Saturday, 16 October 2010

दुर्गा पूजा: १५ मिनट का मज़ा

उस समय हम लोग टाइप ३ बी क्वार्टर में रहते थे और डी ए वी पब्लिक स्कूल में पढ़ते थे। घर से स्कूल और स्कूल से घर वापस पैदल ही आते थे। हमारे यहाँ कोई स्कूल बस नहीं थी।
पैदल खुद स्कूल जाने का अपना ही मज़ा था। गप्पें हाकते हुए घर से निकले, मैदान पार किया, मंदिर के बगल से गुज़रते हुए, सिस्बन्नी के बगल वाले फिल्ड से होते हुए, बाज़ार के साइड से स्कूल के गेट में। कुल मिला कर १५ मिनट जाने में और १५ मिनट वापस घर आने में। कमाल का समय था वो।
पास स्कूल था, सुरक्षा की कोई दिक्कत थी नहीं और समय कम लगता था। पैदल ही मस्ती होती थी।
लेकिन साल का एक समय ऐसा था जब ए १५ मिनट स्कूल आने के तो १५ ही रहते थे लेकिन वापस घर जाने के १५ मिनट, ३० हो जाया करते थे। स्कूल से घर जाने के रास्ते में जितनी भी जगहें आती थी उनमें से एक जगह इस समय पर ख़ास आकर्षण बन जाती थी। ये जगह थी हमारी कालोनी का मंदिर। और ये समय था दुर्गा पूजा का। हर साल हमारे मंदिर में माता दुर्गा की मूर्ति बनती थी। साथ में माता से पिटता एक राक्षश (महिसासुर) और माता से शेर से पिटता एक छुटका राक्षश (महिसासुर का चेला)। इन सब के आस पास होते थे कई देवी देवता। उल्लू पर सवार देवी लक्ष्मी, पेट में मटका रख्खे गणेश जी और उनके पास बैठा उनका चूहा। दूसरी तरफ खड़ी हैं सरस्वती माता और मयूर के साथ कार्तिकेय जी। और पीछे पहाड़ों के ऊपर आशीर्वाद की मुद्रा में भोले बाबा।
ये आकर्षण था दुर्गापूजा के ३ दिनों का (माता के पट खुलने के बाद)। हमारा आकर्षण शुरू होता था इससे एक महीने पहले। तब ये सारे देवी देवता और राक्षश दिखते नहीं थे। दीखता था सिर्फ पुआल का एक बड़ा ढेर। और कुछ लोग जो हर साल इसी समय यहाँ प्रकट हो जाते थे लुंगियां और बनियानें पहन के।
स्कूल जाते वक्त समय की कमी के कारण कुछ करना संभव नहीं था। परन्तु लौटते वक्त तो समय अपना ही था (वैसे लेट घर पहुचने पर कभी कभी डांट ज़रूर लगती थी)। तो इस समय का सदुपयोग करते थे। बड़ी तलीनता और श्रद्धा से देखते थे उस पुआल के ढेर से अलग अलग देवी देवताओं को प्रकट होते हुए। जी जी राक्षश भी वहीँ से प्रकट होते थे। मनो ब्रह्मा सृष्टि की उत्पत्ति कर रहे हों। पहले देवताओं को बनाया और फिर दानवों को और फिर इंसानों को।
खैर वो एक महिना कमाल का होता था। रोज़ वापसी में मंदिर पर रुकना और मूर्तियों के बनने के हर स्टेप को देखना। पुआल के ढेर को अलग अलग बंडलों में बंधा गया। उनको आकार दिए गए। अब मिटटी का एक बड़ा सा ढेर आ गया है। मिटटी को पुआल के पुतलों पर लेपा जा रहा है। अरे गणेश जी का क्या होगा? उनके लिए ख़ास एक बड़ी सी मटकी लायी गयी। मटकी ने गणेश जी के पेट का रूप ले लिया। आखिर में सबका रंग रोगन, कपडे लत्ते। और लास्ट स्टेप में सब देवी देवता और राक्षस हथियारों से लैस कर दिए गए। रोज़ स्कूल से वापर जाने वक्त १५ मिनट रिज़र्व होते थे काम का मुआयना करने के लिए।
इसके बाद शुरू होता था मेला। खिलौनों की दुकाने। बंदूकें, पिस्तौलें खरीदते बच्चे। छोटू की चाट की दूकान पर लगी भीड़।
इस बड़े शहर में आकर ये सब खो गया है। न उम्र वो रही न ही ज़माना। यहाँ तो छुट्टी भी नहीं होती दुर्गा पूजा की। न एहसास होता है।

Wednesday, 6 October 2010

ए भाई ज़रा देख के चलो

ए भाई, ज़रा देखके चलो, आगे ही नही, पीछे भी
दाए, ही नही, बाए भी , ऊपर ही नही, नीचे भी
ए भाई

तू जहाँ, आया है, वो तेरा,
घर नही, गाव नही
गली नही, कूचा नही, रास्ता नही, बस्ती नही

दफ्तर है,
और प्यारे, दफ्तर ये एक सरकस है
और इस सरकस में - प्रिंसिपल कन्सल्तंत को भी, सिनिअर कन्सल्तंत को भी
कन्सल्तंत को भी, अस्सोसिअत कन्सल्तंत को भी, ट्रेनी को भी, इन्टरन को भी
नीचे से ऊपर को, ऊपर से नीचे को
आना-जाना पड़ता है

और रिंग मास्टर (बॉस / यजमान) के कोड़े पर -
कोड़ा जो भूख है
कोड़ा जो तनखा है , कोड़ा जो किस्मत है
तरह -तरह नाच के दिखाना यहाँ पड़ता है
बार -बार रोना और गाना यहाँ पड़ता है (अप्रैसल के लिए)
हीरो से जोकर बन जाना पड़ता है

Thursday, 23 September 2010

रानी लक्ष्मी बाई की वापसी

दिल्ली में डेंगू का प्रकोप ज़ोरों से फैला हुआ है। अचानक एक मित्र के पिता की तबियत खराब हो गयी।

खून की ज़रुरत। वो भी एक मुश्किल ब्लड ग्रुप। कम लोगों में पाया जाने वाला।
खबर पहुची यहाँ तक। हम तो मजबूर हैं। हमारा है नहीं वो ब्लड ग्रुप। खैर सोचा जल्दी से और लोगों में खबर फैलाएं। कोई भला आदमी मिल जाए। ऑफिस में जितने लोग हैं सबको बता दिया।

जवाब आया। "मेरा है ब्लड ग्रुप"।
थोड़ी राहत मिली। तीन लोग चाहिए थे। एक हॉस्पिटल में मौजूद है, एक यहाँ मिल गया।

एक बार और इ मेल की घंटी बजी। 'मेरा भी ब्लड ग्रुप वही है।'
पता नहीं बांछें होती कहाँ हैं। पर जहाँ भी होती हैं वो खिल गयी।

बस फिर क्या था? इन धुरंधरों को लेकर चले हम।
आपको ये बता दूँ की ये कोई नॉर्मल रक्त दान नहीं था। प्लेटलेट चाहिए थे। खून से प्लेटलेट निकालने की प्रक्रिया लम्बी होती है और आम रक्तदान से ज्यादा देर चलती है।

खैर, पहुचे हम हॉस्पिटल एक घंटे की ट्राफिक में चिल्ल पों के बाद।
थोड़ी मेहनत के बाद ढूंढ लिया ब्लड बैंक।

मित्र को थोडा ढाढस बंधाया। अपने साथियों को रक्तदान के लिए आगे बढ़ाया।
ब्लड बैंक मेनेजर: 'नहीं नहीं ये लोग नहीं कर सकते दान'। 'अंडर वेट' भी हैं।
अरे अरे, ऐसा न कीजिये, दान ले लीजिये।
अच्छा, आपलोग अपना भार नापें। फिर देखते हैं।
४५ के जी
५२ के जी

दोनों अंडर वेट। नहीं कर सकते रक्त दान।
खैर कोई बात नहीं। दो और लोग मिल गए रक्तदान के लिए। खतरा अभी ताल जाएगा।

हमारे धुरंधर रक्तदान न कर पाए लेकिन मानवता के तहत बिना कुछ कहे, बिना कुछ सुने दान करने आये। किसी ऐसे आदमी के लिए जिन्हें वो जानते भी नहीं। न दर्द के बारे में सोचा न और किसी खतरे के बारे में।

ऐसा सब नहीं कर सकते। ऐसा वो कर सकते हैं जिनका ह्रदय कोमल हो, और मज़बूत भी. मानवता के लिए धड़कता हो।
हमारा सन्देश कई लोगों के पास गया, जिनमें से कई इसी ब्लड ग्रुप के होंगे लेकिन आगे आये ये।
ये है आज की भारतीय नारी। जी, हमारी धुरंधर थी दो नारी जिनके साथ था मैं अनाड़ी। जी, भारतीय नारी, जो एक ही साथ कोमल और कठोर हो सकती है।
यही है नया रूप झांसी की रानी का। वो रानी जो अपने कोमल ह्रदय के कारण अपने बच्चे को अपनी पीठ से बाँध कर चली थी और जिसने अपने कठोर ह्रदय से अंग्रेजों का डट कर मुकाबला किया था।

ये नारियाँ भले ही शारीरिक रूप से कमज़ोर हों, लेकिन मानसिक रूप से सशक्त हैं। भले ही ये अंडर वेट हों लेकिन बड़े ह्रदय वाली हैं।
इन्होने जो किया उसके लिए इन्हें तहे दिल से धन्यवाद करना चाहता हूँ और बस इतना कहना चाहता हूँ कि

भारतीय नारी, तुझे सलाम ...........

