Thursday, 31 December 2009

फिल्मी वैरी फिल्मी

वो बचपन से ही काफी फ़िल्मी मिजाज़ का था।
बिहार के एक छोटे से गाँव (वैसे गाँव तो बहुत बड़ा है, लेकिन अक्सर लेखक छोटे गाँव का ज़िक्र करते हैं इसलिए...) का रहने वाला संटू (संतोष) हमेशा से फिल्मों से प्रभावित रहा।
स्कूल में था तभी उसने माधुरी दीक्षित को ख़त लिखा है। ख़त में क्या लिखा था ये तो नहीं मालूम जनाब लेकिन जवाब में दीक्षित जी की एक औटोग्राफ की हुई फोटोग्राफ ज़रूर आई। चर्चा पूरे टोले, पूरे गाँव में ही नहीं बाकि आस पास के पाच- दस गावों तक पहुची।
मैंने भी बचपन में गाँव के छोटे थेटर (जहाँ बेंचें लगी हुई थीं और टीवी और वीसीआर पर पिक्चर दिखाई जाती थी) संटू के साथ दो चार पिक्चर देखी होगी। एक याद है मुझे, 'सनम बेवफा'।

खैर फ़िल्मी अंदाज़ और फिल्मों का शौक़ीन संटू आगे चल के सेना में भारती हो गया।
पोस्टिंग हुई जम्मू कश्मीर में। पहरा था वैष्णोदेवी के रास्ते में। भक्तों की सुरक्षा की ज़िम्मेदारी।

एक दिन, एक लड़की माता के दर्शन को चली।
लम्बे रास्ते और लगातार चढ़ाई के कारण रास्ते में ही थकान के कारण गिर पड़ी बेहोशी से।
माता की माया देखिये, भक्त को गिरने नहीं दिया।

पास ही संटू का पहरा था। जैसे ही लड़की गिरने लगी, संटू ने कूद कर उसे अपनी मज़बूत बाँहों का सहारा दिया।
(जैसे की ये सीन स्लो मोसन में हुआ हो और पीछे गाना बज रहा हो.....तुझे...देखा..... तो ये जाना....सनम...)

खैर लड़की को सहारा दिया, संभाल कर कैंप हॉस्पिटल ले गए।
लड़की को होश आया। "कहाँ हूँ में? कौन हैं आप?"
"राहुल, नाम तो सुना ही होगा आपने।"
नहीं नहीं। ऐसी कोई डायलोगबाज़ी नहीं हुई (लेखक की कल्पना)

खैर साहब, इस फ़िल्मी सीन से शुरू हुई एक प्रेम कहानी।
लड़की मुंबई (फिल्म नगरी) की और लड़का बिहारी (फिल्म नगरी की चाहत वाला)।

आज दोनों हप्पिली मैरिड हैं दो नन्हे मुन्नों के साथ।

क्यों है न..... फ़िल्मी वैरी फिल्मी

Tuesday, 15 December 2009

अगले जनम इन्हें बिटिया ही दीजो

बड़कू के लिए रिश्ता आया है। चौबे जी की लड़की का।
बड़ा अच्छा परिवार है। चौबे जी की 4 बीवियों से 6 बेटियां हैं।
और आख़िर में इश्वर की दया से एक बेटा।

पुत्र मोह में क्या क्या पापड़ बेले।
4 विवाह। लोग तो एक सह नहीं पाते हैं। और चौबे जी ने 4 किले फतेह किए।
आज कल की दुनियां में लोग एक बेटी के विवाह के लिए परेशान रहते हैं। चौबे जी 4 को निबटा कर पांचवी का काम तमाम करने निकले हैं। छठ्ठी तक पहुचते पहुचते छठ्ठी का दूध न याद आ जाए।

पुत्र का पता नहीं कौन सा ऐसा मोह था जो चौबे जी ने इतने युद्ध लड़े। वंश के ख़त्म होने का भय या दहीज़ की इक्षा?
खैर जो भी बात रही हो चौबे जी की कथा सुन कर अनायास ही मेरे मन से आवाज़ आई....

अगले जनम भी इन्हें बिटिया ही दीजो........

