Sunday, 23 August 2009

उम्मीद: एक खतरनाक चीज़

नेता बड़े चालु होते हैं। वादे करते हैं। उमीदें जगाते हैं। चले जाते हैं।
नेता बेवकूफ होते हैं। कई अनपढ़ होते हैं। उन्हें पता नहीं होता है की क्या किया जा सकता है और क्या नहीं। फिर भी वादे करते हैं। उमीदें जगाते हैं। चले जाते हैं।

"हमें ज़मीन दे दीजिये। और हमें क्या करना है। बस एहन नदी मैं एक लिफ्ट इर्रिगेशन लगाना है और आपके लिए पानी ही पानी।"
"आप आराम से अपनी फसल मैं पानी दीजिये। कभी सुखा नहीं पड़ेगा आपके यहाँ।"
"जब आपको मनन हो बटन दबाइए और पानी चालु।"

"सड़क, अरे यह कैसे नहीं बनेगी। बननी ही है। आपके डी ऍम को कहेंगे तो मन कर देगा क्या? तीन मिनट में साइन करेगा।"

वादे करते जाइए। पता नहीं नदी में पानी कितना होता है। कितना पानी निकाला जा सकता है। सड़क लीगल है, इल्लीगल है; सरकार के पास पैसे हैं, नहीं हैं। पता नहीं। पर वादे करते जाइए। उमीदें जगाते जाइए।

यह कोई नेता नहीं है। ये हैं मैं और आप। हम तो नेता नहीं हैं। हम तो चालू नहीं हैं। हम तो अनपढ़ नहीं हैं। हम तो बेवकूफ नहीं हैं।

हमें बड़ा अच्हा लगता है बड़ी बड़ी बातें करना, औरों के सामने ख़ुद को बड़ा दिखाना।
मामूली किसानों को क्या पता। आप तो सेहर से आए बड़े साहब हैं। इतना बड़ा काम करने आए हैं। आपको सब पता है, क्या हो सकता है, क्या नहीं। आप कह रहे हैं तो यह हो ही जाएगा। जग गई उम्मीद, हो गया भरोसा।

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