Sunday, 12 September 2010

पटवारी एक अजीब सा जीव है.....

मुझे पता नहीं था कि पटवारी नाम कि भी कोई चीज़ होती है। हमारे इलाके में न तो तहसील होती है, न तहसीलदार, न पटवारी। जो जब मैं पहली बार पटवारी के इलाके में गया तो पता चला कि आखिर ये कौन है और क्या चीज़ है।

पटवारी अपने पटवार सर्कल का न सिर्फ ज़मीन जाय्दात का हिसाब रखता है बल्कि वहां के छोटे मोटे झगडे, झंझट और बाकी ला एंड आर्डर को भी देखता है। वो लोगों के जनम (कभी कभी मरे लोगों के) को भी प्रमाणित करता है और उनकी मृत्यु (कभी कभी जिन्दा लोगों के) को भी।

खैर जब पहली बार में पटवारियों के चक्कर में पड़ा तो काफी हैरत हुई उनके काम को देख कर। वेराइटी वेराइटी के सैम्पल हैं। पेश हैं उनमें से कुछ:

कन्सल्तैंत (मखान लगाते हुए): पटवारी साब आप लोगों को इतने तरह का काम करना पड़ता है और किसी तरह कि कोई मदद नहीं है, ये तो बड़ी गलत बात है।
पटवारी: गलत तो है ही साब। क्या करें? पटवारी एक अजीब सा जीव है, वो कुछ भी कर सकता है।
एक बार, काफी समय पहले, जब ये मोबाइल और फोन नहीं हुआ करते थे। उस समय वो जो होना है न पुलिस स्टेशन पर.........
कन्सल्तंत: रेडियो ट्रांसमीटर
पटवारी: हाँ हाँ वही। उस समय उसी से ख़बरें आती थी। जिले से तहसील के थाने, वहां से तहसीलदार के पास और फिर पटवारी के पास।
तो एक जिले के जिलाध्यक्ष (कलक्टर) ने कहा कि, जिले में जितने भी 'मंदिर' हैं, उनकी गिनती कर के बताई जाए। ट्रांसमीटर से खबर गयी पुलिस स्टेशन और अंततः पटवारियों को बता दिया गया।
करीब १० दिन बाद कलक्टर के पास एक लिस्ट पहुँच गयी।
'जिले में 'बंदरों' कि संख्या'

दरअसल, ट्रांसमीटर में आवाज़ सही से ना आने के कारण, थाने वालों ने 'मंदिरों' को 'बंदरों' सुना और बस प्रक्रिया शुरू हो गई। जिलाध्यक्ष ने भी हैरानी से पूछा कि आखिर बंदरों को गिना कैसे?

कन्सल्तंत: कैसे गिना आखिर?
पटवारी: अरे साब ये मत पूछो कैसे गिना? पटवारी एक ऐसा जीव है जो सब कुछ कर सकता है।

Sunday, 5 September 2010

स्कूटी वाली रानी - २

आपको याद हो शायद, कुछ माह पहले मैंने स्कूटी वाली रानी की चर्चा की थी। जी वही स्कूटी वाली रानी जिनको मैंने अपने 'पक्के मर्द' मोटर साइकिल से पछाड़ने की बड़ी कोशिश की थी परन्तु बारम बार वो मेरे बगल से ज़ूउउउउउउउउउउउउउम कर के निकल जाती थी। उस वक्त ये विचार कई लोगों ने व्यक्त किया था की आज देश में झाँसी की रानियों की संख्या बढती जा रही है।

जी तो वही विचार मेरे मस्तिस्क में कौंध रहा था की उस दिन अचानक 'स्कूटी वाली रानी- २' से मुलाक़ात हुई। हमारे ऑफिस के बाहर खुली पार्किंग है मोटर साइकिल के लिए (जैसा की गुडगाँव के हर शानदार ऑफिस के बहार है)। वहीँ मैं रोज़ ऑफिस आते हुए और कभी अभी ऑफिस से जाते हुए अपने 'पक्की मर्द' के पास लगी एक अदना स्कूटी को देख कर मंद मंद मुस्काता था। लेकिन साथ ही साथ उस 'स्कूटी वाली रानी- १' को याद कर कर के सकते में भी आजाता था। लेकिन फिर सोचता ' हर लड़की में वो दम कहाँ।' 'हर लड़की स्कूटी वाली रानी थोड़े बन जायेगी'।

खैर, उस दिन जब ऑफिस से निकला तो उस देखा उस 'अदना स्कूटी' की मालकिन स्कूटी निकाल रही थी। में भी अपनी 'पक्की मर्द' ले कर घर की ओर निकल रहा था। खैर जो मैं करने की हिमात नहीं करता वो किसी लड़की कर पाए इसकी उम्मीद नहीं रखता (अहम्)। खैर मैंने देखा स्कूटी और रानी दोनों को उसी ओर जाना था जिस ओर मैं जाता हूँ। परन्तु जिस दिशा में जाने की आवश्यकता है उसके लिए थोड़ी दूर आगे से जाके यू-टार्न लेना पड़ता है। यही करता हूँ में रोज़।

उस दिन उस झांसी की रानी को देख कर में दांग रह गया। उसने अपनी स्कूटी के कान मरोरे और ट्राफिक से नज़रें लड़ाते उलटी दिशा में चल पड़ी। यू-टार्न लेने की ज़हमत नहीं की उसने और ज़माने से उल्टा चलने की हिम्मत की उसने। भले ही ये खतरनाक हो, भले ही ये नियमों के खिलाफ हो, भले ही मर्द ये करने की हिमात न करते हों। पर उसे क्या? वो तो आई ही है ज़माने से अलग चलने, नियमों को बदलने। तभी तो है वो झांसी की रानी का नया रूप, 'स्कूटी वाली रानी'।

मैंने आज तक ट्राफिक से उल्टा चलने की हिम्मत नहीं की है। परन्तु उस दिन उस रानी को देख कर ऐसा लगा जैसे वो कह रही हो 'यही है तुमारी मर्दानगी, यही है तुम्हारा पौरुष।' जैसे उसकी स्कूटी मुझसे कह रही हो ' बड़ा मुस्कुराते थे मुझे अदना समझ कर, अब कौन है अदना?'

खैर आज तक मैं ट्राफिक से उल्टा चलने की हिमात नहीं कर पाया हूँ और न शायद कर पाऊँगा।

पर कभी उससे बात हुई तो बस इतना कहना चाहूँगा
भारतिय नारी तुझे सलाम ...........

Tuesday, 10 August 2010

आम आदमी

आज कल ये 'आम आदमी' और उसकी बातें बहुत सुनने को मिलती हैं। पुराने ज़माने में एक अंग्रेजी जुमले का बड़ा इस्तेमाल होता था 'कॉमन मैन'। अब उसकी जगह 'आम आदमी' ने ले ली है।

पर मैं आज तक समझ नहीं पाया हूँ की ये 'आम आदमी' है क्या? ये 'आम आदमी' है कौन?
क्या ये कोई सच मुच का आदमी है या सिर्फ एक जुमला? टीवी पर कई बार वाद विवाद देखता हूँ, नेताओं के, अभिनेताओं के, आम आदमियों के। पर ये कनफूजन बढता ही जा रहा है।
है कौन ये आम आदमी? कोई नेता टीवी पर आता है और खुद को आम आदमी बताता है। कड़ोड़ों कमाने वाला अभिनेता आम आदमी है। वो मज़दूर जो दिहाड़ी पर जीता है वो कौन है? 'खास आदमी'।
कोई नेता आता है और कहता है की वो आम आदमी है। सरकारी बंगले में रहने वाला और सरकारी गाड़ी में घूमने वाला 'आम आदमी' है। लोगों की मेहनतकी कमाई को हड़पने वाला 'आम आदमी' है। तो वो सड़क पर सोने वाला कौन है? वो जो मेहनत की कमाई से टैक्स भरता है वो कौन है? 'खासम ख़ास' आदमी।

बहुत कनफूजन है भाई। कोई अगर समाधान कर सके तो कृपया करें मेरे इस असमंजस का। मैं सोचता था ये हिंदी शब्द है 'आम' 'आदमी'। लेकिन आज कल देखता हूँ अंग्रेजी बोलने वाले लोग, अंग्रेजी मैं प्रसारित कार्यक्रम भी 'आम आदमी' ही कहते हैं। पता नहीं कहाँ गया वो 'कॉमन मैन'।

न जाने कौन है ये 'आम आदमी'? वो जो पब्लिक के पैसे से आम के मज़े उठाता है? या वो जो महंगाई के कारण आम नहीं खा पाता है?

