Monday, 14 December 2009

यमदूत को रोज़ाना चकमा

शाम ढल चुकी थी। अँधेरा घिर रहा है।
ऑफिस से एक बहुराष्ट्रीय कंपनी में काम करने वाला रजनीश अपनी "पक्की मर्द" मोटर साइकिल से घर की ओर निकला।
सड़क के किनारे काफ़ी धूल और मिटटी पड़ी हुई है। गाड़ी फिसलते फिसलते बची।
आगे जाके, सड़क पर तेज़ चलती और गाड़ियों से बचा कर यू टार्न लिया।
सड़क पर अँधेरा है (स्ट्रीट लाइट जैसी चीज़ से अंजान हैं यहाँ के लोग)। सड़क टूटी फूटी। कब कोई गड्ढा सामने आ जाए पता ही न चले। खैर, बचते बचाते मोटर साइकिल आगे बढ़ी।
आगे गोलचक्कर से दायें जाना है। सामने वाले ट्रक को ओवर टेक किया और दाई ओर का सिग्नल दिया। दायें मुड़ने वाले ही थे की बगल में वही ट्रक तेज़ी से आता हुआ दिखा। अगर अभी मुड गए होते तो बस शरीर पर ट्रक के चक्कों के निशान होते।
चलो यमदूत नंबर वन से बचा।

अगले गोलचक्कर से जैसे ही आगे बढ़ी मोटर साइकिल, तो अंधेरे में से अचानक उजागर हुआ एक ठेला। ठेले पर लदी लम्बी लम्बी लोहे की छरें शेषनाग की जीभ की तरह लपलपा रही थीं। अचानक ब्रेक मारा और बच कर निकला।
यमदूत नंबर टू भी फेल।

आगे चले। सड़क पर घुप अँधेरा (पहले बताया था, स्ट्रीट लाइट से अनिभिज्ञ हैं यहाँ के लोग)। सामने से आते वाहनों से चकाचौंध रौशनी (सब के सब हाई बीम में चलते हैं गाड़ी)। आँखें चोंधिया रहीं थी। रजनीश ने सोचा धीरे धीरे सड़क के किनारे में चलता हूँ मोटर साइकिल।
और तभी अंधेरे में सड़क के किनारे प्रकट हुए ट्रक महोदय। पीछे से शिव जी के त्रिशूल की भांति बांस की बल्लियाँ निकल रहीं थी। रीढ़ की नस ने इशारा किया, पैरों और हाथों ने ब्रेक को झट से दबाया और....
यमदूत नंबर थ्री को भी चकमा।

आगे बढ़ी "पक्की मर्द" मोटर साइकिल अपनी "कच्चे मर्द" सवारी को लेकर। अरे ट्रेफिक लाइट फेल। गाड़ियों ने तो अभी चौराहे पर ग़दर मचा दिया होगा। चौराहे पर पहुचते ही अंधेरे में दिखे हमारे मेहनती ट्रेफिक पुलिस। घुप्प अंधेरे में, चौराहे के बीचों बीच, बिना किसी रौशनी या इंडिकेटर के गाड़ियों को इधर उधर जाने का इशारा दे रहे हैं। समय पर घ्यान नहीं जाता तो आज या तो उनकी टक्कर "पक्के मर्द" से हो जाती, या "कच्चे मर्द" का आज चालान कट जाता।
खैर यमदूत नंबर फोर भी कुछ न बिगाड़ सका।

रोज़ इस रास्ते पर चलने का "पक्के मर्द" और "कच्चे मर्द" दोनों को एक्स्पीरिएंस है।

लोग कहते हैं, भाई जब रोज़ इतने खतरे से जूझते हो तो या तो एक कार खरीद लो या फिर सेना में भरती हो जाओ, कम से कम देश के लिए तो शहीद होगे।

साहब इस प्रगतिशील भारत की यही कहानी है। हम पश्चिमी देशों को उत्पादन के मामले में टक्कर दे रहे हैं। वो जो माल बनाते हैं, जो सेवायें वो देते हैं, वही हम उनसे आधे दामों में दे कर उनसे बाज़ी मार रहे हैं।
परिणाम ये है की जो बांस और सरिया उनके यहाँ बंद कंटेनर में ले जाए जाते हैं (ताकि राहगीरों को परेशानी न हो), वो हमारे यहाँ खुले ठेलों या ट्रकों पर जाते हैं और दूसरों के लिए यमदूत का रूप बनते हैं।

रही कार लेने की बात, तो साहब रजनीश बेचारे को दफ्तर से महीने में जो "मूंगफलियाँ" मिलती हैं, उनमें या तो वो अपना पेट ही भर ले या कार में तेल ही डलवा ले।
सुना ही होगा आपने, "नंगा नहाए क्या और निचोरे क्या?"

3 comments:

  1. ओहोहो वाह बेहतरीन लेखक हैं आप,
    आपके इसी लेख को www.moorkhistan.com पर
    आपकी ब्लॉग उरल के साथ प्रकाशित किया गया है. अगर आपको इस पर कोई आपत्ति हो तो कृपा कर के लेख पर कमेन्ट करे.

    और हाँ ऐसे ही बेहतरीन लेख लिकते रहें. मूर्खिस्तान.कॉम पर आपके लेख के प्रकाशन पर बधाई.

    माधो दूरदर्शी
    मूर्खिस्तान.कॉम के रचनाकार.
    www.moorkhistan.com [The Country of Fun]

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  2. क्या हालात हैं..जरा संभल के!!

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  3. @vivek: bahut bahut dhanyawaad moorkhistaan

    @Udan Tastari: sarkaar sambhal ke hi to jee rahe han ab tak warna to....

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