है?
पुलिसिया स्मार्ट कपड़ों की जगह भगवा वस्त्र धारण कर रखा है।
रोज़ शवे करने वाला आदमी लम्बी दाढ़ी के साथ है।
पॉलिश किए हुए चमकते जूते पहनने वाला लकड़ी की खरावं पहने हुए है।
मांस, मछली और मदिरा के माहोल मे रहने वाला आज सिर्फ़ सात्विक भोजन करता है और अक्सर व्रत भी।
भटके हुए लोगों को डंडे से ठीक करने वाला आज अपनी बातों से उनको सही रास्ते पर ला रहा है।

ये हैं हमारे "पुलिसिया बाबा"।
लोग मानते हैं की बाबा लोग पुराने ज़माने के विचारों वाले होते हैं। उन्हें अंग्रेज़ी नहीं आती है। वोह पुराने ख्यालों के होते हैं। कई जो कुछ नहीं कर पाते जीवन मे वो बाबा बन जाते हैं।
यह हैं हमारे नए बाबा। माडर्न। अंग्रेज़ी मैन पारंगत। हिन्दी मैन पारंगत। और भी कई भाषाओँ का ज्ञान रखते हैं।
और भी कई काम कर सकते थे जीवन मैन। एक सफल जीवन वैतीत कर रहे थे।
लेकिन इश्वर का बुलावा आया और जो ज्ञान मिला इस्वर से वोह अमृत औरों को पिलाने निकल पड़े सब छोड़ चाद के।

वह रे मेरे हिन्दुस्तान। तेरे जलवे निराले।

आज बाबा का बड़ा आश्रम है, २०० एकर का। और भी कई आश्रम हैं कई जगहों पर।
बड़े बड़े नेता, अफसर आते हैं सर झुकाने, चढावा चढाने। आश्रम मैन एन केन प्रकारेण गाड़ियां हैं, हलिकाप्टर है। लाखों का चढावा चढ़ता है रोज़।
क्या ये सब हो पता अगर पुलिस की नौकरी मे होते। पता नही।

वह रे मेरे हिंदुस्तान तेरे जलवे निराले।

Tuesday, 1 September 2009

ख्वातून का खौफ

याद है जब तुम साइकिल सीख रहे थे। बिना सहारे के उतर नहीं पाते थे।
सामने से ख्वातून आ रही थी। उन्होंने तुम्हें रुकने को कहा था। तुम रुके नहीं क्योंकि वह कोई सहारा नहीं था रुकने के लिए।
"हाँ ख्वातून ने रुकने का इशारा किया था। सहारा होता वहां रुकने के लिए तब भी नहीं रुकता मैं। सर नहीं पकवाना था मुझे उनसे।"

ये तो बस एक ट्रेलर है ख्वातून के जलवों का। उनके खौफ से लोगों ने क्या क्या नहीं किया।


"ख्वातून आ रही हैं! ख्वातून आ रही हैं!"
"अगर देख लिया मुझे तो बहुत पकाएँगी।"
"क्या करूँ? क्या करूँ?"
"दूसरे कमरे में छुप जाती हूँ।"
"अरे नहीं मौसी, वो तो सारे कमरे घूम घूम के देखती हैं।" "बच नहीं पायियेगा ख्वातून की पहुच से।"
"ख्वातून के हाथ बहुत लंबे हैं।"

"आईडिया! यह जो ड्रम रखा हुआ है इसमें छुप जाती हूँ। तुम लोग किसी तरह चलता करना ख्वातून को।"
"ठीक है मौसी।"

ख्वातून आती हैं। सारे कमरों में घूमती हैं। मौसी ड्रम के अन्दर।
"जल्दी जाएँ ख्वातून तो निकलूं। दम घुट रहा है यहाँ।"

ख्वातून कमरे में आती हैं जहाँ ड्रम रखा है। वहां आराम से बैठ जाती हैं।
"हे भगवान्, आज तो गई जान दम घुटने से।"