Saturday, 17 July 2010

जातिवाद: रेसिस्म

आज कल दुनियां में कई जगहों पर हिन्दुस्तानियों को जातिवाद (रेसिस्म) का निशाना बनाया जा रहा है। चाहे वो इंग्लैंड हो या अमेरिका या ऑस्ट्रेलिया। हर जगह कुछ न कुछ दिक्कत हो रही है।
शायद ये सब नया नहीं है। शायद ये सब पहले भी होता था। शायद फर्क बस इतना है की पहले हमें इनके बारे में पता नहीं चल पाता था। आज कल टीवी, रेडियो, इन्टरनेट जैसी चीज़ों ने हमें इन घटनाओं से अवगत करवाया है।
आज जैसे ही ऑस्ट्रेलिया में किसी हिन्दुस्तानी पर हमला होता है, हमें खबर मिल जाती है और हम सब खुल कर उसकी भात्सना करते हैं। जैसे ही अमेरिका में या इंग्लैंड में कोई हिन्दुस्तानियों के बारे में बुरी बातें फैलाता है, हम सब तक बात पहुँच जाती है और हम उसकी काफी निंदा करते हैं और विरोध प्रदर्शन करते हैं।
हम सबको अपने देश से बहुत प्यार है और ऐसे समय पर हमारी देशभक्ति काफी जोर से उफान भी मारती है। किसी ने हमारे बारे में गलत कैसे कह दिया? काफी दिन सह लिया हमने चुप चाप। लेकिन अब हमारे पास शक्ति है, टीवी की, रेडियो की, इन्टरनेट की। अब हम खुल कर अपने विरोध से अवगत करवा सकते हैं लोगों को। और करवाते हैं।

खैर। इन सब के बीच में में बड़े असमंजस में हूँ। इस जातिवाद का आखिर इतना विरोध क्यों कर रहे हैं हम? क्या ये कोई नयी बात है हमारे लिए?
हमारे देश में इतनी विविधता है। इतनी जातियां हैं। इतने धर्म हैं। इतने प्रदेश हैं। इतना ही नहीं, हमारे इस छोटे से राष्ट्र में एक बड़ा सा महाराष्ट्र भी है। खैर मैं पूछना ये चाहता हूँ की हम हिन्दुस्तानियों के खिलाफ दुसरे देशों में होने वाले जातिवाद का इतना विरोध कर रहे हैं आज कल, हमारे dil को इन चीज़ों से इतनी ठेंस पहुँच रही है आज कल, पर क्या हिन्दुस्तानियों से बड़ा जातिवाद कोई है क्या इस दुनिया में?

हमारा वर्ण (जाती) विभाजन इतना मज़बूत है की आज भी चला आ रहा है (हज़ारों साल से)। आज भी कथित ऊँची जाति के लो कथित नीची जाति के लोगों को अपने से छोटा समझते हैं। कई जगह इन कथित जातियों के बीच काफी घृणा की भावना है और अक्सर ये घृणा उग्रता के रूप में भी निकलती है।
हिंदुस्तान ने हमेशा हर धर्म के साधकों को अपने यहाँ जगह दी है। ये हमारे लिए एक आम बात है। पर इतना ही आम है हमारे लिए, इन विविध धर्मों के बीच उग्रता देखना। हिन्दू- मुस्लिम दंगों का मामला अक्सर होता है इस देश में।
में दिल्ली में काफी साल से रह रहा हूँ। एक बार मैं एक बस मैं कॉलेज से लौट रहा था। सामने की सीट पर बैठ कंडक्टर अपने चेले से कह रहा था," भैया तो तीन तरह के ही होते हैं। एक सब्जी वाला भैया, एक दूध वाला भैया, और एक बिहारी और यु पी वाला भैया। क्या ये रेसिस्म है? खैर वो तो अनपढ़ था, मैं बुरा नहीं मानता उसकी बात का।
हमारे देश में चुटकुले काफी प्रचलित हैं। और सबसे ज्यादा प्रचलित हैं चुटकुले सरदारों के बारे में, सिख समुदाय के बारे में। काफी मज़ा आता है संता बंता की कहानियाँ सुनने में। पर क्या हमने सोचा है की सिखों को कैसा लगता है ये चुटकुले सुन कर? क्या ये रेसिस्म है? खैर ये हो मज़ाक में किया जाता है। इनका क्या बुरा मानना? मैं बुरा नहीं मानता इन बातों का।
दिल्ली जब आया था पहली बार तो मेरे भैया एक दिन बता रहे थे की 'चिंकी' बच्चे बड़े ही प्यारे लगते हैं। फिर उन्होंने मुझसे कहा, तुम तो नहीं जानते होगे चिंकी क्या होता है। मैं बिहार से नया नया आया हुआ क्या जानता? उन्होंने कहा," कोई बात नहीं, अगले हफ्ते से कॉलेज जा रहे हो, सीख जाओगे।" जी जनाब, पहले दिन ही सीख गया। हिन्दुस्तान से उत्तर पूर्व से आने वाले लोगों को दिल्ली में चिंकी कहते हैं। क्या ये रेसिस्म है? अरे नहीं वो तो बातों बातों में कहते हैं। इसका क्या बुरा मानना? मैं बुरा नहीं मानता इन बातों का।
बम्बई (माफ़ कीजियेगा, मुंबई) में पिछले कुछ दिनों में बिहार और यू पी से आये लोगों का काफी विरोध किया गया और कई बार हिंसा का भी इस्तेमाल किया गया। क्या ये रेसिस्म नहीं है? लेकिन आपको समझना चाहिए ऐसा क्यों हो रहा था। ये लोगों की नौकरियों और उनकी जिंदगी का मुआमला था। ये लो मराठियों की नौकरियां ले रहे थे। इसका क्या बुरा मानना? मैं बुरा नहीं मानता इन बातों का।

अरे लेकिन यही सब तो हो रहा है हिन्दुस्तानियों के साथ। अमेरिका में हिन्दुस्तानियों को 'पाकी' कह के बुलाते हैं। ये काफी कुछ 'चिंकी' जैसा है। हमारी आदतों और सभ्यता पर काफी चुटकुले भी बनते हैं पश्चिमी देशों में। ये काफी कुछ संता-बंता जैसा लगता है मुझे। पिछले दिनों ऑस्ट्रेलिया में हिन्दुस्तानियों पर काफी हमले हुए। सुना वहां के लोगों की नौकरियां ले रहे थे हिन्दुस्तानी। मुंबई की याद सी आ गयी।

ऐसी और भी हज़ारों चीज़ें होती हैं हमारे देश में, जिनका विरोध हम खुल कर नहीं करते। ये आम जिंदगी का हिस्सा है। लेकिन दुसरे देशों में जैसे ही कोई बात होती है, हमारा खून खौल जाता है।
मुझे कभी कभी लगता है की हमारी देशभक्ति सिर्फ तीन मौकों पर सामने आती है:
१ हिंदुस्तान पाकिस्तान युद्ध
२ क्रिकेट मैच
३ दुसरे देशों में हमारे खिलाफ जातिवाद

बाकि सब ठीक है। बाकि सब चलता है। क्या है कोई हिन्दुस्तानियों से बड़ा जातिवाद?

Sunday, 4 July 2010

बंगाल का जादू

अरे अरे! वहां भीड़ किस बात की लगी हुई है?
सर, वो एक ट्रक आया था सामन लेने। उसका ड्राईवर कुछ पैसे ले के आया था, माल खरीदने के लिए। सीट के नीचे रख के गया था, झाड़ा (संडास) करने। वापस आया त पैसे नै था।
उसी का झगडा चल रहा है। के लिया पते नै चल रहा है।
कोनो मजदूर ले लिया होगा।

तो फिर अब क्या करेंगे वो लोग? कैसे पैसा मिलेगा उसका।

अभी ड्राईवर मालिक को फोन किया है। उ बंगाल में है। ओझं से कोई मंतर बताया है। आ कहा है की जेतना लोग है उहाँ, ओतना लकड़ी ले ले एके साइज़ का। उ में से एक क आधा तोड़ दे।
बिना देख सब लोग को एक एक लकड़ी लेना है। मंतर पढ़ल लकड़ी सब है, ता जेकरा टुटलका लकड़ी मिलेगा, उहे होगा चोर। इ है सर बंगाल क जादू।

तो किया क्या ये जादू?

जी सर अभी सब इंतजाम कर क आ मंतर मारा है लकरी सब पे। सब लोग लकड़ी लेने के लिए तयारे है लेकिन ए गो मजदूर है जे लकड़ी उठाबे से मन कर रहा है।

तो फिर उसके मन में खोट है? वही है क्या चोर?

जी सरकार, ऐसने बात होगा। उहे चोराया होगा। इहे लिए नै लै के चाह रहा है लकड़ी।

जी साहब, यही है बंगाल का जादू। जो पकड़ता है चोरों को........

Wednesday, 16 June 2010

हवाबाजी

हवाबाजी आज कल इस्तेमाल किया गया एक बड़ा ही सामान्य शब्द है। ये काफी वर्सिटाइल भी है। काफी तरह की अवस्थाओं में फिट आ जाता है।
जैसे कि:
"हुंडई वेरेना तकनिकी रूप से थोड़ी और परिपूर्ण होती हो उसे चलाने के लिए पायलट के लैसेंस की ज़रूरत होती"
ये है हवाबाजी।

या मेरी कंपनी ने कहा था मेरे तंकवाह बढ़ा देगी लेकिन बढ़ाया नहीं। तो मैं अपने दोस्तों से कहूँगा।
"यार कंपनी ने तो मेरे साथ हवाबाजी कर दी।"

खैर ये 'हवाबाजी' होता क्या है?
संधिविछ्छेद: हवा- बाज़ी
अर्थात, हवा से बाज़ी लगाना।
व्याख्या: अगर आप कहें की मैं हवा से तेज़ चल लूँगा। तो क्या आप हवा से 'बाज़ी' या 'शर्त' लगा सकते हैं? नहीं। यही है हवाबाजी। ऐसी बात कहना जो हवा से बाज़ी लगाने जैसी हो। जो बड़ा चढ़ा कर कही जा रही हो।

इसका अर्थ और प्रयोग अच्छे से समझने के लिए इसका अक्सर प्तयोग करें। काफी यूज़फुल शब्द है।

Tuesday, 8 June 2010

बाप का होटल

एक ज़माने में जब हम स्कूल में हुआ करते थे, तब हमारे एक महान शिक्षक थे। उस समय उनकी महानता का एहसास नहीं था हमें। अब महान हुए हैं वो हमारी नज़र में।

खैर वो अक्सर हमें डांट के कहा करते थे, 'बेटा अभी तो बाप दे होटल में ऐश कर रहे हो, जब बात खुद पर आएगी तब आंटे दाल का भाव पता लगेगा'।

खैर तब हमें बहुत गुस्सा आता था उनपर। ये कैसी भाषा का इस्तेमाल कर रहे हैं? क्या बेकार बात कर रहे हैं ये? बौरा गए हैं। साठ के हुए नहीं हैं लेकिन सठिया गए हैं।
आज उनकी बात की वैल्यू पता लगी है। शुक्रिया कारपोरेट दुनिया। मेरे महान शिक्षक शिक्षक की महानता और बढ़ा दी।
देखें 'बाप के होटल और 'कारपोरेट दुनिया' की समानता।

बाप का होटल:
पापा जेब खर्च बढ़ा दो काफी दिन हो गए।
पापा,"बेटा अभी जेब थोड़ी तंग है। अगली बार क्लास में फर्स्ट आये तो पक्का बढ़ा दूंगा"।
नहीं नहीं पापा, ये सही नहीं है, प्लीज़ प्लीज़।
पापा,"ठीक है चलो बढ़ा देते हैं।"
ख़ुशी ख़ुशी, उछालते कूदते, फ्री के पैसे लेकर चले......

