Tuesday, 1 September 2009

ख्वातून का खौफ

याद है जब तुम साइकिल सीख रहे थे। बिना सहारे के उतर नहीं पाते थे।
सामने से ख्वातून आ रही थी। उन्होंने तुम्हें रुकने को कहा था। तुम रुके नहीं क्योंकि वह कोई सहारा नहीं था रुकने के लिए।
"हाँ ख्वातून ने रुकने का इशारा किया था। सहारा होता वहां रुकने के लिए तब भी नहीं रुकता मैं। सर नहीं पकवाना था मुझे उनसे।"

ये तो बस एक ट्रेलर है ख्वातून के जलवों का। उनके खौफ से लोगों ने क्या क्या नहीं किया।


"ख्वातून आ रही हैं! ख्वातून आ रही हैं!"
"अगर देख लिया मुझे तो बहुत पकाएँगी।"
"क्या करूँ? क्या करूँ?"
"दूसरे कमरे में छुप जाती हूँ।"
"अरे नहीं मौसी, वो तो सारे कमरे घूम घूम के देखती हैं।" "बच नहीं पायियेगा ख्वातून की पहुच से।"
"ख्वातून के हाथ बहुत लंबे हैं।"

"आईडिया! यह जो ड्रम रखा हुआ है इसमें छुप जाती हूँ। तुम लोग किसी तरह चलता करना ख्वातून को।"
"ठीक है मौसी।"

ख्वातून आती हैं। सारे कमरों में घूमती हैं। मौसी ड्रम के अन्दर।
"जल्दी जाएँ ख्वातून तो निकलूं। दम घुट रहा है यहाँ।"

ख्वातून कमरे में आती हैं जहाँ ड्रम रखा है। वहां आराम से बैठ जाती हैं।
"हे भगवान्, आज तो गई जान दम घुटने से।"

बच्चे किसी तरेह ख्वातून का ध्यान बता कर भेजते हैं।
मौसी बहार आती है।

"जान बची तो लाखो पाये,
ख्वातून से भगवान् बचाए।"

No comments:

Post a Comment