बच्चे किसी तरेह ख्वातून का ध्यान बता कर भेजते हैं।
मौसी बहार आती है।

"जान बची तो लाखो पाये,
ख्वातून से भगवान् बचाए।"

Saturday, 29 August 2009

बंगले में भय

सुबह के 4.15 बजे। आधी रात तक ठंढ। अभी अचानक गर्मी। गला सूखता हुआ।
पानी चाहिए।
बिजली नहीं है। घुप अंधेरे मैं नीचे जा के पानी पीना पड़ेगा।
रोज़ तो बिस्तर के पास पानी रख के सोते थे। आज कैसे भूल गए।
क्या यह इशारा है किसी तरह का?

हाथ मैं बंधा रक्षा सूत्र ढीला हो गया है। क्या ये इशारा है किसी तरह का?
सोने की कोशिश करता हूँ। अभी नीचे नहीं जाऊँगा।

5 मिनट, 10 मिनट, नींद नहीं आ रही है। पानी चाहिए।
नीचे जाना पड़ेगा। अंधेरे में। अकेले।

उठता हूँ। अरे यह क्या, रक्षा सूत्र तकिये में दब के खुल रहा है।
क्या ये इशारा है किसी तरह का?

नहीं नहीं। जाना पड़ेगा। पीना पड़ेगा। सोना पड़ेगा।

इतने बड़े बंगले में जब इतने कम लोग होते हैं तो डर तो लगता ही है.......



Thursday, 27 August 2009

लाल शर्ट का चक्कर

एक शहर से दूसरे शहर। चिकनी सड़क।
अरे यह क्या! सामने बीच सड़क पर पुलिस की टुकडी।
रुकने का इशारा।
"क्या इन्हें लिफ्ट चाहिए।"

इंसपेक्टर: "हाँ सर, यह फलां फलां नम्बर की सूमो गाड़ी है।""जी जी, लाल शर्ट पहने हुए है।"
ड्राईवर: "क्या बात है इंसपेक्टर साब, क्यों रोका है हमें?"
इंसपेक्टर: "जी सर, लाल शर्ट अ उसपे छीत है उजला रंग का."
हवालदार: "सर धारी।"
इंसपेक्टर: "जी जी सर, लाल शर्ट अ उजला धरी है उसपर।"
ड्राईवर: "क्या बात है सर।"
इंसपेक्टर: "गाड़ी साइड में लगाए।"

गाड़ी साइड में।इंसपेक्टर साहब फ़ोन पर। इंतज़ार। २० मिनट बाद।
इंसपेक्टर: "जा सकते हैं आपलोग।"
ड्राईवर: "बात क्या हो गई साहब?"
इंसपेक्टर: "कुछ नहीं। जाइए।"

बिना कारण रुके। बिना कारण चले।

वह रे मेरे लाल शर्ट......

Monday, 24 August 2009

हमारा मिट्ठू बहादुर

६-७ साल की उमर। १-२ कक्षा के बच्चे।
साइंस की क्लास। पढ़ाई का विषय: किस प्राणी के घर को क्या कहता हैं।
"होर्सेस लिव इन स्तबल ।" "लायन लिव्स इन डेन।" (horses live in stable. lion lives in den.)

" मिट्ठू बहादुर, तुम बताओ, वेयर दू यू लिव?" (where do you live)
"आई लिव इन नेस्ट।" (i live in nest)

दूसरी क्लास।
"बच्चों, सब अपने अपने बारे में १० लाइन लिखो।"

मिट्ठू बहादुर। क्या लिखूँ। क्या लिखूँ......
सामने वाली लड़की की कॉपी में देख के लिख लेता हूँ।
लड़की की कॉपी: माय नेम इज स्वीटी। (my name is sweety)
मिट्ठू बहादुर की कॉपी: माय नेम इज स्वीटी। (my name is sweety)

