Saturday, 28 November 2009

ज्ञान और अज्ञान का कानवरसेसन

इस लेख में नए ज़माने की नई भाषा का बहुत प्रयोग हुआ है। समझने की कोशिश करें।

अज्ञान: हाँ मैं पुरूष नहीं हूँ

ज्ञान: महा पुरूष हो
अज्ञान: हाँ येही तो बनना होता है जीवन मे। बन गया में।
मोक्ष
ज्ञान: नही गुरु के बिना मोक्ष नही होता।
अज्ञान: यह तो तुम्हारी सोच है न।
ज्ञान: और मोक्ष प्राप्त करने का एक ही रास्ता है जो सतगुरु से होके गुज़रता है।
नही मेरी सोच नही है।
आदि काल से यही होता है।
this is a rule which creator has made and even he has not ever defied this rule whenever he incarnated on this earth (यह नियम विधाता ने बनाया है और उसने भी इसका उलंघन नहीं किया है जब जब उसने अवतार लिया है।)
अज्ञान: all right (ठीक है)
ज्ञान: रामायण में लिखा है
जाने बिन न हुए परतीति, बिन परतीति हुए नही प्रीती, बिन प्रीती नही भक्ति द्रिधई
किसी से प्यार करने के लिए सबसे पहले ज़रूरी है उससे देखना
एंड मोक्ष है तो merge in the source of origin
पर जब तक यही नही पता की origin क्या है merge कैसे होंगे
अज्ञान: ठीक है
तूने अज्ञानी मनुष्य की कहानी सुनी है
ज्ञान: मतलब
अज्ञान: अज्ञानी मनुष्य
उसकी कहानी है एक
ज्ञान: वो कौन है
सुनाओ
btw (by the way) यह है कौन
अज्ञान: एक बच्चा पैदा हुआ
है एक
ज्ञान: ओके
कौन एक
अज्ञान: स्कूल गया
वहां खूब पढ़ाई की
khela kooda
ज्ञान: ok
अज्ञान: लोग क्या करते हैं दुनिया में क्या होता है उससे कोई मतलब नहीं
अपने में मस्त
बड़ा हुआ
कॉलेज गया
खूब मौज मस्ती
पार्टी एडवेंचर
ज्ञान: hmmm
अज्ञान: बड़ा हुआ नौकरी की
अच्छे पैसे कमाए
खूब मौज मस्ती
पार्टी एडवेंचर
उसके बाद
बुड्ढा हुआ
मर गया
बिना किसी टेंशन के
ज्ञान: hmmmm
अज्ञान: कि कहाँ से आया कहाँ गया
तो कैसी रही उसकी लाइफ?
ज्ञान: like an escapist
because he also feel कि कुछ missing hai वो भी खुशी चाहता है।
उसे भी peace चाहिए
पर उसने क्या किया जब भी उसे peace चाहिए वो क्लब में गया दोस्तों के साथ पार्टी कि
और बिना चिंता के मर ही नही सकता
अज्ञान: तू assume कर रही है
ज्ञान: हमेशा किसी चीज़ कि तलाश में वो इन चीज़ों में indulge होता रहा
अज्ञान: क्यों नहीं मर सकता
ज्ञान: but he never tried to find the real source of peace
अज्ञान: ये तो ज़बरदस्ती है न
नहीं है उसे कोई तलाश
ज्ञान: dat u will knw when u die
अज्ञान: ok
ज्ञान: इस संसार में अगर सबसे बड़ा डर कोई है तो वो है मौत का
अज्ञान: ok
ज्ञान: ये किसकी कहानी है
अज्ञान: ये अज्ञानी मनुष्य की कहानी है
ज्ञान: और अज्ञानी मनुष्य को कोई चिंता नही होती
who sed this
अज्ञान: ऐसा ही है अज्ञानी मनुष्य
ज्ञान: ok
अज्ञान: उसको जनम मृत्यु की चिंता नही है
ज्ञान: thats ur philoshphy coz u see ppl at a distance
बहार से सब खुश लगते हैं पास जाके देखो अन्दर से हर इंसान किलसा हुआ है
अज्ञान: हाँ
ज्ञान: हाँ तो क्यूँ किलसे हैं लोग?
अगर उन्हें कोई चिंता नही है
जनम मृत्यु की चिंता नही है
y r ppl running in a rat race
who asked dem to run
अज्ञान: येही तो basic है
ज्ञानी: y does अज्ञानी मनुष्य doesnt think twice playing with any ones feeling