कारपोरेट वर्ल्ड:
मालिक, काफी समय हो गया, तनख्वाह बढ़ा दो।
मालिक,"नहीं नहीं अभी मार्केट डाउन है।"
प्लीज़ प्लेज, मैंने बहुत अच्छा परफोर्म किया है (क्लास में फर्स्ट आया)।
मालिक,"चलो बहुत शाबाशी तुम्हें, लेकिन और बढ़िया काम करो फिर सोचेंगे........
अपना सा मुह ले कर चले, अपने मेहनत की कमाई भी नहीं मिली।

बाप का होटल:
मम्मी, मुझे कद्दू अच्छा नहीं लगता है, नहीं खाना खाऊँगा।
मम्मी," अरे बेटा में तुम्हारे लिए कुछ और बना देती हूँ। खाना खा लो।"

कारपोरेट वर्ल्ड:
क्या आज लंच में कद्दू है, और कुछ नहीं बनाया है।
खाना है तो खाओ, नहीं तो भाड़ में जाओ।

बाप का होटल:
पापा, इस बार छुट्टी में शिमला घुमाने ले चलो।
पापा,"बेटा अगली बार चलेंगे।"
नहीं नहीं पापा, प्लीज़ प्लीज़
पापा,"ठीक है चलते हैं।"

कारपोरेट वर्ल्ड:
मालिक, छुट्टी दे दीजिये, शिमला जाना है।
मालिक,"अगली बार चले जाना।"
नहीं नहीं मालिक, प्लीज़ प्लीज़।
मालिक," अच्छा जाओ, छुट्टी दी...... हमेशा के लिए।"

इतना अच्छा था वो 'बाप का होटल', तब एहसास नहीं हुआ, अब एहसास कर के भी क्या कर लेंगे?

Friday, 28 May 2010

दो बैलों की कहानी

पुणे के आस पास कहीं.....
एक्सप्रेस वे पर होकर हमारी गाड़ी चली जा रही थी।
'अरे अरे सर हम आगे बढ़ गए। पिछले कट से ही हमें मुड़ना था।'
रोंग साइड से हम वापस लौटे, धीरे धीरे। दोनों ओर से फराटे से आती गाडियाँ।

कुछ किसान अपने मवेशियों को लेकर सड़क पार करते हुए।
उनका बैल बीच सड़क कर फस गया। दोनों तरफ से तेज़ी से आती गाड़ियों को देखकर और उनकी रोशनी से चोंधिया कर परेशान एक बैल। कभी इधर भागता, कभी उधर।
एक ट्रक वाले ने हॉर्न बाजा कर उसे अपने सामने से हटाया।

अचानक मन से आवाज़ निकली (काली ज़बान, काला मन):
'ये तो मरेगा आज।'

बैल अपने मालिक की ओर बढ़ा, सड़क पार करते हुए।

तभी सामने से फर्राटे से आती हुई सफ़ेद गाड़ी। और भड़ामम्मम्मम्म !!!!!!!
बैल हवा में।
जी हाँ गाड़ी की गति इतनी थी की उसने इतने भारी बैल को हवा में उड़ा दिया।
बैल को उसके सर के बीचों बीच टक्कर लगी और वो हवा में ४-५ फीट उछल कर वापस ज़मीन पर गिरा, धराम्म्मम्म।

सफ़ेद बैल (गाड़ी) आगे बढ़ गयी। काला बैल मुश्किल से उठा और लड़खराते हुए अपने मालिक की ओर बढ़ा। सर से टपकती हुई खून की धरा।

हम अपनी गाड़ी से आगे बढे। आगे सड़क के किनारे सफेद बैल (गाड़ी) धीरे धीरे आगे बढ़ रही थी। सर फूटा हुआ और पानी की एक धरा बह रही थी नीचे से।

दोनों बैलों को भारी नुक्सान हुआ। पर शायद उनमें से एक चाँद रूपये खर्च करने से तंदरुस्त हो जाएगा और शायद दुसरे की जान चली जायेगी। एक बैल नासमझ था, घबराया हुआ। दूसरा बैल अपनी मस्ती में तेज़ी से चला जा रहा था किसी और की फ़िक्र किये बिना, समझदार होने के बावजूद।

न जाने गलती किसकी थी।


Saturday, 15 May 2010

कुत्ता किसको बोला बे?

अभी कुछ दिन पहले एक बड़ी पार्टी के एक नेता ने कुछ दूसरी पार्टी के नेताओं को कुत्ता कह दिया।
इस बात पर बहुत बवाल हुआ। इसे अभद्रता का प्रदर्शन माना गया। कई नेताओं ने इस बात पर काफी दुख भी ज़ाहिर किया।

बात दरअसल बहुत दुख की है। किसी आदमी को कुत्ता कह दिया। वो भी बड़े इज़्ज़तदार नेता को। बड़े दुख की बात है।

क्या उनकी कोई इज्ज़त नहीं है? क्या उन्हें दुख नहीं होता? बेचारे कुछ कहते नहीं हैं तो आप उन्हें कुछ भी कह देंगे?
जी हाँ मैं उन्ही की बात कर रहा हूँ।
कुत्तों को।
बेचारों को नेता से कंपेयर कर दिया।
क्या कहा आपने? फर्क क्या है?

बेचारा कुत्ता इतना ईमानदार। आज तक किसी ईमानदार नेता के बारे में सुना है आपने? न तो देश के लिए ईमानदारी, न तो पार्टी के लिए ईमानदारी और न ही जनता के लिए। तो कैसे हुए कुत्ते और नेता एक जैसे।

कुत्ता जिस घर में रहता है उसकी रक्षा करता है। सुना है आपने की कोई नेता देश की रक्षा करता है। नेता देश की रक्षा नहीं भक्षा करता है। पता नहीं कैसे कुत्ते हो गए वो?

कुत्ते के मालिक पर अगर कोई ख़तरा हो तो वो उसे काटने दौड़ता हैं। नेता अपने मालिक (जनता) को काटने दौड़ता है। कैसे कहते हैं आप नेता को कुत्ता?

गजब करते हैं आप लोग। बेचारे कुत्ते की इज्ज़त का कोई ख़याल ही नहीं है। किसी कुत्ते ने इन बातों को सुन लिया (खुदा न खासते) तो उस पर क्या बीतेगी?

और नेताजी का भी गुस्सा करना लाज़मी है। अगर नेता का व्यक्तित्व कुत्ते जैसा हो गया तो उसे कौन सी पार्टी लेगी, कैसे बनेगा वो बड़ा नेता। ये लक्षण उसके लिए प्रतिकूल हैं।

कृपया इस प्रकार के प्रतिकूल प्रचार से बचें। नेता और कुत्ता दोनों।

Saturday, 8 May 2010

अगुआ

उत्तर भारत के एक छोटे से शहर में गर्मी की एक दोपहर। डिस्ट्रिक्ट कोर्ट का एक कोना।
याद रखें कि अगर आप कोर्ट के प्रांगण मैं बैठे हुए हैं तो इत्मीनान से बैठिए। वहाँ सब कुछ अपनी ही गति से होता है। न आप उसे तेज़ कर सकते हैं और न धीमा।

खैर, उस कोने मैं भी कुछ लोग इत्मीनान से बैठे हुए थे। संदीप अपने कंपनी के काम से वकील साहब से मिलने आया था। आस पास वकील साहब के और हाकीम (क्लाएंट) बैठे हुए थे।
संदीप वकील साहब से: "जी इसका तो बिल बनवाना पड़ेगा, उसके बिना दिक्कत हो जाएगा।"

