Sunday, 27 September 2009

वह रे पॉलिटिक्स

"जब हवाई जहाज में जाएँ तो आम श्रेणी में ही सफर करें"
आज कल यह होड़ लगी है जन सेवकों (माने हमारे नेता ) में।

किसी कोई होटल का आरामदायक कमरा खाली करने का आदेश मिल रहा है। कोई विमान में आम श्रेणी में सफर कर रहा है।

एक महाशय तो अपनी पुरी सुरक्षा की बटालियन ले कर ट्रेन में सफर करने लग गए। ये तक न सोचा की आम आदमी के सफर पर इसका क्या असर पड़ेगा? क्या स्टेशन पर औरों को परेशानी होगी? ज़रूरत क्या है सोचने की, हम तो आम बन गए, आम आदमी के साथ हो गए। तो फिर आम आदमी को अब और क्या परेशानी?

जिंदगी भर जो लोग ख़ास रहे हैं। जिंदगी भर जो लोग ख़ास रहेंगे।
जिन्होंने आज तक ख़ास श्रेणी में सफर किया है विमानों में, ख़ास हेलीकॉप्टर मंगवाए हैं अपनी यात्रा के लिए।
वो आज आम बनने की होड़ में लगे हुए हैं।

वह रे पॉलिटिक्स! क्या क्या न करवाए तू?

Sunday, 20 September 2009

ईट हैपेन्स ओनली इन इंडिया

हिंदुस्तान माडर्न हो रहा है। चीज़ें बदल रही हैं।
हम पस्चिमी सभ्यता को आजमा रहे हैं, अपना रहे हैं।

इन सब का एक बहुत बड़ा उदाहरण मिलता है आज कल के मॉलों में।
नए तरेह की दुकानें, नए परिधान। नए रूप रंग, नए ढंग।

एक मॉल में सुबह सुबह। दुकाने अभी अपनी उंघती आंखों से पलकें उठा ही रही हैं।
ऊपर शीशे की छत से चन कर आती रौशनी मॉल के वातानुकूलित वातावरण को हल्का हल्का ठंढा कर रही है।

बेंच पर बैठा एक लड़के के कानों में आई पॉड की झंकार गूँज रही है।
एक खूबसूरत लड़की उसकी ओर आरही है।

लड़की आकर बगल में बठी। हाथ में एक डायरी जैसी चीज़ है।
डायरी खुली।
अरे! हनुमान चालीसा।
लड़की मंत्र बुदबुदा रही है। जल्दी जल्दी चालीसा ख़त्म करी है।

डायरी बैग के अन्दर गई। बैग से मोबाइल निकला।
कान में ईयरफोन लगाया। आगे बढ़ गई लड़की।

यही है असली भारत। नई चीज़ को भी अपनाया और पुराना भी नहीं गवाया।

ईट हप्पेंस ओनली इन इंडिया।


Saturday, 19 September 2009

गाय, भैंस और हमारे नेताजी

सुना है आज कल इंसानों की तुलना गायों से की जा रही है।
इससे भी बड़ी बात, कुछ नेता ऐसा कर रहे हैं और कुछ नेताओं को इसका बुरा लग रहा है।

हमारी भोली गौ माता। उनसे तुलना तो हमारे लिए इज्ज़त की बात है।
वैसे जिन्होंने ये तुलना की उनका इंसानों की बेचारे बेजुबान जानवर से तुलना करने की मंशा बिल्कुल नहीं रही होगी।

मैं बस यह सोच रहा था की ये नेता इंसान और गाय की तुलना को भूल यह क्यों नहीं सोच रहे की आम आदमी की परेशानियां और देश की समस्याओं की बारे मैं विचार करने और उनके समाधान निकालने की अपेक्षा उनसे रखना "भैंस के आगे बीन बजाने" जैसा हो गया है।

जी हाँ नेता जी। आप ही से कहा। आप तो बिल्कुल भैंस की तरह हो गए हैं।

"भैंस के आगे बीन बजाये (आम जनता), भैंस खड़ी पगुराए (नेताजी जिनकी भी सरकार खड़ी होती है)।

तो कृपया गाय को भूलें और अपने भैंस के अंदाज़ को बदलें। आम जनता न सही आप ही गाय बन जाएँ जो कम से कम देश के लोगों को दूध (उन्नती) दे।

Friday, 18 September 2009

बी डी ओ साहब

पतली सड़क। सामने से आता ट्रक।
सड़क के एक तरफ़ एक टाटा सूमो लगी हुई है। लाल बत्ती के साथ।
लिखा है।
नगर विकास पदाधिकारी।

ट्रैफिक रुक गया। आने जाने की जगह नहीं है।
"अरे भाई कोई पदाधिकारी साहब की गाड़ी को हटाओ।"

गाड़ी के पास बैठे आदमी से पूछने पर वो गाड़ी के यात्रियों के बारे में अनिभिग्यता प्रकट करता है।
"अरे भाई आइसे कैसे काम चलेगा।" "कब तक रुके रहेंगे हम।"

बी डी ओ साहब आते हैं। अनिभिग्यता प्रकट करने वाला व्यक्ति ड्राईवर की सीट में बैठता है।

यही हैं हमारे विकास पदाधिकारी।

वकील साहब, "अरे साहब, यह प्रखंड विकास पदाधिकारी नहीं हैं। ये हैं प्रखंड विनाश पदाधिकारी।"

Saturday, 12 September 2009

बरखा बहार आई.....