अज्ञानी: अज्ञानी मनुष्य यह नहीं सोचता
ज्ञानी: who sed yeh basic hai
अज्ञानी: कि वो यहाँ क्यों है
यह क्यों कर रहा है
ज्ञानी: and if its basic
अज्ञानी: वो बस जीता है
ज्ञानी: wat drives this basic
u question 100 times and 100 things before buying a meager camera
अज्ञानी: हाँ
ज्ञानी: but no one wants to question y we are doing all dis
अज्ञानी: येही तो
ज्ञानी: ppl feel dat they are just getting driven
अज्ञानी: यह अगर question कर दे वो
तो वोह ज्ञानी बन जाएगा
ज्ञानी: but they dont want to come out it
अज्ञानी: लेकिन वोह तो अज्ञानी है
ज्ञानी: if some one comes and tells them कि ज़िन्दगी कुछ और है इससे बेहतर है
तो वो उस solution को try करना ही नही चाहते
अज्ञानी तब होता है जब उससे पता न चले
अज्ञानी वो नही होता जिसके आगे कोई रोज़ सच का ढोल पीते पर वो फ़िर भी कान में रोई दाल के पढ़ा रहे
अज्ञानी: येही तो अज्ञानी का main character है
ज्ञानी: today the state of world is dat we dont want to awake to reality we dont want to even try a diff viewpoint
वो अज्ञानी नही है
वो मूढ़ बुद्धि है
एंड अंत समय में उसका पछताना निश्चित है
its the higest state of माया
कि सच जान के भी हम आत्मा कि आवाज़ को दबाना चाहते हैं
अज्ञानी: ठीक है ठीक है
मान गए अज्ञानी actually मंद बुद्धि है
ज्ञानी: हम materialism में इतने ग्रसित हैं कि आँख खोलके देखना ही नही चाहते कि सचाई क्या है
अज्ञानी: और उसको पछताना पक्का है
ज्ञानी: our criteria of truth is what is practised by masses
but i can write it on a stamp paper for this अज्ञानी man
कि यह दुनिया की भेड़ चल है सच से विमुख
और आज यह सब जो भी होरहा है यह मार काट, emotions का हनन, breach of all relationships is all coz of the chaos within us....we are so caught in rule of our ego that we dont even feel bad after doing the lowly acts
अज्ञानता के अंधेरे से निकालने वो भगवन ख़ुद इस कीचड में आता है
पर माया का ऐसा परदा है और ego इतना जादा है की हम अपनी गन्दगी को भी उस इश्वर को नही देना चाहते
और उसकी selflessness देखो वो कह रहा है चिला के की अपना बूझ मुझे दे दो में बदले में तुम्हे अता प्रेम और पूर्ण आनंद दे दूंगा पर we silly humans/ animals want to treasure our odds
अज्ञानी: समझ गया
ज्ञानी: i dont knw samjhe ke nahi
अगर समझ गए तो atleast open ur own eyes
अपनी जिद्द पर आधे रहने से कुछ नही होता
अज्ञानी: आज के लिए इतना काफ़ी है
ज्ञानी: तुम्हे जो यह सब बातें बताई जा रही है doesnt leave u an अज्ञानी
समझी गई कितना समझे
बहुत कृपा कर ली उसने तुमपे
और वो करता ही जा रहा है
पर मुझे बहुत दुःख है की तुम उस उलटे बर्तन की तरह पड़े हो जो बारिश होने पे भी खली पढ़ा है (बेहतरीन उपमा)
der is nothing to loose u will gain and gain and gain so please open ur eyes and see wat u r getting grab it its the most precious thing in this universe
अज्ञानी: उल्टा बर्तन
वाह
बहुत बढ़िया use किया उपमा अलंकार का
ज्ञानी: बढ़िया तभी है अगर उसका मतलब समझ जाओ