Monday, 14 December 2009

यमदूत को रोज़ाना चकमा

शाम ढल चुकी थी। अँधेरा घिर रहा है।
ऑफिस से एक बहुराष्ट्रीय कंपनी में काम करने वाला रजनीश अपनी "पक्की मर्द" मोटर साइकिल से घर की ओर निकला।
सड़क के किनारे काफ़ी धूल और मिटटी पड़ी हुई है। गाड़ी फिसलते फिसलते बची।
आगे जाके, सड़क पर तेज़ चलती और गाड़ियों से बचा कर यू टार्न लिया।
सड़क पर अँधेरा है (स्ट्रीट लाइट जैसी चीज़ से अंजान हैं यहाँ के लोग)। सड़क टूटी फूटी। कब कोई गड्ढा सामने आ जाए पता ही न चले। खैर, बचते बचाते मोटर साइकिल आगे बढ़ी।
आगे गोलचक्कर से दायें जाना है। सामने वाले ट्रक को ओवर टेक किया और दाई ओर का सिग्नल दिया। दायें मुड़ने वाले ही थे की बगल में वही ट्रक तेज़ी से आता हुआ दिखा। अगर अभी मुड गए होते तो बस शरीर पर ट्रक के चक्कों के निशान होते।
चलो यमदूत नंबर वन से बचा।

अगले गोलचक्कर से जैसे ही आगे बढ़ी मोटर साइकिल, तो अंधेरे में से अचानक उजागर हुआ एक ठेला। ठेले पर लदी लम्बी लम्बी लोहे की छरें शेषनाग की जीभ की तरह लपलपा रही थीं। अचानक ब्रेक मारा और बच कर निकला।
यमदूत नंबर टू भी फेल।

आगे चले। सड़क पर घुप अँधेरा (पहले बताया था, स्ट्रीट लाइट से अनिभिज्ञ हैं यहाँ के लोग)। सामने से आते वाहनों से चकाचौंध रौशनी (सब के सब हाई बीम में चलते हैं गाड़ी)। आँखें चोंधिया रहीं थी। रजनीश ने सोचा धीरे धीरे सड़क के किनारे में चलता हूँ मोटर साइकिल।
और तभी अंधेरे में सड़क के किनारे प्रकट हुए ट्रक महोदय। पीछे से शिव जी के त्रिशूल की भांति बांस की बल्लियाँ निकल रहीं थी। रीढ़ की नस ने इशारा किया, पैरों और हाथों ने ब्रेक को झट से दबाया और....
यमदूत नंबर थ्री को भी चकमा।

आगे बढ़ी "पक्की मर्द" मोटर साइकिल अपनी "कच्चे मर्द" सवारी को लेकर। अरे ट्रेफिक लाइट फेल। गाड़ियों ने तो अभी चौराहे पर ग़दर मचा दिया होगा। चौराहे पर पहुचते ही अंधेरे में दिखे हमारे मेहनती ट्रेफिक पुलिस। घुप्प अंधेरे में, चौराहे के बीचों बीच, बिना किसी रौशनी या इंडिकेटर के गाड़ियों को इधर उधर जाने का इशारा दे रहे हैं। समय पर घ्यान नहीं जाता तो आज या तो उनकी टक्कर "पक्के मर्द" से हो जाती, या "कच्चे मर्द" का आज चालान कट जाता।
खैर यमदूत नंबर फोर भी कुछ न बिगाड़ सका।

रोज़ इस रास्ते पर चलने का "पक्के मर्द" और "कच्चे मर्द" दोनों को एक्स्पीरिएंस है।

लोग कहते हैं, भाई जब रोज़ इतने खतरे से जूझते हो तो या तो एक कार खरीद लो या फिर सेना में भरती हो जाओ, कम से कम देश के लिए तो शहीद होगे।

साहब इस प्रगतिशील भारत की यही कहानी है। हम पश्चिमी देशों को उत्पादन के मामले में टक्कर दे रहे हैं। वो जो माल बनाते हैं, जो सेवायें वो देते हैं, वही हम उनसे आधे दामों में दे कर उनसे बाज़ी मार रहे हैं।
परिणाम ये है की जो बांस और सरिया उनके यहाँ बंद कंटेनर में ले जाए जाते हैं (ताकि राहगीरों को परेशानी न हो), वो हमारे यहाँ खुले ठेलों या ट्रकों पर जाते हैं और दूसरों के लिए यमदूत का रूप बनते हैं।

रही कार लेने की बात, तो साहब रजनीश बेचारे को दफ्तर से महीने में जो "मूंगफलियाँ" मिलती हैं, उनमें या तो वो अपना पेट ही भर ले या कार में तेल ही डलवा ले।
सुना ही होगा आपने, "नंगा नहाए क्या और निचोरे क्या?"

