Saturday, 29 August 2009

बंगले में भय

सुबह के 4.15 बजे। आधी रात तक ठंढ। अभी अचानक गर्मी। गला सूखता हुआ।
पानी चाहिए।
बिजली नहीं है। घुप अंधेरे मैं नीचे जा के पानी पीना पड़ेगा।
रोज़ तो बिस्तर के पास पानी रख के सोते थे। आज कैसे भूल गए।
क्या यह इशारा है किसी तरह का?

हाथ मैं बंधा रक्षा सूत्र ढीला हो गया है। क्या ये इशारा है किसी तरह का?
सोने की कोशिश करता हूँ। अभी नीचे नहीं जाऊँगा।

5 मिनट, 10 मिनट, नींद नहीं आ रही है। पानी चाहिए।
नीचे जाना पड़ेगा। अंधेरे में। अकेले।

उठता हूँ। अरे यह क्या, रक्षा सूत्र तकिये में दब के खुल रहा है।
क्या ये इशारा है किसी तरह का?

नहीं नहीं। जाना पड़ेगा। पीना पड़ेगा। सोना पड़ेगा।

इतने बड़े बंगले में जब इतने कम लोग होते हैं तो डर तो लगता ही है.......



Thursday, 27 August 2009

लाल शर्ट का चक्कर

एक शहर से दूसरे शहर। चिकनी सड़क।
अरे यह क्या! सामने बीच सड़क पर पुलिस की टुकडी।
रुकने का इशारा।
"क्या इन्हें लिफ्ट चाहिए।"

इंसपेक्टर: "हाँ सर, यह फलां फलां नम्बर की सूमो गाड़ी है।""जी जी, लाल शर्ट पहने हुए है।"
ड्राईवर: "क्या बात है इंसपेक्टर साब, क्यों रोका है हमें?"
इंसपेक्टर: "जी सर, लाल शर्ट अ उसपे छीत है उजला रंग का."
हवालदार: "सर धारी।"
इंसपेक्टर: "जी जी सर, लाल शर्ट अ उजला धरी है उसपर।"
ड्राईवर: "क्या बात है सर।"
इंसपेक्टर: "गाड़ी साइड में लगाए।"

गाड़ी साइड में।इंसपेक्टर साहब फ़ोन पर। इंतज़ार। २० मिनट बाद।
इंसपेक्टर: "जा सकते हैं आपलोग।"
ड्राईवर: "बात क्या हो गई साहब?"
इंसपेक्टर: "कुछ नहीं। जाइए।"

बिना कारण रुके। बिना कारण चले।

वह रे मेरे लाल शर्ट......

Monday, 24 August 2009

हमारा मिट्ठू बहादुर

६-७ साल की उमर। १-२ कक्षा के बच्चे।
साइंस की क्लास। पढ़ाई का विषय: किस प्राणी के घर को क्या कहता हैं।
"होर्सेस लिव इन स्तबल ।" "लायन लिव्स इन डेन।" (horses live in stable. lion lives in den.)

" मिट्ठू बहादुर, तुम बताओ, वेयर दू यू लिव?" (where do you live)
"आई लिव इन नेस्ट।" (i live in nest)

दूसरी क्लास।
"बच्चों, सब अपने अपने बारे में १० लाइन लिखो।"

मिट्ठू बहादुर। क्या लिखूँ। क्या लिखूँ......
सामने वाली लड़की की कॉपी में देख के लिख लेता हूँ।
लड़की की कॉपी: माय नेम इज स्वीटी। (my name is sweety)
मिट्ठू बहादुर की कॉपी: माय नेम इज स्वीटी। (my name is sweety)

ये था हमारा मिट्ठू बहादुर


कहाँ गया छोटे

भूमिका: गर्मी का मौसम। बिजली की लोड शेडिंग हो रही है। ठंढी ज़मीन पर सोना अच्छा लगता है।

पापा दोपहर मैं ऑफिस से वापस आए।
"चलो भाई खाना लगाओ। छोटे कहाँ हैं। सब साथ मैं खाना खाते हैं।"
"किसी दूसरे कमरे में सोया होगा। देखते हें।"
"नहीं तो, घर पर नहीं है। किसी दोस्त के यहाँ खेल रहा होगा ज़रूर।"
"बड़े ज़रा देख के आओ। बुला लाना खाने के लिए।"

"नहीं किसी दोस्त के यहाँ भी नहीं हैं।"
"गया कहाँ।"

पड़ोसियों और दोस्तों का आवागमन।
"मिला क्या छोटे।"
"नहीं, कुछ समझ में नहीं आ रहा है कहाँ गया।"

रिश्तेदारों के यहाँ फ़ोन।
"नहीं तो, यहाँ तो नहीं आया।"

गर्मी के मौसम में। भरी दोपहरी में। दोस्त, रिश्तेदार ढूँढने निकल पड़े। जिसने जो पहन रखा था उसी में शामिल। बनियानों में दोस्त। लुंगियों में रिश्तेदार।

कहाँ गया छोटे।

"अरे ये काले शीशों वाली कार।" कहीं किसी ने अपहरण तो नहीं कर लिया। पास पड़े इस पत्थर से इसका शीशा फोड़ कर देखता हूँ।"

कहीं कुछ पता नहीं चल रहा है। कहाँ गया छोटे।

"कुछ दिनों पहले छोटे कह रहा था की इतनी गर्मी मियन बिस्तर के नीचे बड़ी ठंढ रहती है। वहां सोने में बड़ा मज़ा आएगा। कहीं वहीँ तो....."
"अरे! ये रहा। काफ़ी अन्दर की तरफ़ सोया हुआ है। कैसे उठायें।"
"कुछ फेक के मारिये।"
"चप्पल है मेरे पास।"

और, ये मारा।

मिल गया छोटे...............