नाले में बाढ़ आई.....

गुरु का गाँव, मिलिनिअम सिटी। अजब तेरे जलवे अजब तेरा स्टाइल।

पिछले दो दिन मस्त हुई बारिश। गर्मी से मिली निजाद। मौसम हुआ खुशगवार।
पिछले दो दिन अस्त व्यस्त हुई जिंदगी।

घर से निकला ऑफिस जाने को। दो पहिया वहां। भारी बारिश।
लाल बत्ती पर भयंकर जल जमाव है। गाडियां तैर रही हैं। नजाने कैसे पार करूँगा यह नदी।
हिलते डुलते, तैरते उबरते, गिरते उठते।
पार हो गया।
पानी जमने का कारन। ऊपर से पानी बहुत आ रहा है। लेकिन नीचे का क्या?
लाल बत्ती के पास वाला मैन होल तो मस्त फवारा बना हुआ है। सरकार को येहाँ सजावट करवाने की ज़रूरत नही है।
काले पानी का फवारा है, काले पानी की नदी है। लोग खूब मज़ा कर सकते हैं।

खैर किसी तरह नदी पार तो हुई। अब आराम से ऑफिस पहुच जाऊँगा।

अगला चौक। एक और नदी। आज तो जिनगी भर की जो साहसिक खेलों की कसार रही थी उसको पूरी कर ही लूँगा। एक बार और दोपहिये को नदी में घुसा दिया।
हिलते डुलते, तैरते उबरते, गिरते उठते।
पार हो गया।

चलो आज तो गंगा नहा लिया। अब तो पहुच जाऊं ऑफिस आराम से।
गंगा। गंगा तो अब नहाओ बेटा। ऑफिस के बहार तो सही में गंगा बह रही है।
"मेरा ऑफिस है उस पार, में इस पार।"
"मेरे मांजी (मेरी दो पहिया पल्सर), ले चल पार, अब की बार।"

एक बार और कान घुमाया दोपहिया का।
हिलते डुलते, तैरते उबरते, गिरते उठते।
पार हो गया।

सच में गंगा (गन्दा) नहा लिया बेटा।
जूतों में पानी। चड्डी में पानी। गीले मौजे।बैठो गिले। एसी में। बदन से पानी बहाते हुए।

यही हैं मज़े मिलिनिअम सिटी में रहने के। मुफ्त के फवारे। मुफ्त की तैराकी। साहसिक खेलों का मज़ा रोजाना की जिंदगी में। और क्या चाहिए?

Friday, 4 September 2009

वर्दी वाला गुंडा

अरे हमारी कालोनी के बहार इतनी सुरक्षा। बढ़िया है यह तो।
"रुक भाई रुक।" "गाड़ी के कागज़ निकाल।"
"ये लो साहब।"
"इंश्योरेंस दिखा।"
"साहब वो तो घर पर है।"
"गड्डी साइड में लगा।"
"बात क्या है साहब, में तो यहीं रहता हूँ।"
"रहता है तो क्या? अभी तो बहार से आ रहा है।"
"पोल्लूशन का कागज़ है।"
"साहब वोह तो............"
पुलिस वाला चुप खड़ा हो जाता है।
"बताओ साहब इसका क्या करें?"
"करना क्या है, चालान कटेगा और क्या?"
"अरे साहब! चालान मत काटो, गरीब आदमी हूँ।"
"गरीब आदमी है! 60 हज़ार की गड्डी चालाता है और गरीब।"

एक तरफ़ खड़े अपने सहकर्मी के पास चला जाता है। चालक दोपहिया खड़ी कर के उनके पास जाता है।
"चल हेल्मेट उतार।
चालाक हेल्मेट उतारता है।

"साहब मैं तो यहीं रहता हूँ।"
"कहाँ रहता है?"
"साहब '२५३३' क में।"
"कितने टाइम से रह रहा है?"
"साहब एक डेढ़ साल से।"
"कहाँ का रहने वाला है?"
"साहब बिहार का।"
"ऑफिस कहाँ है?"
"साहब सेक्टर 33 में।"
"क्या काम करता है?"
"साहब कन्सल्तैंत हूँ।"

गाड़ी के कागज़ पकड़ाते हुए जाने का इशारा करता है।

चालक चैन की साँस लेते हुए......

