Wednesday, 11 November 2009

औकाद क्या है तुम्हारी

छोटी सी नदी। सूखी हुई।
उसपर छोटा सा एक पुल।

थोड़ा पानी बचा हुआ है नदी में। सकरी सी एक धारा बह रही है।

पुल के ठीक नीचे, धारा में पुआल के कुछ पुलिंदे पड़े हुए हैं।
एक आकार सा है पुलिंदों से बना हुआ।

एक छोटा सा सर।
एक छरहरा बदन।
दो पैर।
दो हाथ।

शायद कोई पुतला रहा होगा।

नदी में पड़ा हुआ है। ज़रूर किसी भगवान् का रहा होगा जिनका विसर्जन हो गया।

यह पुआल का पुलिंदा कुछ दिन पहले दुर्गा माँ, काली माँ, सरस्वती माँ, गणेश भगवान्, शिवजी इत्यादि इत्यादि में से कोई रहा होगा कुछ दिन पहले।
कुछ दिन पहले, दिन रात इसकी पूजा हो रही होगी।
फूल, धुप, दीप, अगरबत्ती से इसे खुश करने की कोशिश की जा रही होगी।
फल, मिठाइयों इत्यादि के चढावे चढ़ रहे होंगे।

और आज।
एक छोटी सी सूखी नदी के, एक छोटे से पुल के नीचे, एक छोटी सी धारा में पड़ा पुआल का एक पुलिंदा मात्र है।

यह तो हश्र हो गया है उसका जो कुछ दिन पहले भगवान् था,
तो
औकाद क्या है तुम्हारी.........और मेरी।

3 comments:

  1. भगवान की औकात इतनी ही रह गई है।

    देखिए न इंसान की औकात तो इतनी है कि भगवाने की औकात के बहाने अपनी औकात पर ही प्रश्न उठा रहा है ! अब कितनी औकात चाहिए ?

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  2. औकाद होता है कि औकात?
    अगर औकाद के कुछ अलग अर्थ हैं तो माफ करिएगा, गलत पढ़ कर कमेंट कर गया।

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  3. राव साहब इंसान की औकाद की बात तो आपने सही ही कही. काफी बढ़ गयी है वोह. ऊपर वाले पर ही प्रश्न उठा रहा है.

    वैसे औकाद और औकात के असमंजस को तो मैं दूर करने की स्थिति में तो नहीं हूँ में. हिंदी (या कहूँ उर्दू) का ज्ञान थोडा सीमित है हमारा. वैसे मैं औकाद ही जानता हूँ. और कोई महाशय/मोहतरमा अगर यह पोस्ट पढें (जिसकी प्रोबबिलिटी काफी कम है) तो कृपया इस असमंजस को दूर करें.

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