समझने वाले समझ गए, ना समझे वो अनारी हैं।

Thursday, 26 November 2009

भगवान् का कन्सट्रकसन

कैसे बने भगवान्? किसने बनाया?

सैकरो साल पुराना मन्दिर। पत्थर को तराश कर बनाया गया।
यहीं आस पास बसते हैं वो कलाकार जिनके पूर्वजों ने ये मन्दिर बनाया था।
बेहतरीन कलाकार। बेहतरीन मूर्तियाँ।

कंसलटेंट साहब कुछ मूर्तियाँ खरीदने गए एक कलाकार की दुकान में । एक से एक मूर्तियाँ।
अलग अलग रैक पर सजे अलग अलग भगवान्।
इधर एक लाइन से गणेश जी हैं। उधर एक के ऊपर एक रखे बुद्ध भगवान्।
मनोरम दृश्य।

"वो वाली मूर्ती दिखाइएगा भाई साहब।"
"अरे! अरे! ध्यान से, हनुमान जी गिरे......"
और देखते ही देखते ऊपर के रैक से गिर कर हनुमान जी टूट गए। गए डस्ट बिन में।

इन सारी मूर्तियों में एक भगवान् जो सबसे ज्यादा हैं वो हैं शिव जी। चारो ओर शिव लिंगों की भरमार है।
कोई हथेली में समां जाए, तो कोई ४ लोग मिल कर भी न उठा सकें। हर प्रकार के; बड़े छोटे।

"अरे भाई ज़रा लाइट जला देना।" "उधर ऊपर स्विच है।"
लड़का पहुँच नहीं पा रहा था स्विच तक। वहीँ नीचे रखे बड़े शिव लिंग पर चढ़ा और ऑन कर दिया स्विच।

अरे ये क्या, शिव लिंग पर चढ़ कर, भगवान् पर चढ़ कर।

न न, ऐसा न सोचिये। अभी ये भगवान् नहीं बने हैं। अभी बस मूर्ती हैं।
अभी को इन्हें चूज़ कर के किसी मन्दिर में स्थापित करने ले जाया जाएगा।
फिर पंडितजी इनकी प्राण प्रतिष्ठा करेंगे।
तब होगा इश्वर का पूर्ण निर्माण। अभी तो अधूरे हैं।

तो भाई साहब कनक्लूजन ये है की, इश्वर का निर्माण जिस प्रक्रिया से होता है, वो दो कदम की है।
पहला कदम: कलाकार एक कोरे पत्थर को तराश कर अपनी खूबसूरत, स्मार्ट, हैन्डसम मूर्ती का रूप देता है।
दूसरा कदम: मन्दिर में स्थापना और पूजनीय पंडितजी के द्वारा उनकी प्राण प्रतिष्ठा।

एक साधारण दो कदम की प्रक्रिया। ख़ुद ट्राय करें और फर्क देखें।

Wednesday, 25 November 2009

मेहनत की कीमत

रजनीश एक बहुराष्ट्रिय कम्पनी में काम करता है। भारत की, भारत में, अपनी फील्ड में एक अग्रिणी कम्पनी।
हर आम आदमी की तरह वो भी आगे बढ़ना चाहता है।
पैसे, इज्ज़त, ओहदा। वही जो हर (नॉर्मल) इंसान चाहता है।