ये था हमारा मिट्ठू बहादुर


कहाँ गया छोटे

भूमिका: गर्मी का मौसम। बिजली की लोड शेडिंग हो रही है। ठंढी ज़मीन पर सोना अच्छा लगता है।

पापा दोपहर मैं ऑफिस से वापस आए।
"चलो भाई खाना लगाओ। छोटे कहाँ हैं। सब साथ मैं खाना खाते हैं।"
"किसी दूसरे कमरे में सोया होगा। देखते हें।"
"नहीं तो, घर पर नहीं है। किसी दोस्त के यहाँ खेल रहा होगा ज़रूर।"
"बड़े ज़रा देख के आओ। बुला लाना खाने के लिए।"

"नहीं किसी दोस्त के यहाँ भी नहीं हैं।"
"गया कहाँ।"

पड़ोसियों और दोस्तों का आवागमन।
"मिला क्या छोटे।"
"नहीं, कुछ समझ में नहीं आ रहा है कहाँ गया।"

रिश्तेदारों के यहाँ फ़ोन।
"नहीं तो, यहाँ तो नहीं आया।"

गर्मी के मौसम में। भरी दोपहरी में। दोस्त, रिश्तेदार ढूँढने निकल पड़े। जिसने जो पहन रखा था उसी में शामिल। बनियानों में दोस्त। लुंगियों में रिश्तेदार।

कहाँ गया छोटे।

"अरे ये काले शीशों वाली कार।" कहीं किसी ने अपहरण तो नहीं कर लिया। पास पड़े इस पत्थर से इसका शीशा फोड़ कर देखता हूँ।"

कहीं कुछ पता नहीं चल रहा है। कहाँ गया छोटे।

"कुछ दिनों पहले छोटे कह रहा था की इतनी गर्मी मियन बिस्तर के नीचे बड़ी ठंढ रहती है। वहां सोने में बड़ा मज़ा आएगा। कहीं वहीँ तो....."
"अरे! ये रहा। काफ़ी अन्दर की तरफ़ सोया हुआ है। कैसे उठायें।"
"कुछ फेक के मारिये।"
"चप्पल है मेरे पास।"

और, ये मारा।

मिल गया छोटे...............






Sunday, 23 August 2009

उम्मीद: एक खतरनाक चीज़

नेता बड़े चालु होते हैं। वादे करते हैं। उमीदें जगाते हैं। चले जाते हैं।
नेता बेवकूफ होते हैं। कई अनपढ़ होते हैं। उन्हें पता नहीं होता है की क्या किया जा सकता है और क्या नहीं। फिर भी वादे करते हैं। उमीदें जगाते हैं। चले जाते हैं।

"हमें ज़मीन दे दीजिये। और हमें क्या करना है। बस एहन नदी मैं एक लिफ्ट इर्रिगेशन लगाना है और आपके लिए पानी ही पानी।"
"आप आराम से अपनी फसल मैं पानी दीजिये। कभी सुखा नहीं पड़ेगा आपके यहाँ।"
"जब आपको मनन हो बटन दबाइए और पानी चालु।"

"सड़क, अरे यह कैसे नहीं बनेगी। बननी ही है। आपके डी ऍम को कहेंगे तो मन कर देगा क्या? तीन मिनट में साइन करेगा।"

वादे करते जाइए। पता नहीं नदी में पानी कितना होता है। कितना पानी निकाला जा सकता है। सड़क लीगल है, इल्लीगल है; सरकार के पास पैसे हैं, नहीं हैं। पता नहीं। पर वादे करते जाइए। उमीदें जगाते जाइए।

यह कोई नेता नहीं है। ये हैं मैं और आप। हम तो नेता नहीं हैं। हम तो चालू नहीं हैं। हम तो अनपढ़ नहीं हैं। हम तो बेवकूफ नहीं हैं।