एक बुज़ुर्ग धोती कुर्ते और चन्दन टीके से सज़े हुए।
"बिल का क्या कीजिएगा? यहाँ बिल थोड़े मिलता है।"
संदीप
"क्या करें? कंपनी बिल के बिना थोड़े मानता है। मजबूरी है।"
बुज़ुर्ग
"अच्छा अच्छा तो कंपनी का काम है।""कहाँ काम करते हैं आप?"
संदीप
"जी दिल्ली का एक कंपनी है, यहाँ फैक्टरी लगाना चाहता है।"
बुज़ुर्ग
"अच्छा अच्छा। बहुत बढ़िया बात है। वैसे आप रहने वाले कहाँ के हैं?"
संदीप
"जी मुंगेर जिला"
बुज़ुर्ग
"तो यहाँ रहते हैं कंपनी के काम से?"
संदीप
"जी नई, दिल्ली मैं ही रहते हैं। यहाँ आते जाते रहते हैं।
बुज़ुर्ग
"ओ!! तो वहाँ तो बढ़िया तनख्वाह मिलता होगा।"
संदीप
"जी बस रहने खाने लायक हो जाता है।"
बुज़ुर्ग
"अकेले रहने खाने लायक या परिवार के साथ रहने खाने लायक।"
संदीप
"जी अभी तो अकेले ही हैं।"
बुज़ुर्ग
"बस बस........ यही तो जानना चाहते थे हम।"
"वैसे कौन से गाँव के रहने वाले हैं आप?"
संदीप
"जी रामगढ़।"
बुज़ुर्ग
"रामगढ़...... वहां के कोई नेता भी हैं शायद......"
संदीप
"जी रामजीवन बाबू हैं।"
बुज़ुर्ग
"हाँ हाँ वही।"
संदीप
"वैसे मुंगेर के बेदा बाबू (वेद प्रकाश सिंह) आज कल आपके पास नवादा से ऍम पी हैं।""हमारे मोहल्ले में ही घर हैं उनका।"
बुज़ुर्ग
"अच्छा अच्छा बेदा बाबू। तो आपका उनसे कुछ .........."
संदीप
"जी नहीं नहीं। हमारा कोई रिलेसन नहीं हैं उनसे...........बस हमारी ही बिरादरी से आते हैं वो।"
बुज़ुर्ग
"बस बस यही तो जानना था हमको।"
"बगल में बैठे सज्जन से: हें हें हें.......... आज कल के ज़माना में सीधा सीधा ऐसा सवाल नहीं पूछ सकते हैं न।"

"बस हमको जो जानकारी चाहिए वो मिल गया। वैसे भी हम हर साल कम से कम १० शादी तो करवाते ही हैं।"
"आप अपना फोन नंबर दे दीजिये ज़रा..........."

जी ये थे एक प्रोफेसनल अगुआ। आपको बता दूँ अगुआ लोग जो होते हैं वो बहुत भलाई का काम करते हैं, बहुत पुण्य प्राप्त करते हैं। एक्चुअली अगुआ वो होता है जो लड़की या लड़के का रिश्ता (जेनरली लड़की का) रिश्ता ले के दूसरी पार्टी के पास जाते हैं और दोनों पार्टियों के बीच सामंजस्य का माहोल बनाते हैं। वो दोनों के बीच एडजस्टमेंट करवाते हैं और रिश्ते बनवाते हैं। जी रिश्ते आसमान में नहीं बनते, अगुआ लोगों के यहाँ बनते हैं।

Tuesday, 4 May 2010

बेटी और बाछा

लेख शुरू करने से पहले जो लोग नहीं जानते उन्हें बता दूँ की 'बाछा' गाय के पुत्र को कहते हैं और बाछी पुत्री को।

भकोरन कुछ दिनों से काम पर नहीं आ रहा है।
क्या बात हो गई?
उसकी गाय को बच्चा होने वाला है। वो ज़रा देख रेख में लगा हुआ है।

कुछ दिनों के पश्चात.......

की भकोरन? गाय बिआय गेलो? (क्यों भकोरन गाय को बच्चा हो गया?)
उदास भकोरन: जी। भै गेलै।
की भेलो, बाछा की बाछी।
'बाछा' भेलै।
तब त घटे न लैग गेलो तोरा।
जी घटे छै।

जी हाँ इंसान की बेटी और गाय के बाछे का एक ही हश्र होता है।
आम समझ कहती है की बाछे और बेटी दोनों पर साधन खर्च करने पड़ते हैं। और दोनों ही वापस कुछ नहीं दे पाते हैं, कुछ ले कर ही जाते हैं। न बाछा दूध दे पाता है और न बेटी सहारा। गाय और बेटा दोनों घर का पोषण करते हैं और कमाई भी।

लेकिन आपको बता दूँ की बाछे की हमेशा ऐसी हालत नहीं थी। एक समय था जब लोग बाछे को ज्यादा तवज्जो देते थे। वो समय था जब खेती में बैलों का इस्तेमाल होता था। बाछा बड़ा होकर खेत संभालता। लेकिन अब तो 'कल युग' आ गया है (कल-कारखाने का युग)। बैलों का इस्तेमाल ख़त्म हो चुका है और कल (मशीन) यानी ट्रैक्टर का इस्तेमाल शुरू हो गया है। अब बाछे की क्या आवश्यकता?

आज कल वैसे ज़माना बदल रहा है। ऐसा आभास हो रहा है की अब बेटियां भी बाछे की तरह नहीं बल्कि गाय की तरह होती जा रही हैं। कुछ लोग कहते हैं की बेटे तो धोखेबाज़ होते हैं, जिंदगी भर पालो पोसो और फिर धोखा दे देते हैं। बेटियों में एक अपनेपन की भावना होती है। जिंदगी भर जितना बन पड़ता है ज़रूर करती हैं। बेटी ही अपनी होती है बेटा नहीं।
हालत ऐसी हो गई है कि अगर किसी एक का बेटा उसके लिए थोडा कुछ कर दे तो उसे तुरंत 'श्रवणकुमार' की उपाधि दे दी जाती है। जैसे की कुछ अजूबा हो गया हो।

तो कल युग में कई चीज़ें बदल रही हैं। बेटियां अब बाछा नहीं बाछी (जो आगे चल के गाय बनेगी) होती जा रही हैं।

जय हो कल युग की। जय हो बेटियों की।

Sunday, 2 May 2010

भारत बंद

आपने भी सुना होगा, देखा होगा या महसूस किया होगा। कुछ दिनों पहले भारत बंद था।
ये मत समझिएगा की भारत बंद का मतलब भारत दूसरों के लिए बंद था।

पकिस्तान से आने वाले आतंकियों के लिए भारत बंद नहीं था। वो अपने च्वाइस के रास्ते से भारत आ सकते हैं (चाहे कश्मीर के रास्ते या समुन्दर का आनंद लेते हुए मुंबई के रास्ते)। और अगर वो पश्चिमी दुनिया से वास्ता रखते हैं तो डेविड हेडली की तरह हवाई यात्रा करके भी आ रकते हैं। भारत नेपाल के नक्सलियों के लिए हथियार लाने वालों के लिए भी बंद नहीं था। न ही भारत बंगलादेश से आने वाले अनाधिकृत 'भारतवासियों' के लिए बंद था।
इन सबके लिए भारत बंद करने की ताकत न अलग थलग विपक्ष में है, न संयुक्त विपक्ष में है और न सरकार में।

भारत बंद तो सिर्फ भारतवासियों के लिए था। बढती कीमतों के विरोध में। मकसद साफ़ था, भारत बंद कर दो, आम आदमी न खरीददारी कर पायेगा और न ही उसपर बढती कीमतों का असर होगा। अदभुद आईडिया।

खैर में उत्तर भारत के एक राज्य के एक शहर से उसकी राजधानी की ओर जा रहा था।
सामने सड़क पर दो बसों को ऐसे लगाया गया है कि कोई गाड़ी न निकल सके। कुछ गुंडे जैसे लोग धोती कुरता पहने एक बेंच लगा कर सड़क पर वहीं बैठे हैं और आती जाती गाड़ियों को तोड़ने फोड़ने कि धमकी दे रहे हैं।
हम भी गाड़ी साइड लगा कर खड़े हो गए।

बगल में एक दुकान के बाहर ठंढी छाया में इस उपद्रव के नेता (प्रधान जी) बैठे हुए हैं। वो सड़क पर नहीं उतर रहे (धुप काफी है)। उनके चेले सड़क पर उपद्रव मचा रहे हैं। बढ़िया चल रहा है भारत बंद।

कुछ देर में एक एम्बुलेंस आई। उसे भी रोका गया। पूछ ताछ की गयी। कुछ काम से जा रहे हो तो जाओ वरना यहीं रुकना पड़ेगा। हाँ भाई एम्बुलेंस की क्या औकाद है। देश से ऊपर थोड़े है। देश की भलाई के लिए भारत बंद है। खैर एम्बुलेंस को १० मिनट में छोड़ दिया गया (१-२ मिनट की देरी से जीवन मरण का फैसला होता है वैसे)।

कुछ समय पश्चात स्तानीय थाना अध्यक्ष आए। बंद खुलने की कुछ आशा बंधी। जा कर बैठे प्रधान जी के साथ। बात चीत का दौड़ चल रहा है। चाय ठंढा मंगवाया गया। एक घंटा और गुज़रा।

दूर से एक मोटर साइकिल पर बैठा एक आदमी आता दिखा जिसके हाथ में एक विडियो कैमरा था। अब असल माजरा समझ आया।

कैमरा मेन आकर सड़क पर खड़ा हुआ।
'प्रधान जी, आइये।"
प्रधान जी आए सड़क पर। साथ में २०-२५ चेले खड़े हुए। गाड़ी से एक दो झंडे निकाले गए।
सड़क के किनारे थानाद्यक्ष महोदय भी अपने हवाल्दारों के साथ खड़े हो गए।
कैमरा चालू हुआ।
नारेबाजी।
'भारत बंद सफल हुआ।'
'कीमतें घटाओ।'

२ मिनट के बाद कैमरा बंद हुआ। भारत बंद सफल रहा। और प्रधान जी अपने घर की ओर चले।
अब हवाल्दारों ने अपनी लाठियां घुमाई। सड़क पर से गाड़ियाँ हटवाई। भारत को खुलवाया (जो पहले बंद था)।

प्रधान जी ने अपना फ़र्ज़ निभाया। थानाध्यक्ष महोदय ने अपना काम मुस्तैदी से किया। दोनों के कामों की रेकॉर्डिंग हो गयी कैमरे में।

आम जनता के हक़ के रखवाले अभी जिन्दा हैं। चिंता की कोई आवश्यकता नहीं है।
चार घंटे आरामही करके, तेल बचा के, महंगाई से बच के हम भी आगे बढे।