मेहनत से पसीना बहाता है। फील्ड वर्क पर ऐसी जगह जाना जहाँ लोग जाना नहीं चाहते हैं (सिक्यूरिटी इस्सुज़)।
गर्मी हो या सर्दी, धुप हो या छाव, सूखा हो या बरसात। कभी दौड़ भाग करने में एक बार भी नहीं सोचा।
थ्योरी: मेहनत से इंसान सब कुछ पा सकता है।

रजनीश को मिली उसकी मेहनत की कीमत:
ओहदा: साल दर साल वही जो पहले था
(लोग रजनीश के बाद आए, उसके ऊपर काम किया, गए। और लोग आए, उसके ऊपर काम किया, गए। रजनीश ऊपर न उठ सका, आज भी वहीं है।)
इज्ज़त: वही जो तब थी जब काम शुरू किया था, या शायद उससे कम।
पैसा: मूंगफलियाँ (अंग्रेज़ी में कहते हैं पीनटस)।

हर बार जब रजनीश काम करके ऑफिस लौटता है, तो मन में सोचता है," इस बार बड़ी मेहनत से काम किया है, शायद अब आगे बढ़ने का मौका मिले।"
परन्तु हर बार काम में कुछ कमी, कुछ गलती निकल ही आती है। आज काम भी वहीं है, और रजनीश भी।

शायद गलती रजनीश की ही है। शायद वो काम ठीक से नहीं कर पाता है। शायद आगे बढ़ने के लिए और इम्प्रूवमेंट की ज़रूरत है।

क्नक्लूजन: मेहनत की क्या कीमत है? कोई कीमत नहीं हैं।
कीमत है परिणाम की।
चाहे आपकी गलती हो न हो (पूरी या आधी), अगर काम सही नहीं तो दाम सही नहीं।


Saturday, 21 November 2009

जनम मृत्यु

जिले का हेडक्वार्टर।
कांसलटेंट साहब कुछ कृषि से सम्बंधित डाटा की तलाश में भटक रहे थे।

कृषि विभाग वाले कृषि मेला को लेकर बहुत बिजी चल रहे हैं। तो साहब आप जाकर सांख्यिकी (स्टेटिसटिक्स) वालों से संपर्क करें।

एक अंधेरे कोठरी। छत पर मकरी के जाले। एक दो पुराने बल्ब लटक रहें हैं छत से लंबे वायर्स के द्वारा। एक बल्ब जल भी रहा है। कमरे में 8-10 पुरानी अलमारियां। अलमारियों से फाइलें और अन्य सरकारी कागज़ झांक रहे हैं। अलमारियों के ऊपर उन्ही फाइलो और कागजों के पहाड़। ऐसी ही हालत कमरे में पड़ी मेजों की भी है।

दो बाबु बैठे हैं। पान को मुह में दबाने ही वाले हैं कि कांसलटेंट साहब ने टोका....
"साहब ये कृषि से सम्बंधित कुछ डाटा चाहिए था।"
"क्या चाहिए?"
"जी यही कुछ उपज, आछादन इत्यादि के बारे में।"
"तो यह सब तो कृषि विभाग में मिलेगा।"
"जी वो तो आज कल बिजी है। कृषि मेला चल रहा है न।"
"अच्छा तो यहाँ तो मिल जाएगा लेकिन....."
(कमबख्त यह लेकिन हमेशा आ जाता है)
"लेकिन ये काम सिया बाबु के जिम्मे है।"
"जी कब तक आएंगे वो।"
"देखिये, कुछ कह नहीं सकते हैं।" "आप ऐसा कीजिये, नगर पालिका में, जनम मृत्यु में चले जाइए।"
"वहां मिलेंगे क्या वो?"
"हाँ उनपे अतिरिक्त भार है, जनम मृत्यु का। सो, देख लीजिये एक बार।""वहां पूछ लीजिये गा, सिया राम सिंह (सिया बाबु) को।"