हमें बड़ा अच्हा लगता है बड़ी बड़ी बातें करना, औरों के सामने ख़ुद को बड़ा दिखाना।
मामूली किसानों को क्या पता। आप तो सेहर से आए बड़े साहब हैं। इतना बड़ा काम करने आए हैं। आपको सब पता है, क्या हो सकता है, क्या नहीं। आप कह रहे हैं तो यह हो ही जाएगा। जग गई उम्मीद, हो गया भरोसा।

Friday, 21 August 2009

वाटर वार्स

गाँव की और । लहराती टेढी मेढी सड़क। खेत ही खेत । धन की फसल। पटवन का समय ।
अरे! सामने लोगों की भीड़।
हाथ मैं डंडे, भाले।
"क्यों भाई, चक्कर क्या है, यह बवाल कैसा।"
"क्या बताएं साहबजी, पीछे के गाँववालों ने नहर का पानी रोक लिया। हमारी फसलें सूख रही हैं, सारा पानी उनके खेतों में....."
मानसून में गड़बड़। नदी में पानी कम। नेहर मैं पानी कम। खेत मैं पानी कम। पेट मैं खाना कम।
येही है वाटर वार्स (पानी का झगडा)

Thursday, 20 August 2009

पॉवर का चक्कर

एक शहर से दूसरे शहर। लंबा रास्ता। सैकड़ो गाँव। बिजली की समस्या। खेतों में पानी देने के लिए बिजली नहीं। बर्बाद होती फसल।
सड़क जाम। गाड़ियों की लम्बी लाइन। दोनों तरफ़ खेत, गाँव।
"क्या हुआ भाई, जाम क्यों लगा हुआ है।"
"कुछ नहीं साहब, सामने के गाँव में एक लड़के की मौत हो गई है। लोग रोड जाम करके हर्जाना मांग रहे हैं।"
"मौत! ओह हो! यह कैसे हुआ।"
"साहब बेचारे को बिजली का करंट लग गया।"

बिजली (पॉवर) का चक्कर, न मिले तो मौत, मिले तो मौत।

बारिश का बवाल

किसानों ने पिछले साल की पूरी फसल बेच दी। अब खाने के भी लाले पड़े हुए हैं। बारिश हुई नहीं है। धन के बीज सूख रहे हैं। इस बार खाद्यानों के दाम भी आसमान छूने वाले हैं। न पैसे बचे हैं। न इस बार कमाई होने वाली हैं। न जाने क्या होगा?

Monday, 17 August 2009

शिक्षा मित्र

दो महिलाओं की शिक्षा मित्र में नई बहाली

"हमें मेहनत से काम करना चाहिए ताकि हम जल्दी परमानेंट हो जाएँ।

शिक्षिका क्लास में पढाती हुई। प्रधानाध्यापक उधर से गुज़रते हुए।
"मैडम आपको क्लास में बच्चों को पढ़ना नहीं चाहिए।"
"प्रिंसिपल साहब मज़ाक कर रहे होंगे।"

अगले दिन। शिक्षिका क्लास में पढाती हुई। प्रधानाध्यापक उधर से गुज़रते हुए।
"क्या कहा था मैंने आपको। आप इन बच्चों को पढाइये मत। बस क्लास में बैठिये, बच्चा लोग को कंट्रोल कीजिये, टाइम काटिए।"
"ये कैसा मज़ाक है, करें क्या हम लोग?"

कुछ दिन बाद। एक शिक्षिका के पति उन्हें लेने स्कूल आए।
"आप तो समझदार लगते हैं। अपनी पत्नी को समझाए ज़रा की ऊ बच्चा लोग को पढाएं नै। ऊ पढायेंगी, अ सब पढ़ले लिखल हो जाएगा त खेत में काम कौन करेगा, हम्मर अल्लू के रोपेगा।"

बेचारे प्रिंसिपल साहब। इतना दिन लगा उनको सिस्टम बनने में, अ ई नेकी मैडम आके उनका सिस्टम ख़राब कर रही हैं। गज़ब बात है भाई।
ये है हमारा सर्व शिक्षा अभियान। और ये हैं हमारे शिक्षा मित्र।