धन्यवाद नेता। धन्यवाद अभिनेता।

Friday, 23 April 2010

जीवन का क्रम

स्कूल
क्लास 10
'बेटा बस दसवीं मैं अच्छे से पढ़ाई कर लो। इसके बाद अच्छे स्कूल में एड्मिशन बाद जाएगा, बस फिर आगे तो आराम ही है।

क्लास 12
'बेटा बस अभी अच्छे से पढ़ाई कर लो, अच्छे कॉलेज (मेडिकल इंजीन्यरिंग) में एड्मिशन हो जाएगा, बस फिर आगे तो आराम ही आराम है।

ग्राजुएशन कॉलेज
'बेटा बस यहाँ मेहनत कर लो, अच्छी जगह पोस्ट ग्राजुएशन में एड्मिशन हो जाएगा, बस फिर आराम ही आराम है।

पोस्ट ग्राजुएशन कॉलेज
'बस यहाँ अगर ध्यान और मेहनत लगा ली तो बढ़िया नौकरी मिल जाएगी, बस फिर तो आराम ही आराम है।

नौकरी
'बेटा बस ध्यान लगा कर और मेहनत से शुरू में काम किया तो आगे बढ़िया पोस्ट और पैसा मिलेगा, फिर तो बस जिंदगी में आराम ही आराम है।

विवाहोप्रांत
'बेटा बस थोड़ा मेहनत से काम किया अभी तो बढ़िया घर और गाड़ी हो जाएगी, फिर तो लाइफ में मौज ही मौज है।

बाल बच्चे
'बेटा थोड़ा बच्चों पर ध्यान दो और मेहनत करो। बढ़िया से पढ़ लिख लिए तो बस, फिर तो तुम्हारी जिंदगी ऐश में कटेगी।

बच्चों के सैटल होने के बाद
'बस अभी थोड़ा मेहनत कर लो, तो रिटायरमेंट के लिए पैसे जमा हो जाएँगे, फिर तो बस आराम ही आराम है।

रिटायरमेंट के बाद
बाल बच्चे सब बाहर रहते हैं। दाल चवाल सब्जी अंटा लाने के लिए खुद ही मेहनत करनी पड़ती है। खैर ये कुछ दिन मेहनत कर लो, फिर तो आराम ही आराम है।
हाँ जिंदगी नहीं, आराम हो होगा, मृत्यु के पश्चात।

यही है जीवन का क्रम। जीवन का मतलब है, संघर्ष। जब तक जीवन है तब तक आराम नहीं।

याद होगा आपको, अमित जी (बच्चन) ने कहा था:
"एक रास्ता है जिंदगी, जो थम गए तो कुछ नहीं"

Monday, 19 April 2010

राजदूत की टंकी पर

धरम पा जी सच ही कहते थे।
"शानदार सवारी..... एक जानदार सवारी।"

हमारे परिवार की पहली गाड़ी, राजदूत। मेडिकल कॉलेज से निकलने के बाद जब पिताजी ने प्राइवेट प्रैक्टिस शुरू की तो हमारे घर आया महाराणा प्रताप का चेतक, हमारा राजदूत। हमारे छोटे से परिवार की बड़ी गाड़ी। हम सिर्फ चार लोग हैं परिवार में। पिताजी, माताजी, बड़ा भाई और मैं।

सेटिंग कुछ यूँ होती थी।
आगे पिताजी, पीछे माताजी। उनके बीच में हमारे बड़े भाई साहब।
और सबसे आगे, राजदूत की टंकी पर महाराणा प्रताप। जी बिलकुल, नाचीज़ अपने बारे में ही बात कर रहा है।

आज भी याद है हवा का वो बालों में सरसराना। बार बार पिताजी मुझे आगे की ओर धकेलते और बार बार मैं फिसलकर पीछे आ जाता। सच में धरमजी, शानदार सवारी, एक जानदार सवारी।

कुछ समय बाद हम शहर में रहने चले गए। और साथ में आया हमारा चेतक।
ज़माना बदला। स्टेज पर स्कूटर की एंट्री हुई।

मेरे चाचाजी की लड़की मेरी ही उम्र की है। चाचाजी नयी स्कूटर लाए घर पर।
उस समय बच्चे स्कूटर में आगे खड़ा हुआ करते थे। ये बड़ा ही उत्साहित और उत्तेजित करने वाला नज़ारा था (बाकी बच्चों के लिए)। ऐसा लगता था जैसे आप सुपरमैन की तरह उड़े जा रहे हैं।
और आप तो जानते ही हैं, खरबूजा खरबूजे को देख कर रंग बदलता है। बस अपनी बहन के इस मज़े को देख कर मैंने भी रंग बदला। मेरी स्कूटर की ज़िद शुरू।

अब पिताजी की कमाई भी पहले से बेहतर हो गयी थी। सो वो भी सकेंड हैण्ड मोटर साइकिल से आगे बढ़ना चाहते थे। सो, मेरी जिद और परिवार की इक्षा ले आई हमारे घर एक नए 'एल ऍम एल वेस्पा' को। और बिक गयी हमारी राजदूत।
जी हाँ, सुपरमैन बनने की लालसा में मैंने महाराणा प्रताप को त्याग दिया।

काफी दिनों तक उड़ने का मज़ा लिया स्कूटर पर। लेकिन लम्बी यात्राओं पर आगे खड़े खड़े पैर दुखते थे। 'चेतक' की टंकी नहीं थी मुझे बचाने को।
तब मेरे बचाव के लिए आता था मेरा सुपरमैन, मेरे असल महाराणा प्रताप। मेरे पिताजी।
जी, तब मेरे पिताजी मुझे अपने पैरों पर बैठा लेते थे। चाहे उन्हें लाख मुश्किल होती चलाने मैं लेकिन मुझे (और परिवार को) आराम देना हमेशा उनकी प्राथमिकता रही।

जी वो थे दिन जब पिताजी ही थे सुपरमैन, वही थे महाराणा प्रताप और वही थे राजदूत। शानदार और जानदार (आज भी हैं)।

Sunday, 18 April 2010

खूब लड़ी मर्दानी वो तो स्कूटी वाली रानी थी

आज कल सुबह सुबह भी काफी गर्मी हो जाती है। 9 बजे सुबह भी ऑफिस जाना भी मुश्किल हो जाता है।
खैर, आँखों में सपने लिए घर से हम चल तो दिए........

धूल भरी सड़क (गुडगाँव की हर सड़क ऐसी ही होती है)। चिलचिलाती धुप।
मैं अपनी 'पक्की मर्द' बाइक पर चला जा रहा था। रिअर व्यृ मिरर पर नज़र गई अचानक।
पीछे से फर्राटे से आती हुई एक स्कूटी दिखी।
मैं मन ही मन हंसा...... ये पिद्दी गाड़ी इतनी तेज़ चल रही है। हेलीकाप्टर समझ रही है खुद को क्या?

मिरर से नज़र हटाई और अपनी धुन में आगे बढ़ गया।
कान में ज़ूउउउउउउउउउउउउउम की आवाज़ आई अचानक और बगल से निकली एक स्कूटी।
उसपर बैठ सवार ने हेलमेट पहन रखा था काला। चेहरा पीली चुनरी से ढाका हुआ था। जैसे ही मुझसे आगे बढ़ी स्कूटी उसके हेलमेट से पीछे उसकी चुनरी उड़ रही थी, सुपरमैन के कपड़े की तरह।

आपको बता दूँ मै उस समय 60 से ऊपर की गति पर चल रहा था। जैसे ही उस स्कूटी और उसके सवार ने मुझे ओवरटेक किया, मन से आवाज़ निकली......... जय हो झाँसी की रानी की।

जी बिल्कुल, उस हवा से बातें करती वीरांगना को देख के लगा जैसे झाँसी की रानी अपने घोड़े पर सवार हो कर युद्ध पर जा रही हो।

खैर, मैं कौन सा हार मानने वाला था। मेरे पास भी थी मेरी 'पक्की मर्द' बाइक। मैंने एक्सिलेटर को थोड़ा झटका दिया।
ट्राफिक धीमा हो गया था। रानी साहिबा भी धीमी हो गयी थी।
यही था मेरा मौका। और मैंने मारा चौका। चुपके से उनके बगल से निकाल कर आगे बढ़ गया।
मुहाहाहाहाहाहा, मैं आगे वो पीछे। बड़ी आई थी हेलीकाप्टर चलाने वाली।

1 मिनट बाद।
जूउउउउउउउउउउउउउम की आवाज़ आई। और मैं देखता ही रह गया।
घोड़े पर सवार रानी लक्षमी बाई फर्राटे से आगे निकाल गयी।
मैं और मेरा 'पक्का मर्द' देखते ही रह गए।
पीछे रानी साहिबा की चुनरी लहरा रही थी। जैसे कह रही हो, "जा अपने माँ के अंचल में छुप जा'।

आधे मिनट बाद दूर वो और उनका घोड़ा दूर सिर्फ एक बिंदी मात्र दिख रहा था।

अगर कहीं मिलती वो तो बस उनसे कहना चाहता था
भारतिय नारी तुझे सलाम ...........