चल पड़े कांसलटेंट साहब नगर पालिका में जनम मृत्यु की ओर।

नगर पालिका के गेट में एंट्री। बायीं ओर मसाले बेचने वाला। आगे सब्जी की मिनी मंडी लगी हुई है।
आलू, प्याज़, टमाटर, बैगन से सज़ा हुआ है नगर पालिका। साथ ही इन सब से निकली गंदगी। आलू के छिलके, गोभी के पत्ते, प्याज़ के छिलके चार चाँद लगा रहे हैं।
इन सब के बीच में पानी और कीचड़ जमा हुआ।
किसी तरह बचते बचाते, फिसलते संभलते आगे बढे।

नाला बह रहा है। सामने एक टूटा फूटा दो महला घर सा दिख रहा है।
"अरे भाई! ये जनम मृत्यु......?"
"सामने.... ऊपर चले जाइए।"

सकरी सी सीढ़ी। ऊपर पहुचे।
"ये, जनम मृत्यु...?"
"उधर।"

जनम मृत्यु के एक छोटे से कमरे में बैठे एक बाबु। साक्षात चित्रगुप्त। जन्म मृत्यु का हिसाब चल रहा है।
"जी सिया बाबु.....?"
"कहिये, हम ही है।"

पते की बात ये है की जिस विकट जगह पर जनम मृत्यु का पंजीकरण करने वाले ये संकट मोचन, सिया बाबु बैठे हुए हैं, मैं शर्त के साथ कहता हूँ की अगर कोई जनम का पंजीकरण करवाने आएगा तो वापस जाते जाते मृत्यु का पंजीकरण अवश्य करवाता जाएगा।

इश्वर हर पंजीकरण करवाने वाले और उसकी आत्मा को शान्ति दे।

Friday, 20 November 2009

तेरी परवाह करता हूँ मैं माँ

छोटा सा गाँव, एक छोटा सा घर।
खपरे से बनी छत, मिटटी से बनी दीवारें।

शाम ढल चुकी है। ठंढ का मौसम।

बरामदे में लालटेन की मद्धम रौशनी में बैठी माँ स्वेटर बुन रही है।

छोटे कूदता फांदता हुआ खेल कर लौटा।
झटाक से कूद कर माँ की गोद में।
वो आराम, ठंढ से बचाओ, सुरक्षा का एहसास और कहाँ?

माँ कहती है: चलो उठो खाना बनाना है।
छोटे: नहीं!!!!
माँ: ऐसे बैठे रहेंगे तो खाना कौन बनाएगा?
नन्हाँ छोटे: माँ मेरी शादी करवा दो।
फिर मेरी बीवी खाना बनाएगी और तुम मुझे गोद में ले के बैठना.......


Thursday, 19 November 2009

प्रेसर जो न करवाए

आज कल लोग प्रेसर में क्या क्या नहीं करते?

चिंटू के प्रेसर में न चाहते हुए भी पापा को उसे सनेमा दिखाने ले जाना पड़ता है।
पापा के प्रेसर में संगीत की शिक्षा प्राप्त करने की इक्षा रकने वाले चिंटू को इंजिनियर बनना पड़ता है।

लोगों के प्रेसर में नेताजी को संसद रोकना पड़ता है।
नेताजी के गुंडों के प्रेसर में आके लोगों को नेताजी को वोट देना पड़ता है।

शराब के प्रेसर में आके जीतेंद्र को गाड़ी तेज़ चलानी पड़ती है।
गाड़ी के प्रेसर में आके शराब से धुत्त जीतेंद्र की सड़क पे जान चली जाती है।

बॉस के प्रेसर में आके राहुल को टेंशन हो जाता है।
टेंशन के प्रेसर में आके राहुल का बॉस से झगड़ा हो जाता है।

लड़के वालों के प्रेसर में आके लड़की वालों को ज़मीन बेच के दहेज़ पूरा करना पड़ता है।
लड़की के प्रेसर में आके लड़के को अपने घर वालों से अलग होना पड़ता है।


साहब इतना कुछ करते हैं लोग प्रेसर में.......

