Monday, 17 December 2012

न्याय मित्र

गाँव के छोटे मोटे मामलों का फ़ैसला गाँव मैं ही हो जाएगा। न्याय मित्र। गाँव के मुखिया।
साथ में एक वकील की बहाली। वो देंगें कानूनी मामलों में सलाह।
वकील साहब की तनख्वाह आएगी मुखियाजी के अकाउंट में और वो देंगे वकील साहब को।

"वकील साहब, तनख्वाह आ गई है। जा का ले आइये।"

वकील साहब ने मोटर साइकिल उठाई और हो गए रवाना।

"नमस्कार मुखियाजी! कैसे हाल चाल?"
"बस साहब, दया है आपकी।"

"क्या लेंगे, चाय पानी?"
"जी कुछ नहीं, बस मेरा चेक।"

"जी वो तो आ गया, पर हमारी बात....."
"आपकी कौन सी बात, बस चेक की बात है।"

"जी वो मोबाइल की बात थी।"
"अच्छा मोबाइल देने की ही तो बात थी, दे देंगे।"

"दरअसल एक मोबाइल देख रखा था, बारह हज़ार का।"
"अरे!!!!! बारह हज़ार ही क्यों, डेढ़ लाख का लीजिये।"
"तेंतीस हज़ार मेरे और जो बाकि बचा वो घर, ज़मीन, भैंस बेचकर इकठ्ठा कर लो (बात के लहज़े में परिवर्तन नोट करें)। कम से कम इलाके में तो नाम होगा।"

"अरे अरे! आप तो बुरा मान गए।"
"रे सार!!! तू तारी बेचे वाला, ऊहो पानी मिला के, तू बारह हज़ार के मोबाइल रखब।" "चैक निकाला अ तू जा भैंसी चरावा।"

वकील साहब चेक ले के बहार जाते हुए।

पड़ोसी।
"का बात वकील साहब, सब बात फैनल हो गईल।"
"फैनल की होइक बा, मुखिया जी का जा के कह देयें की हमार तेतीस हज़ार रुपैया निकलीं न ते केस-ऊस हो जाईल।"

नोट: मोबाइल की चक्कर में मुखियाजी वकील साहब से रिसीविंग लेना भूल गए, मतलब एक तरह से वकील साहब को पैसा ही नहीं मिला है और मुखियाजी फंस सकते हैं।

No comments:

Post a Comment