Saturday, 29 August 2009

बंगले में भय

सुबह के 4.15 बजे। आधी रात तक ठंढ। अभी अचानक गर्मी। गला सूखता हुआ।
पानी चाहिए।
बिजली नहीं है। घुप अंधेरे मैं नीचे जा के पानी पीना पड़ेगा।
रोज़ तो बिस्तर के पास पानी रख के सोते थे। आज कैसे भूल गए।
क्या यह इशारा है किसी तरह का?

हाथ मैं बंधा रक्षा सूत्र ढीला हो गया है। क्या ये इशारा है किसी तरह का?
सोने की कोशिश करता हूँ। अभी नीचे नहीं जाऊँगा।

5 मिनट, 10 मिनट, नींद नहीं आ रही है। पानी चाहिए।
नीचे जाना पड़ेगा। अंधेरे में। अकेले।

उठता हूँ। अरे यह क्या, रक्षा सूत्र तकिये में दब के खुल रहा है।
क्या ये इशारा है किसी तरह का?

नहीं नहीं। जाना पड़ेगा। पीना पड़ेगा। सोना पड़ेगा।

इतने बड़े बंगले में जब इतने कम लोग होते हैं तो डर तो लगता ही है.......



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