और हम बेचारे तो बस प्रेसर में, सड़क के किनारे, दीवाल के पीछे, पेड़ के बगल में
सुसु ही तो करते हैं.......

साहब प्रेसर होता ही है ऐसा। क्या क्या नहीं करवाता है आदमी से।

Wednesday, 18 November 2009

किसान और बैल

गाँव का एक घर। घर में ही है पोस्ट ऑफिस गाँव का।
कुर्सियाँ लगी हुई हैं। खटिया बिची हुई थी।
बेदा बाबु (वेद प्रकाश शर्मा) और कंसलटेंट साहब बैठे हुए हैं। और ग्रामीण भी हैं।

बेदा बाबु: 'सर ई खेती से तो इतना परेशान हैं। एगो ट्रक्टर भाड़ा पे चलवाते हैं तो साल में उससे भी खेती से जादे पैसा बच जाता है। खेती में तो कुछ कामे नै चल रहा है।"
कंसलटेंट साहब: "लेकिन बेदा बाबु, सब लोग ट्रक्टर चलवाने लगेगा त खेती कौन करेगा?"

बेदा बाबु: "एगो बात बताते हैं सर।"

"खेत में मेहनत के करता है?
बैल।
उपज जो धान का होता है ऊ खाते हैं हमलोग।
अ बेचारा बैल को त बाजरा भी नै मिलता है खाने के लिए। उसको मिलता है भुस्सा।

बैल कोनो दिन काम करने से मन कर दिया त?
लेकिन बैल ऐसा कर सकता है?

इहे हाल है किसान का सर।"

Monday, 16 November 2009

औरत और भैंस

राल रंग की सूमो गाड़ी तेज़ी से चली जा रही थी।
गाड़ी मैं दो प्राणी।
एक ड्राईवर
और दूसरे थे एक कंसलटेंट साहब।

आपकी जानकारी के लिए बता दूँ की ये जो कंसलटेंट होते हैं, ये एक ख़ास प्रजाति के लोग होते हैं।
कंसलटेंट होता है एक्सपर्ट।
किस चीज़ का?
साहब कंसलटेंट का काम होता है राय देना। और यह लोग हर चीज़ पर राय दे सकते हैं।
कंसलटेंट को हर चीज़ की जानकारी होती है और वो हर चीज़ पर राय दे सकता है।

तो जो कंसलटेंट साहब सवार थे, वो थे भी बड़े पुराने आदमी। उनकी जानकारी के दायरे में कृषि, पर्यावरण, उर्जा, अर्थव्यवस्था से ले कर बाकि जितनी चीज़ें गिन सकते हैं, आप वो सब चीज़ें थी।
तो आप तो अंदाजा लगा ही सकते हैं उनके ज्ञान का और उनकी कही बात के वज़न का।

तो इस तेज़ चलती गाड़ी के सामने अचाना सड़क पार करने को एक महिला दौड़ी। ड्राईवर दूर से ही होर्न बजा रहा था लेकिन महिला जान देने पर उतारू थी।
बमुश्किल एक्सिडेंट होने से बचा।

ड्राईवर ने कंसलटेंट साहब के सामने अपने सही होने का तर्क दिया।
"साहब में तो दूर से ही होर्न बजाता आ रहा था।"

कंसलटेंट साहब
"अरे बेवकूफ! गलती तुम्हारी ही तो है। तुम्हें पता नहीं है की औरत और भैंस पर होर्न का कोई असर नै पड़ता।"
"औरत और भैंस को होर्न मारोगे तो वो और तुम्हारी ही तरफ़ भागेगी।"
"तो ध्यान से चलाओ। गलती तुम्हारी है।"

