Friday, 20 November 2009

तेरी परवाह करता हूँ मैं माँ

छोटा सा गाँव, एक छोटा सा घर।
खपरे से बनी छत, मिटटी से बनी दीवारें।

शाम ढल चुकी है। ठंढ का मौसम।

बरामदे में लालटेन की मद्धम रौशनी में बैठी माँ स्वेटर बुन रही है।

छोटे कूदता फांदता हुआ खेल कर लौटा।
झटाक से कूद कर माँ की गोद में।
वो आराम, ठंढ से बचाओ, सुरक्षा का एहसास और कहाँ?

माँ कहती है: चलो उठो खाना बनाना है।
छोटे: नहीं!!!!
माँ: ऐसे बैठे रहेंगे तो खाना कौन बनाएगा?
नन्हाँ छोटे: माँ मेरी शादी करवा दो।
फिर मेरी बीवी खाना बनाएगी और तुम मुझे गोद में ले के बैठना.......


4 comments:

  1. अंकित जी
    सादर वन्दे!
    इससे अच्छी कविता माँ के लिए क्या हो सकती है.
    लेकिन लोगों को माँ वही से भूल जाती है जहाँ आपने कविता समाप्त की है,
    लेकिन कुछ बेटे ऐसे भी होते है जो कहते हैं,
    किसी को घर मिला हिस्से में किसी के हिस्से में दुआ आई,
    मै घर में सबसे छोटा था मेरे हिस्से में माँ आई.
    रत्नेश त्रिपाठी

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  2. लाजवाब अभिव्यक्ति । बधाई

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  3. क्या बात है!! कितनी मासूम अभिव्यक्ति है!!

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  4. @आर्य: सादर वन्दे त्रिपाठी जी. आपकी बात सत्य है. माँ को अक्सर लोग कविता और कहानी के आगे भूल जाते हैं. लेकिन आपके हिस्से मैं जो आया है वोह किसी भी घर के हिस्से या एक दुआ से बढ़ कर है. वोह है जिंदगी भर के लिए अनलिमिटेड सच्ची दुआओं का सपलाय.

    @ दूबेजी: बहुत बहुत धन्यवाद साहब.

    @उड़न तस्तरी: कभी कभी जीवन का साचा इतना मासूम होता है.

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