Sunday, 4 April 2010

मोटू और छोटू

मोटू को घर जाना है। तो उसे आई एस बी टी (बस अड्डा) तक छोड़ने जाना होगा।
बस में बैठे। चले। आई एस बी टी के पास उतरे।

अचानक, हैरान परेशान मोटू (अपनी जेबें टटोलते हुए): मेरा मोबाइल कहाँ है? (मोटू के पास नोकिया 3310 हुआ करता था, उस वक्त का पोपुलर मोबाइल)
छोटू: तेरे पास ही तो था। अच्छे से देख ज़रा।
मोटू (परेशानी की चरम सीमा पर): नहीं है यार। लगता है बस में छूट गया। कॉल करो उसपर ज़रा।
छोटू (नंबर लगाने के बाद): स्विच्ड ऑफ आ रहा है। लगता है किसी ने ले लिया होगा और ऑफ कर दिया होगा।
मोटू (झल्लाते हुए): कमीना कहीं का। कीड़ें परें उसे। वापस नहीं दे सकता था। (बेचारा एक फोन उठाने के कारण नरक जाने वाला था)
मोटू छोटू से (गुस्से में): सारी गलती तुम्हारी है।
छोटू (हैरान): मैंने क्या किया? मेरी क्या गलती?
मोटू (डांटते हुए): तुम्हारे साथ में आने का क्या मतलब? ध्यान नहीं रख सकते थे। तुम्हारी ही गलती है सारी।

भाइयों इसे ही दोस्ती कहते हैं। इस रिश्ते में आपका दोस्त पर इतना हक़ होता है कि अपनी गलती के लिए आप दोस्त को डांट सकते हैं।

इसके बाद मोटू के आँखों से मोटे मोटे आंसुओं कि धरा बहने लगी। दीदी को फोन किया बॉम्बे (फोन खो गया, पापा डांटेंगे)। दीदी ने दिलासा किया कि नहीं डांटेंगे, वो नया फोन दिला देंगी। तब जाकर माहोल में थोड़ी शांति आई।
छोटू ने अपना मोबाइल मोटू को दिया घर के सफ़र के लिए और मोटू को रवाना किया।

मोटू के मोबाइलों के कई किस्से हैं। कई मोबाइल आये और कई गए। चड्डियों कि तरह मोबाइल बदलते हैं। आगे और किस्से सुनेंगे महान मोटू के।

Sunday, 28 March 2010

रिश्ते

चारो तरफ विवाह की चहल पहल। लोग खुशियाँ मन रहे हैं। मिठाइयाँ बंट रही हैं। बधाइयों के दौर चल रहे हैं।

विदाई का वक्त हो गया। कुछ लोगों में चर्चा हो रही है।
"अब तो लड़की रोएगी।"
"क्यों रोएगी भला? पड़ोस के शहर में ही तो जा रही है। कभी फुदक के इधर, कभी फुदक के उधर।"
"रोने की क्या बात है? कोई दूर थोड़े ही जी रही है?"

समझने की ये आवश्यकता है की लड़की दूरी या नजदीकी की वजह से नहीं रोती है। रोने का कारण कुछ और ही है।
रोने का कारण हैं उसके 'रिश्ते'। या और ज्यादा स्पस्ट कर के कहा जाए तो वो रोती है अपने 'बदलते रिश्तों' के कारण। पहले उसपर जिन लोगों का हक़ था वो अब कम हो गया है और कुछ नए लोगों का हक़ ज्यादा हो गया है। पहले उसका जिन लोगों पर हक़ था वो अब कम हो गया है। अब उसे अपने 'पुराने रिश्ते' छोड़ कर 'नए रिश्तों' को अपनाना होगा और पूरे तन, मनन और धन से निभाना होगा।

ये आंसू उन्ही 'रिश्तों' के हैं। जो अब पहले जैसे नहीं रह जायेंगे। अगर माँ बीमार है तो २४ घंटे उनकी सेवा नहीं कर पाएगी। भाई की परीक्षा है तो उसके लिए आधी रात में चाय बना कर नहीं ला पाएगी। बहिन के साथ झूले पर नहीं झूल पाएगी। बहुत कुछ बदल जाएगा। ये सिर्फ शहर या घर की बात नहीं है।

रिश्ते पेड़ों की तरह होते हैं। सालो उनमें खाद, पानी (प्रेम, सौहार्द) देते हैं हम। तब कहीं जा कर चाव मिलती है उनकी, फल मिलते हैं उनके। वो कहते हैं न 'ढलान से नीचे गाड़ी लाना बहुत आसान है, ढलान के ऊपर चढ़ाना बहुत ही मुश्किल'। रिश्ते भी ऐसे ही होते हैं। उनको बनाना बड़ा ही मुश्किल है। तोडना बड़ा आसान (ऐसा हम में से कईयों को लगता है)। लेकिन सच मानिए तो टूटे हुए रिश्तों की टीस हमेशा के लिए रह जाती है। रिश्ते तोड़ते वक्त शायद बड़ा आसान लगे लेकिन एक न एक दिन ऐसा आता है जब सच का एहसास होता है। जब उस पेड़ का, उस छाव का, उन फलों की कीमत का एहसास होता है।

कुछ रिश्ते हम बना नहीं सकते, सिर्फ तोड़ सकते हैं। जैसे की हमारा परिवार। इन रिश्तों को बदलने से भी नहीं रोक सकते हम (जैसे वो मजबूर दुल्हन)। कुछ ही ऐसे रिश्ते होते हैं जिन्हें बनाने और तोड़ने की ताकत सिर्फ हममे होती है। जैसे की हमारे दोस्त। एक बहुत की अहम रिश्ता। एक सचे दोस्त को बनाने में बहुत खाद, बहुत पानी लगता है। कई बार हमें इस बात का एहसास नहीं होता है। और ये रिश्ते टूट जाते हैं, या हम तोड़ देते हैं, बिना सोचे, बिना समझे। लेकिन सच मानिए एक दिन ऐसा ज़रूर आएगा जब ये टीस आएगी और शायद हमेशा के लिए रह जायेगी।

वही दिन होगा दुल्हन की विदाई का। तब शायद दुल्हन की आँखों में पानी न हो परन्तु कहीं न कहीं आंसू ज़रूर होंगे........ तब भी शायद आपके पास 'रिश्ते' होंगे, लेकिन 'बदलते रिश्ते'.....



Friday, 19 March 2010

एकलव्य और अर्जुन

इस कहानी में तीन पात्र हैं।

पहले हैं गुरु द्रोण (सुपरवाइसर)।
दूसरा है अर्जुन।
और तीसरा है एकलव्य।

कुछ लोगों का मानना है कि एकलव्य अर्जुन से बेहतर धनुर्धर था। इस मान्यता को अभी के लिए ले कर आगे बढ़ते हैं। एकलव्य भी गुरु द्रोण का ही शिष्य था। उसने भी उनसे ही धनुष कला सीखी थी। फिर भी गुरुदेव को उसकी कला का पता नहीं था। कारण? वो कभी पहले खुद को गुरुदेव के सामने लाया ही नहीं। उसने कभी अपनी कला का एहसास गुरुदेव को दिलाया ही नहीं।
तो अगर आप एक बहुराष्ट्रिये कम्पनी में कार्य करते हैं तो एक बात याद रखें। चाहे आपको धनुष कला आती हो या न आती हो, आप अपनी कला और शिष्य के द्वारा कला प्राप्ति के लिए उठाये गए कष्टों का एहसास गुरु द्रोण को अवश्य दिलाएं। तभी आप अर्जुन बन पायेंगे (गुरुदेव कि नज़र में सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर)। और यदि आप धनुष कला में लगे हुए हैं अपना कर्म समझ कर (और उसका एहसास गुरुवार को नहीं दिला पा रहे हैं) तो आप कहीं एकलव्य न बन जाएँ।
आप कहेंगे इसमें क्या बुराई है। हम अपना कर्म पूरी इमानदारी से करेंगे तो गुरुदेव हमें अवश्य नोटिस करेंगे। जागिये महाशय। गुरुदेव वही नोटिस करेंगे जो उन्हें कराया जाएगा और जो वो करना चाहेंगे।

और यदि आप फिर भी जंगल में चुप कर धनुष कला का अभ्याश करना चाहते हैं और ये सोचते हैं कि सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर बन जाऊँगा (अर्जुन से भी बेहतर) तो वो बाद याद रखें जो महाभारत में हुई थी। कभी कभी गुरुदेव अपने अर्जुन को सर्वश्रेष्ठ बनाए रखने के लिए एकलव्य का अंगूठा भी मांग लेते हैं।

तो मित्रों, मेरे प्यारे एकलव्यों, कम से कम अपने अंगूठे को बचाने के लिए जागो और चिरियाँ कि एक आँख को देखो। अर्जुन ही सर्वाइव करता है एकलव्य नहीं।

Tuesday, 16 March 2010

बाघ बचाएं

आज कल टीवी पर काफी इश्तेहार आ रहे हैं, बाघ बचाने के लिए।

इतने सालों से बाघों की संख्या कम होती जा रही है, तो अब भारत की एक मोबाइल कम्पनी ने बाघों को बचाने का बीड़ा उठाया है। बहुत अच्छी बात है की लोग जागरूक हो रहे हैं और औरों को भी जागरूक कर रहे हैं।

इन इश्तेहारों का असर भी हो रहा है। वो कहते हैं की आप हर तरह से सहियोग दे सकते हैं, ब्लॉग लिख कर भी। तो भैया हमने सोचा हम भी थोडा सहियोग दें। इसी सन्दर्भ में ये पोस्ट लिखने का विचार आया।
ये विचार आया तो और भी कई विचार आये। उनमें से प्रमुख ये है की पोस्ट तो लिख दूँ बाघ बचाने के लिए लेकिन पोस्ट में क्या लिखूं।

टीवी के इश्तेहारों में भारत की कई प्रमुख हस्तियों को देखा। कुछ क्रिकेटर और फ़िल्मी लोग। उनको देखा तो मनन में एक और विचार आया।