तो साहब बच के रहें, 'औरत और भैंस' से।

Thursday, 12 November 2009

नज़रिए का नजराना

हिंदुस्तान
बोध गया:
मेरी समझ से ये है, बोध + गया।
मतलब गया, जहाँ बोध की प्राप्ति हुई।
इम्पोर्टेंट गया है। यहाँ बोध की प्राप्ति होती है। या यहाँ बोध की प्राप्ति हुई थी।
बुद्ध गया के कारण हुए। यहाँ उन्हें ज्ञान की प्राप्ति हुई थी।

श्रीलंका
बुद्ध गया (बोध गया को श्रीलंका में इसी नाम से बुलाते हैं):
मेरी समझ से, बुद्ध + गया।
मतलब बुद्ध का गया।
इम्पोर्टेंट हैं बुद्ध। गया का नाम बुद्ध से है। बुद्ध के कारण गया है।

मेरे हिसाब से दोनों शायद सही हैं। बस नज़रिए का फर्क है। अपना हिसाब है और अपनी किताब है।


नोट: ये मेरे कानफ्यूजड दिमाग की कानफ्यूजन भरी उपज है। कृपया बुरा न मानें।



Wednesday, 11 November 2009

औकाद क्या है तुम्हारी

छोटी सी नदी। सूखी हुई।
उसपर छोटा सा एक पुल।

थोड़ा पानी बचा हुआ है नदी में। सकरी सी एक धारा बह रही है।

पुल के ठीक नीचे, धारा में पुआल के कुछ पुलिंदे पड़े हुए हैं।
एक आकार सा है पुलिंदों से बना हुआ।

एक छोटा सा सर।
एक छरहरा बदन।
दो पैर।
दो हाथ।

शायद कोई पुतला रहा होगा।

नदी में पड़ा हुआ है। ज़रूर किसी भगवान् का रहा होगा जिनका विसर्जन हो गया।

यह पुआल का पुलिंदा कुछ दिन पहले दुर्गा माँ, काली माँ, सरस्वती माँ, गणेश भगवान्, शिवजी इत्यादि इत्यादि में से कोई रहा होगा कुछ दिन पहले।
कुछ दिन पहले, दिन रात इसकी पूजा हो रही होगी।
फूल, धुप, दीप, अगरबत्ती से इसे खुश करने की कोशिश की जा रही होगी।
फल, मिठाइयों इत्यादि के चढावे चढ़ रहे होंगे।

और आज।
एक छोटी सी सूखी नदी के, एक छोटे से पुल के नीचे, एक छोटी सी धारा में पड़ा पुआल का एक पुलिंदा मात्र है।

यह तो हश्र हो गया है उसका जो कुछ दिन पहले भगवान् था,
तो
औकाद क्या है तुम्हारी.........और मेरी।

Tuesday, 10 November 2009

माँ सा एहसास: होस्टेस आंटी

एयर इंडिया में सफर (हिन्दी और अंग्रेज़ी दोनों में) करने की एक ही अच्छी बात है।
बढ़िया खाना।

और अगर आपको घर के बाहर होते हुए भी बढ़िया खाना मिले तो क्या बात।
और सोने पे सुहागा, खाना मिले माँ के हाथों से।

बस यही तो यू एस पी है एयर इंडिया की।
बढ़िया खाना माँ तो न सही, लेकिन उनसे बहुत ही करीबी दिखने वाली और व्यवहार करने वाली 'आंटियों'(चाचियों) से मिले। बस मन मोह ले जाती हैं यह अदा।

सेक्टर: दिल्ली से पटना
कैरियर: एयर इंडिया

पटना तक बहुत बार सफर किया है मैंने। कई बार हमारे जैसे ही देसी लोग मिलते हैं हवाई जहाज में। थोड़े सोफेस्टिकेटेड मैनर्स की कमी वाले। इन चीज़ों की जानकारी से अनिभिज्ञ हैं थोड़े।

