Friday, 4 September 2009

वर्दी वाला गुंडा

अरे हमारी कालोनी के बहार इतनी सुरक्षा। बढ़िया है यह तो।
"रुक भाई रुक।" "गाड़ी के कागज़ निकाल।"
"ये लो साहब।"
"इंश्योरेंस दिखा।"
"साहब वो तो घर पर है।"
"गड्डी साइड में लगा।"
"बात क्या है साहब, में तो यहीं रहता हूँ।"
"रहता है तो क्या? अभी तो बहार से आ रहा है।"
"पोल्लूशन का कागज़ है।"
"साहब वोह तो............"
पुलिस वाला चुप खड़ा हो जाता है।
"बताओ साहब इसका क्या करें?"
"करना क्या है, चालान कटेगा और क्या?"
"अरे साहब! चालान मत काटो, गरीब आदमी हूँ।"
"गरीब आदमी है! 60 हज़ार की गड्डी चालाता है और गरीब।"

एक तरफ़ खड़े अपने सहकर्मी के पास चला जाता है। चालक दोपहिया खड़ी कर के उनके पास जाता है।
"चल हेल्मेट उतार।
चालाक हेल्मेट उतारता है।

"साहब मैं तो यहीं रहता हूँ।"
"कहाँ रहता है?"
"साहब '२५३३' क में।"
"कितने टाइम से रह रहा है?"
"साहब एक डेढ़ साल से।"
"कहाँ का रहने वाला है?"
"साहब बिहार का।"
"ऑफिस कहाँ है?"
"साहब सेक्टर 33 में।"
"क्या काम करता है?"
"साहब कन्सल्तैंत हूँ।"

गाड़ी के कागज़ पकड़ाते हुए जाने का इशारा करता है।

चालक चैन की साँस लेते हुए......

दो आम हवालदार। जिनका काम उस जगह की सुरक्षा करना है। ये कहानी थी उनकी।


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