Sunday, 23 August 2009

उम्मीद: एक खतरनाक चीज़

नेता बड़े चालु होते हैं। वादे करते हैं। उमीदें जगाते हैं। चले जाते हैं।
नेता बेवकूफ होते हैं। कई अनपढ़ होते हैं। उन्हें पता नहीं होता है की क्या किया जा सकता है और क्या नहीं। फिर भी वादे करते हैं। उमीदें जगाते हैं। चले जाते हैं।

"हमें ज़मीन दे दीजिये। और हमें क्या करना है। बस एहन नदी मैं एक लिफ्ट इर्रिगेशन लगाना है और आपके लिए पानी ही पानी।"
"आप आराम से अपनी फसल मैं पानी दीजिये। कभी सुखा नहीं पड़ेगा आपके यहाँ।"
"जब आपको मनन हो बटन दबाइए और पानी चालु।"

"सड़क, अरे यह कैसे नहीं बनेगी। बननी ही है। आपके डी ऍम को कहेंगे तो मन कर देगा क्या? तीन मिनट में साइन करेगा।"

वादे करते जाइए। पता नहीं नदी में पानी कितना होता है। कितना पानी निकाला जा सकता है। सड़क लीगल है, इल्लीगल है; सरकार के पास पैसे हैं, नहीं हैं। पता नहीं। पर वादे करते जाइए। उमीदें जगाते जाइए।

यह कोई नेता नहीं है। ये हैं मैं और आप। हम तो नेता नहीं हैं। हम तो चालू नहीं हैं। हम तो अनपढ़ नहीं हैं। हम तो बेवकूफ नहीं हैं।

हमें बड़ा अच्हा लगता है बड़ी बड़ी बातें करना, औरों के सामने ख़ुद को बड़ा दिखाना।
मामूली किसानों को क्या पता। आप तो सेहर से आए बड़े साहब हैं। इतना बड़ा काम करने आए हैं। आपको सब पता है, क्या हो सकता है, क्या नहीं। आप कह रहे हैं तो यह हो ही जाएगा। जग गई उम्मीद, हो गया भरोसा।

Friday, 21 August 2009

वाटर वार्स

गाँव की और । लहराती टेढी मेढी सड़क। खेत ही खेत । धन की फसल। पटवन का समय ।
अरे! सामने लोगों की भीड़।
हाथ मैं डंडे, भाले।
"क्यों भाई, चक्कर क्या है, यह बवाल कैसा।"
"क्या बताएं साहबजी, पीछे के गाँववालों ने नहर का पानी रोक लिया। हमारी फसलें सूख रही हैं, सारा पानी उनके खेतों में....."
मानसून में गड़बड़। नदी में पानी कम। नेहर मैं पानी कम। खेत मैं पानी कम। पेट मैं खाना कम।
येही है वाटर वार्स (पानी का झगडा)

Thursday, 20 August 2009

पॉवर का चक्कर

एक शहर से दूसरे शहर। लंबा रास्ता। सैकड़ो गाँव। बिजली की समस्या। खेतों में पानी देने के लिए बिजली नहीं। बर्बाद होती फसल।
सड़क जाम। गाड़ियों की लम्बी लाइन। दोनों तरफ़ खेत, गाँव।
"क्या हुआ भाई, जाम क्यों लगा हुआ है।"
"कुछ नहीं साहब, सामने के गाँव में एक लड़के की मौत हो गई है। लोग रोड जाम करके हर्जाना मांग रहे हैं।"
"मौत! ओह हो! यह कैसे हुआ।"
"साहब बेचारे को बिजली का करंट लग गया।"

बिजली (पॉवर) का चक्कर, न मिले तो मौत, मिले तो मौत।

बारिश का बवाल

किसानों ने पिछले साल की पूरी फसल बेच दी। अब खाने के भी लाले पड़े हुए हैं। बारिश हुई नहीं है। धन के बीज सूख रहे हैं। इस बार खाद्यानों के दाम भी आसमान छूने वाले हैं। न पैसे बचे हैं। न इस बार कमाई होने वाली हैं। न जाने क्या होगा?

Monday, 17 August 2009

शिक्षा मित्र

दो महिलाओं की शिक्षा मित्र में नई बहाली

"हमें मेहनत से काम करना चाहिए ताकि हम जल्दी परमानेंट हो जाएँ।

शिक्षिका क्लास में पढाती हुई। प्रधानाध्यापक उधर से गुज़रते हुए।
"मैडम आपको क्लास में बच्चों को पढ़ना नहीं चाहिए।"
"प्रिंसिपल साहब मज़ाक कर रहे होंगे।"

अगले दिन। शिक्षिका क्लास में पढाती हुई। प्रधानाध्यापक उधर से गुज़रते हुए।
"क्या कहा था मैंने आपको। आप इन बच्चों को पढाइये मत। बस क्लास में बैठिये, बच्चा लोग को कंट्रोल कीजिये, टाइम काटिए।"
"ये कैसा मज़ाक है, करें क्या हम लोग?"

कुछ दिन बाद। एक शिक्षिका के पति उन्हें लेने स्कूल आए।
"आप तो समझदार लगते हैं। अपनी पत्नी को समझाए ज़रा की ऊ बच्चा लोग को पढाएं नै। ऊ पढायेंगी, अ सब पढ़ले लिखल हो जाएगा त खेत में काम कौन करेगा, हम्मर अल्लू के रोपेगा।"

बेचारे प्रिंसिपल साहब। इतना दिन लगा उनको सिस्टम बनने में, अ ई नेकी मैडम आके उनका सिस्टम ख़राब कर रही हैं। गज़ब बात है भाई।
ये है हमारा सर्व शिक्षा अभियान। और ये हैं हमारे शिक्षा मित्र।