पैसेंजर एयर होस्टेस से (पानी चाहिए था) : स्स्स्स्स्स्स्स्स्स स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स पानी मिलेगा क्या?
आंटी: नहीं! स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स नहीं बोलते। 'एक्सक्यूज़ मी' बोलते हैं।

खैर! पानी तो पिला ही दिया आंटी ने उन साहब को (बोतल और बातों दोनों से)

माँ सा एहसास,
आपके लिए ख़ास।
आपका ही अपना, एयर इंडिया।

Monday, 9 November 2009

राष्ट्र और महाराष्ट्र

भारत क्या है?

एक राष्ट्र।

और राष्ट्र में है महाराष्ट्र।

ऐसा कैसे हो सकता है?

महा - राष्ट्र तो ज़ाहिर सी बात है राष्ट्र से बड़ा होगा।

तभी तो भइया राष्ट्र भाषा का इतना विरोध।
छोटे से राष्ट्र की छोटी सी भाषा की क्या औकाद, महा - राष्ट्र के सामने।


Saturday, 7 November 2009

भावी प्रधानमन्त्री

पटना से बेगूसराय की ओर।

रास्ता एहसास दिला रहा है कि अभी कुछ दिन पहले एक बड़ी पार्टी की रैली हुई थी।
रा ज द (राज्य जालदल में)

जगह जगह बैनर, पोस्टर। नेताओं के स्वागत में पंक्तियाँ।
फोटो लगे हुए थे महान नेता श्री भालू प्रशाद बाअदब और उनकी वाईफ मलाई देवी की।

लेकिन यह सब तो आम बात है।
ख़ास बात जो मैंने देखि वो बस एक लाइन में लिखी हुई थी। एक बैनर...

"स्वागत है भावी प्रधानमन्त्री जी श्री भालू प्रशाद बाअदब का।"
'भावी प्रधानमन्त्री?' यह कब, कैसे कहाँ हुआ?
इनोवेशन की हद है साहब।

खैर एक पार्टी जिसके लोक सभा में सिर्फ़ 3 ऍम पी हों वो अपने नेता को प्रधानमन्त्री बना सके या न, सोचने का पैसे थोड़े लगेगा। तो सोचें ज़रूर सोचें।

हम भी स्वागत करते हैं महान नेता और भावी प्रधानमन्त्री जी का।

Tuesday, 3 November 2009

मेरी वाली

बिहार का कॉलेज:

एक लड़के को एक लड़की पसंद आ गई।
लड़की को पता नहीं।

एक दूसरा लड़के ने लड़की को लाइन मारी (कैसे मारते हैं मत पूछियेगा, कोई डेफिनिशन नहीं है अक्चुअली)।

पहले लड़के ने पकड़ के उसे बहुत पीटा।
"साले! 'मेरी वाली' को लाइन मारता है।"

सवाल: क्यों भइया? लड़की आपकी बपौती है क्या? आपके लड़की को देखते ही एन्गेजमेंट हो गई है उससे आपकी?

मिलता जुलता किस्सा:
तुम जो कर रहे हो वो सही नहीं है। ऐसे भगवान् अप्रसन्न हो जायेंगे।
तुम जीवन सही नहीं जी रहे हो। ये तरीका नहीं है भगवान् को पाने का।
मैं जो बता रहा हूँ वो रास्ता सही है। उसपर चलो।

सवाल: क्यों भइया? धर्म और इश्वर आपकी बपौती हैं क्या?

आज कल रोज़ धर्म और इश्वर के एक ठेकेदार पैदा हो रहे हैं।

नोट:मुझे ज्ञान नहीं है कि इस केस में लड़की (इश्वर) को पता है या बस लड़के (ठेकेदार) को वो पसंद आ गई है तो वो बाकी लाइन मारने वालो (अपने तरीक से अराधना करने वाले) को पीट रहा है।