Monday, 24 August 2009

कहाँ गया छोटे

भूमिका: गर्मी का मौसम। बिजली की लोड शेडिंग हो रही है। ठंढी ज़मीन पर सोना अच्छा लगता है।

पापा दोपहर मैं ऑफिस से वापस आए।
"चलो भाई खाना लगाओ। छोटे कहाँ हैं। सब साथ मैं खाना खाते हैं।"
"किसी दूसरे कमरे में सोया होगा। देखते हें।"
"नहीं तो, घर पर नहीं है। किसी दोस्त के यहाँ खेल रहा होगा ज़रूर।"
"बड़े ज़रा देख के आओ। बुला लाना खाने के लिए।"

"नहीं किसी दोस्त के यहाँ भी नहीं हैं।"
"गया कहाँ।"

पड़ोसियों और दोस्तों का आवागमन।
"मिला क्या छोटे।"
"नहीं, कुछ समझ में नहीं आ रहा है कहाँ गया।"

रिश्तेदारों के यहाँ फ़ोन।
"नहीं तो, यहाँ तो नहीं आया।"

गर्मी के मौसम में। भरी दोपहरी में। दोस्त, रिश्तेदार ढूँढने निकल पड़े। जिसने जो पहन रखा था उसी में शामिल। बनियानों में दोस्त। लुंगियों में रिश्तेदार।

कहाँ गया छोटे।

"अरे ये काले शीशों वाली कार।" कहीं किसी ने अपहरण तो नहीं कर लिया। पास पड़े इस पत्थर से इसका शीशा फोड़ कर देखता हूँ।"

कहीं कुछ पता नहीं चल रहा है। कहाँ गया छोटे।

"कुछ दिनों पहले छोटे कह रहा था की इतनी गर्मी मियन बिस्तर के नीचे बड़ी ठंढ रहती है। वहां सोने में बड़ा मज़ा आएगा। कहीं वहीँ तो....."
"अरे! ये रहा। काफ़ी अन्दर की तरफ़ सोया हुआ है। कैसे उठायें।"
"कुछ फेक के मारिये।"
"चप्पल है मेरे पास।"

और, ये मारा।

मिल गया छोटे...............






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