Saturday, 12 September 2009

बरखा बहार आई.....

नाले में बाढ़ आई.....

गुरु का गाँव, मिलिनिअम सिटी। अजब तेरे जलवे अजब तेरा स्टाइल।

पिछले दो दिन मस्त हुई बारिश। गर्मी से मिली निजाद। मौसम हुआ खुशगवार।
पिछले दो दिन अस्त व्यस्त हुई जिंदगी।

घर से निकला ऑफिस जाने को। दो पहिया वहां। भारी बारिश।
लाल बत्ती पर भयंकर जल जमाव है। गाडियां तैर रही हैं। नजाने कैसे पार करूँगा यह नदी।
हिलते डुलते, तैरते उबरते, गिरते उठते।
पार हो गया।
पानी जमने का कारन। ऊपर से पानी बहुत आ रहा है। लेकिन नीचे का क्या?
लाल बत्ती के पास वाला मैन होल तो मस्त फवारा बना हुआ है। सरकार को येहाँ सजावट करवाने की ज़रूरत नही है।
काले पानी का फवारा है, काले पानी की नदी है। लोग खूब मज़ा कर सकते हैं।

खैर किसी तरह नदी पार तो हुई। अब आराम से ऑफिस पहुच जाऊँगा।

अगला चौक। एक और नदी। आज तो जिनगी भर की जो साहसिक खेलों की कसार रही थी उसको पूरी कर ही लूँगा। एक बार और दोपहिये को नदी में घुसा दिया।
हिलते डुलते, तैरते उबरते, गिरते उठते।
पार हो गया।

चलो आज तो गंगा नहा लिया। अब तो पहुच जाऊं ऑफिस आराम से।
गंगा। गंगा तो अब नहाओ बेटा। ऑफिस के बहार तो सही में गंगा बह रही है।
"मेरा ऑफिस है उस पार, में इस पार।"
"मेरे मांजी (मेरी दो पहिया पल्सर), ले चल पार, अब की बार।"

एक बार और कान घुमाया दोपहिया का।
हिलते डुलते, तैरते उबरते, गिरते उठते।
पार हो गया।

सच में गंगा (गन्दा) नहा लिया बेटा।
जूतों में पानी। चड्डी में पानी। गीले मौजे।बैठो गिले। एसी में। बदन से पानी बहाते हुए।

यही हैं मज़े मिलिनिअम सिटी में रहने के। मुफ्त के फवारे। मुफ्त की तैराकी। साहसिक खेलों का मज़ा रोजाना की जिंदगी में। और क्या चाहिए?

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