Wednesday, 9 December 2009

दहेज़ मर्दों के लिए परेशानी

हमारे इलाके में यदि आप लड़की के पिता हैं तो उसके पैदा होते ही आपकी चिंता शुरू हो जाती है। पैसे जोड़ना शुरू कर दिया जाता है। सामन संजोये जाते हैं।
यदि आप अपनी लड़की के लिए अच्छा लड़का चाहते हैं तो आपको उसके लिए अच्छी पेमेंट करने के लिए तैयार रहना चाहिए। अगर आप ऐसा कर सकते हैं तो जैसा चाहें लड़का आपका दामाद बन सकता है।

ये तो साहब पेमेंट की बात थी।
ज़माना बदल रहा है। आज कल पढ़ी लिखी, आउटगोइंग लडकिया होती हैं। तो साहब अगर आपकी लड़की इस तरह की है और आपके पास माल भी है तब तो बेस्ट डील मिल सकती है।
तो आज कल की एवेलेवल लड़कियों और उनके लिए ढूंढें जा रहे लड़कों की थोड़ी जानकारी देन आपको:
1. थोड़ी पढ़ी लिखी लड़की। पैसे वाला बाप:
बढ़िया इंजिनियर, डॉक्टर या ऍम बी ए लड़का ढूंढेंगे और बस पेमेंट कर देंगे।
2. बढ़िया पढ़ी लिखी समझदार लड़की, ठीक ठाक पैसे वाला बाप:
और बेहतर लड़का ढूंढेंगे। काबिल लड़की और पैसे का मिश्रण कर के फाइनल।

अब सिचुएसन यह है कि बेचारा रमेश एक नारमल सा इंजिनियर है और बढ़िया पढ़ी लिखी लड़की चाहता है।
उसके पास पैसे वाले बाप अपनी लड़की के लिए उसको खरीदने आ रहे हैं और जो पढ़े लिखे केंडिडेट हैं उनका दिमाग चढ़ा हुआ है (पढ़ाई + पैसा)। रमेश को दहेज़ से मतलब नहीं है लेकिन लड़की के पिता को तो है।

तो कैसे होगी रमेश कि शादी? जो दहीज़ (पेमेंट पर जैसा चाहें लड़का खरीद सकें) प्रथा लड़कियों के लिए अभिशाप थी, क्या आज एक नारमल लडको को बढ़िया लड़की से शादी करने का हक़ खोना पड़ेगा?
शायद हाँ।

तो हमारे इलाके में आप अगर एक नारमल लड़के के पिता हैं तो आपकी चिंता शुरू हो गई है।

Sunday, 6 December 2009

मेहनत की कीमत २

मेहनत की कीमत क्या है?

सतीश कई सालों से सरकारी कर्मचारी है। मेहनत से काम करता है। खून तो नहीं पर पसीना बहुत बहाता है।
इमानदारी से काम करने की वजह से कई बार तबादले हुए हैं। लेकिन मेहनत और इमानदारी का कीड़ा गया नहीं।
वैसे यह भी मानना पड़ेगा कि सतीश के काम से उसके बॉस खुश भी रहते हैं (उनपर लोड कम पड़ता है)।

15 साल कि नौकरी के बाद सतीश को और पढ़ाई करने के कीड़े ने काट लिया। फोरेन के किसी देश जा कर पी एच डी करना चाहता है। परीक्षाएं दी। सफलता भी मिली।
इंग्लैंड कि एक बड़ी यूनिवर्सिटी के एक मशहूर प्रोफेसर ने सतीश को पूरी स्कालर्शिप देते हुए अपने साथ पे एच डी करने का मौका दिया। गोल्डेन आपर्टूनीटी।
अब बस 2-3 साल कि छुट्टी चाहिए। इतने साल इतनी मेहनत से काम किया। सब लोग काम से खुश रहे हैं। छुट्टी मिलने में परेशानी नहीं होनी चाहिए।
अपलाय किया। अर्जी खारिज।
सतीश के एक और सहकर्मी ने भी इसी तरह के कार्य के लिए छुट्टी कि खातिर अपलाय किया परन्तु उसकी अर्जी मंज़ूर हो गई। ऐसा क्यों? कारण क्या था?

