Thursday, 26 November 2009

भगवान् का कन्सट्रकसन

कैसे बने भगवान्? किसने बनाया?

सैकरो साल पुराना मन्दिर। पत्थर को तराश कर बनाया गया।
यहीं आस पास बसते हैं वो कलाकार जिनके पूर्वजों ने ये मन्दिर बनाया था।
बेहतरीन कलाकार। बेहतरीन मूर्तियाँ।

कंसलटेंट साहब कुछ मूर्तियाँ खरीदने गए एक कलाकार की दुकान में । एक से एक मूर्तियाँ।
अलग अलग रैक पर सजे अलग अलग भगवान्।
इधर एक लाइन से गणेश जी हैं। उधर एक के ऊपर एक रखे बुद्ध भगवान्।
मनोरम दृश्य।

"वो वाली मूर्ती दिखाइएगा भाई साहब।"
"अरे! अरे! ध्यान से, हनुमान जी गिरे......"
और देखते ही देखते ऊपर के रैक से गिर कर हनुमान जी टूट गए। गए डस्ट बिन में।

इन सारी मूर्तियों में एक भगवान् जो सबसे ज्यादा हैं वो हैं शिव जी। चारो ओर शिव लिंगों की भरमार है।
कोई हथेली में समां जाए, तो कोई ४ लोग मिल कर भी न उठा सकें। हर प्रकार के; बड़े छोटे।

"अरे भाई ज़रा लाइट जला देना।" "उधर ऊपर स्विच है।"
लड़का पहुँच नहीं पा रहा था स्विच तक। वहीँ नीचे रखे बड़े शिव लिंग पर चढ़ा और ऑन कर दिया स्विच।

अरे ये क्या, शिव लिंग पर चढ़ कर, भगवान् पर चढ़ कर।

न न, ऐसा न सोचिये। अभी ये भगवान् नहीं बने हैं। अभी बस मूर्ती हैं।
अभी को इन्हें चूज़ कर के किसी मन्दिर में स्थापित करने ले जाया जाएगा।
फिर पंडितजी इनकी प्राण प्रतिष्ठा करेंगे।
तब होगा इश्वर का पूर्ण निर्माण। अभी तो अधूरे हैं।

तो भाई साहब कनक्लूजन ये है की, इश्वर का निर्माण जिस प्रक्रिया से होता है, वो दो कदम की है।
पहला कदम: कलाकार एक कोरे पत्थर को तराश कर अपनी खूबसूरत, स्मार्ट, हैन्डसम मूर्ती का रूप देता है।
दूसरा कदम: मन्दिर में स्थापना और पूजनीय पंडितजी के द्वारा उनकी प्राण प्रतिष्ठा।

एक साधारण दो कदम की प्रक्रिया। ख़ुद ट्राय करें और फर्क देखें।

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