दो आम हवालदार। जिनका काम उस जगह की सुरक्षा करना है। ये कहानी थी उनकी।


Thursday, 3 September 2009

पुलिसिया बाबा

पुलिस मैं बड़े अफसर। कितने लोगों की जान बचाई।
कितने जुर्म रोके। कितने लोगों की जिंदगी बेहतर की।
कितनी सेवा की देश की।

यह हैं हमारे संजय कुमार सिंह।
बड़े ही गुड लुकिंग। बड़े ही स्मार्ट। एक "पर्फेक्ट मैन।"

आज भी उतने ही स्मार्ट हैं। उतने ही गुड लुकिंग हैं। और अब तो "पर्फेक्टेस्ट मैन" हैं।

बदला क्या है?
पुलिसिया स्मार्ट कपड़ों की जगह भगवा वस्त्र धारण कर रखा है।
रोज़ शवे करने वाला आदमी लम्बी दाढ़ी के साथ है।
पॉलिश किए हुए चमकते जूते पहनने वाला लकड़ी की खरावं पहने हुए है।
मांस, मछली और मदिरा के माहोल मे रहने वाला आज सिर्फ़ सात्विक भोजन करता है और अक्सर व्रत भी।
भटके हुए लोगों को डंडे से ठीक करने वाला आज अपनी बातों से उनको सही रास्ते पर ला रहा है।

ये हैं हमारे "पुलिसिया बाबा"।
लोग मानते हैं की बाबा लोग पुराने ज़माने के विचारों वाले होते हैं। उन्हें अंग्रेज़ी नहीं आती है। वोह पुराने ख्यालों के होते हैं। कई जो कुछ नहीं कर पाते जीवन मे वो बाबा बन जाते हैं।
यह हैं हमारे नए बाबा। माडर्न। अंग्रेज़ी मैन पारंगत। हिन्दी मैन पारंगत। और भी कई भाषाओँ का ज्ञान रखते हैं।
और भी कई काम कर सकते थे जीवन मैन। एक सफल जीवन वैतीत कर रहे थे।
लेकिन इश्वर का बुलावा आया और जो ज्ञान मिला इस्वर से वोह अमृत औरों को पिलाने निकल पड़े सब छोड़ चाद के।

वह रे मेरे हिन्दुस्तान। तेरे जलवे निराले।

आज बाबा का बड़ा आश्रम है, २०० एकर का। और भी कई आश्रम हैं कई जगहों पर।
बड़े बड़े नेता, अफसर आते हैं सर झुकाने, चढावा चढाने। आश्रम मैन एन केन प्रकारेण गाड़ियां हैं, हलिकाप्टर है। लाखों का चढावा चढ़ता है रोज़।
क्या ये सब हो पता अगर पुलिस की नौकरी मे होते। पता नही।

वह रे मेरे हिंदुस्तान तेरे जलवे निराले।

Tuesday, 1 September 2009

ख्वातून का खौफ

याद है जब तुम साइकिल सीख रहे थे। बिना सहारे के उतर नहीं पाते थे।
सामने से ख्वातून आ रही थी। उन्होंने तुम्हें रुकने को कहा था। तुम रुके नहीं क्योंकि वह कोई सहारा नहीं था रुकने के लिए।
"हाँ ख्वातून ने रुकने का इशारा किया था। सहारा होता वहां रुकने के लिए तब भी नहीं रुकता मैं। सर नहीं पकवाना था मुझे उनसे।"

ये तो बस एक ट्रेलर है ख्वातून के जलवों का। उनके खौफ से लोगों ने क्या क्या नहीं किया।


"ख्वातून आ रही हैं! ख्वातून आ रही हैं!"
"अगर देख लिया मुझे तो बहुत पकाएँगी।"
"क्या करूँ? क्या करूँ?"
"दूसरे कमरे में छुप जाती हूँ।"
"अरे नहीं मौसी, वो तो सारे कमरे घूम घूम के देखती हैं।" "बच नहीं पायियेगा ख्वातून की पहुच से।"
"ख्वातून के हाथ बहुत लंबे हैं।"

"आईडिया! यह जो ड्रम रखा हुआ है इसमें छुप जाती हूँ। तुम लोग किसी तरह चलता करना ख्वातून को।"
"ठीक है मौसी।"

ख्वातून आती हैं। सारे कमरों में घूमती हैं। मौसी ड्रम के अन्दर।
"जल्दी जाएँ ख्वातून तो निकलूं। दम घुट रहा है यहाँ।"

ख्वातून कमरे में आती हैं जहाँ ड्रम रखा है। वहां आराम से बैठ जाती हैं।
"हे भगवान्, आज तो गई जान दम घुटने से।"

बच्चे किसी तरेह ख्वातून का ध्यान बता कर भेजते हैं।
मौसी बहार आती है।

"जान बची तो लाखो पाये,
ख्वातून से भगवान् बचाए।"