कारण सिम्पल है साहब। सतीश ने काफ़ी मेहनत की है और उसके सहकर्मी ने उतनी नहीं। सतीश काफ़ी काम करता है पर उसका सहकर्मी उतना काम नहीं करता। सतीश की मेहनत से उसके बॉस पर लोड कम रहता है। सतीश के जाने से बॉस को ज्यादा काम करना पड़ेगा पर सहकर्मी के जाने से ऐसा कुछ नहीं होगा।
तो साधारण सी बात है की बॉस सतीश को जाने नहीं दे सकता है क्योंकि फिर उसकी जिंदगी मुश्किल हो जायेगी। सतीश की जिंदगी कैसी भी रहे इससे किसी को क्या वास्ता।

तो साहब क्या कीमत है मेहनत की?
मेहनत की कीमत है "और मेहनत"।

Tuesday, 1 December 2009

तनख्वाह का तमाशा

मीठा है खाना आज पहली तारीख है,
खुश है ज़माना आज पहली तारीख है।

रजनीश को आज न सिर्फ़ तनख्वाह मिलनी है बल्कि उसकी तनख्वाह आज बढ़नी भी है।
पिछले दिनों रजनीश ने काफ़ी मेहनत से काम भी किया है, इसलिए उसे उम्मीद है.......

तनख्वाह बढ़ गई......... 3% का इज़ाफा। आज तो किस्मत खुल गई, पूरे 3% का इज़ाफा।

रजनीश और सुकेश साथ ही काम करते हैं और घनिष्ट मित्र हैं। एक ही ओहदा, एक ही इज्ज़त, एक ही काम।
"क्यों भाई सुकेश कितनी बढ़ी तुम्हारी?"
"भाई 4%"
"क्या???मेरी तो 3% ही।""यह तो नाइंसाफी है।" "मैं चला मालिक से पूछने।"

मालिक से कान्वरसेसन

"सरकार, सुकेश की तनख्वाह 4% बढाई, मेरी 3% ही।""ऐसा क्यों?"
"देखो रजनीश, बात को समझो, सुकेश तुमसे ज्यादा पढ़ा लिखा है। तुमने 2 साल की पढ़ाई की है और उसने उसके बाद 6 महीने और। तो वो ज्यादा पढ़े होने के कारण ज्यादा तनख्वाह कमांड कर सकता है।"
"जैसा आप कहें सरकार।"

रजनीश और सुकेश
"यार सुकेश, तुम्हें वो 6 महीने वाला कोर्स करने का फायदा हो गया। एक ही ओहदा, एक ही इज्ज़त, एक ही काम फिर भी तुम अब ज्यादा तनख्वाह पा सकते हो।"
"यार लेकिन इस हिसाब से तो मुझे नंदिता से ज्यादा मिलना चाहिए। उसकी तो 5% बढ़ी है और मेरी 4 ही। उसने भी तुम्हारी तरह 2 साल ही पढ़ाई की है।"

सुकेश और मालिक
"सरकार, मैंने ज्यादा पढ़ाई की है तो मुझे नंदिता से ज्यादा तनख्वाह मिलनी चाहिए, उसने मुझसे कम पढ़ाई की है।"
"देखो सुकेश, बात को समझो, नंदिता का काम का एक्सपीरिएंस तुमसे ज्यादा है। उसने तुमसे 6 महीने ज्यादा काम किया है।"
"लेकिन मेरी 6 महीने ज्यादा पढ़ाई......."
"नहीं बात एक्सपीरिएंस की है।"
"टीक है मालिक, जैसा आप कहें।"

तो इस प्रकार भाइयों और बहनों, आज की बहुराष्ट्रीय कंपनियों का मोटो है
"काम में नो कॉमप्रोमाइज, और दाम में हेरा फेरी।"