आखिर बाघों की संख्या कम क्यों हो रही है? दिक्कत क्या है?
जवाब सादारण सा है। जो गाँधी जी ने कहा था। नहीं नहीं बाघों के बारे में नहीं कहा था उन्होंने। ये कथन पृथ्वी और मनुष्य के रिश्ते पर था।
गाँधी जी ने कहा था 'Earth provides enough to satisfy every man's need, but not every man's greed'। अर्थात पृथ्वी हर एक की ज़रूरतों के लिए काफी देती है लेकिन हर एक के लोभ के लिए नहीं। और आज हम यही कर रहे हैं। हम में से कईयों की ज़रूरतें तो पूरी हो चुकी हैं लेकिन हमें चैन नहीं है। हमें और चाहिए। एक घर है तो एक और पहले से बड़ा घर चाहिए। एक गाड़ी है तो उससे बड़ी एक और चाहिए।

खैर इन इस्तेहारों में जब अपने दिल अज़ीज़ सितारों को देखा तो ऐसा ही ख़याल आया। ये बाघ बचाना चाहते हैं। इन्हें खुद तो बहुमंजिलिये घर चाहिए। और घर की छत पर एक नकली क्रिकेट का मैदान और पहली मंजिल पर एक स्विमिंग पूल। एक गाड़ी से मनन नहीं भरता है। एक से बढ़ कर एक गाड़ियाँ चाहियें (पैसे हैं ज़रूर लीजिये)। ऐसी ऐसी गाड़ियाँ जो एक लीटर तेल में २ किलोमीटर चलें। माना आपके पास साधनों की कमी नहीं है। आज जो चाहें खरीदें।
इल्तजा आपसे बस ये है की टीवी पर आकर मुझे बाघ बचाने की राय देने से पहले कृपा कर के आप स्वयं इस राह पर चलें। आप स्वयं बाघ बचाएं। आपके पास काफी साधन हैं। उनमें से थोडा दान कर के आप कह सकते हैं की मैंने तो योगदान दिया है। लेकिन क्या आपको लगता है की इतना काफी होगा?

क्या बाघ को बचाने के लिए मुझे और आपको नहीं बदलना होगा?

Monday, 8 March 2010

मेरी पहली कोक कैन

बोतलों में मिलती थी कोल्ड ड्रिंक पहले। वैसे ही कोको कोला बड़े डिमांड में था (विदेशी ड्रिंक)।
उस समय (करीब 13 साल पहले) कोक कोल्ड ड्रिंक का कैन ले कर आया।
पता नहीं कहाँ मिलता था वो कैन लेकिन हमने उसको सिर्फ टीवी पर देखा था। शायद दिल्ली जैसे बड़े सहरों में मिलता होगा।

इश्वर की माया। काफी दिन तपस्या करने के बाद हम बिहार के एक माध्यम वर्गीय शहर में गए। देवघर।
चाचाजी रहते हैं वहां।

पहुँचते ही बड़े भईया से पहले सवाल। 'कोक कैन मिलती है क्या यहाँ?'
'हाँ मिलती है।'

'पापा पापा मुझे कोक कैन चाहिए।'
'बोतल वाली पी लो।'
'नहीं!! कैन।'

इतनी महंगी चीज़ (30 रुपये) बड़ी जद्दो जेहेद के बाद मिल ही गयी।

वो ठंडा कैन। उसपर टपकता वो पानी। लाल कैन की वो लाली आँखों में उतर आई।
खैर कैन से कोल्ड द्रिंग तो पीई ली। और फिर कैन को सहेज से वापस घर ले आया।
उसके सर को काटा।

और उस दिन से अगले कुछ महीनों तक जब भी पानी पीता तो मेरा प्यारा कैन मेरे गिलास का काम करता।
कुछ महीन बाद उस कैन ने रूप बदला और बन गया मेरा पेन स्टैंड।

आज न जाने कितने कैन पीने के बाद भी वो मज़ा नहीं आया जो उस पहले कैन में था।

वो थी 'मेरी पहली कोक कैन'......



Saturday, 27 February 2010

स्वर्ग या नर्क: बोर्डर के आर पार

कल में टीवी पर आत्मघाती हमलावरों के बारे में एक कार्यकर्म देख रहा था। इसराइल और फिलिस्तीन का बोर्डर।

एक आदमी एक बम भरी कार में सवार हुआ और बोर्डर के पार जाके एक मकान में टकरा गया।
बड़ा धमाका।
न मकान रहा। न कार रही। न आदमी रहा।

अचानक ज़ेहन में ख़याल आया। ये आदमी स्वर्ग जाएगा या नर्क।

फिलिस्तीन के लोग उसे शहीद मान रहे हैं और कह रहे हैं की ये स्वर्ग जाएगा।
इसराइल में लोग उसे आतंकवादी मान रहे हैं और बद्दुआओ के साथ कह रहे हैं की ये ज़रूर नर्क में जाएगा।

इंसान की बनाई हुई एक लाइन का इतना असर। भगवान् भी कंफिउस हो जाएँ की कहाँ भेजें इसे।
अपने देश के लिए वो धर्म युद्ध लड़ रहा था लेकिन दुसरे देश के लिए क्या.........

Tuesday, 23 February 2010

भावी प्रोजेक्ट मेनेजर

आपको पता ही है। रजनीश 'देश की, देश में' एक सब से बड़ी बहुराष्ट्रिये कंपनी में काम करता है।
जब उसने कंपनी जब ज्वाइन की थी तब कंपनी दंतमंजन का नया बिजनेस शुरू कर रही थी। उससे कहा गया की जाओ ये नयी जगह है, यहाँ दंतमंजन का काम कैसे कब कहाँ शुरू किया जाए पता करो।
खैर, जो काम कहा गया वो पूरा किया रजनीश ने। उसे कहा गया की कंपनी चाहेगी की रजनीश आगे चल के इस दंतमंजन के प्रोजेक्ट का 'प्रोजेक्ट मेनेजर' बने (भावी प्रोजेक्ट मेनेजर)। काफी ख़ुशी हुई। फ्यूचर परफैक्ट।

दंतमंजन के काम पर विचार चल रहा है। काम अभी रुका हुआ है।
रजनीश का क्या किया जाए? चलो तब तक तुम हमारे साबुन वाले बिज़नस पर काम करो।
ठीक है साहब। जो काम मिला मेहनत और निष्ठा से करें।
साबुन का काम करते करते रजनीश उसे आचे से सीख गया।

अब हम दंतमंजन का काम फिर से शुरू कर रहे हैं। तुम्हारी उसमें बहुत ज़रुरत है क्योंकि तुमने ही उसमें काम किया है और तुम आगे भी कर सकते हो।
रजनीश नया था उससमय कोरपोरेट दुनिया में। असमंजस की स्थिति। साबुन पर काम करूँ या दंतमंजन पर। साबुन का काम अच्छे से जानता हूँ। आगे अच्छा काम कर सकता हूँ। लेकिन दंतमंजन का काम बड़ा ज़रूरी है और भविष्य में बड़ा हो सकता है। कैसे लें फैसला।
लोगों ने कहा, तुम ही उस इलाके में दंतमंजन का काम जानते हो। आगे चल के तुम्हें 'प्रोजेक्ट मेनेजर' (भावी प्रोजेक्ट मेनेजर) बना देंगे। फ्यूचर परफेक्ट।
चुन लिया दंतमंजन को, साबुन छोड़ कर (आज भले पछतावा हो)।

दंतमंजन का काम बड़ा हो रहा है। टीम बड़ी हो रही है। नए लोग आये। ज़ाहिर सी बात है, रजनीश के ऊपर (कोरपोरेट दुनिया का रिवाज़)। वो बने 'प्रोजेक्ट मेनेजर'।
रजनीश का काम। जाओ देखो कहाँ, कैसे, कब दंतमंजन का काम हो सकता है।

खैर कुछ दिनों पहले किसी ने कहा की तुम हो दंतमंजन के 'भावी प्रोजेक्ट मेनेजर'।

तो अचानक रजनीश हो एहसास हुआ और उसने कहा।
'नहीं नहीं ये कोई नयी बात नहीं है। में पिछले 5 साल से 'भावी प्रोजेक्ट मेनेजर' हूँ और वही रहूँगा। तो आप कोई नयी बात बताएं मुझे।' अभी तो मेरा है 'फ्यूचर परफेक्ट'।


Wednesday, 17 February 2010

माँ का खून

आज भी ताज़ा है वो खून कमीज़ पर।

अपना कमरा हाल ही में बदला था। छत वाले कमरे को छोड़ कर अब नीचे वाले कमरे में रहने आ गया था।
गर्मी की उस दोपहर में हम सब दोस्त बस बैठ का आपस में बातों के पेंच लड़ा रहे थे।

यार ये बहार भीड़ कैसी। जल्दी चलो, लगता है कुछ गड़बड़ है।

लोगों की भीड़ के बीच घुसे।
ये क्या?

सामने रहने वाले अफगानी परिवार की बच्चियां बिलख रही थीं।
ज़मीन पर पड़ा हुआ है उनका 3 साल का एकलौता भाई। खून फैल रहा है।

'क्या हुआ भाई? '
'किसी ने ध्यान नहीं दिया और बच्चा बालकोनी से गिर गया।'

सब लोग एक दुसरे की ओर देख रहे हैं।
'अरे बच्चा गिर गया।' 'कोई कुछ करो।'
पर कोई कुछ कर नहीं रहा है।

बच्चियों से पुछा, 'पापा मम्मी कहाँ हैं?'
'घर पर नहीं हैं भैया,' बिलखती हुई बड़ी बच्ची ने कहा।

राजन ने लपक के बच्चे को गोद में उठाया।
रोहित और अमित दौड़ कर पड़ोस के डॉक्टर के पास भगा (भले ही वो प्रसूति विशेषज्ञ थे, लेकिन डॉक्टर तो डॉक्टर है)।

राजन भी दौड़ा क्लिनिक की ओर।

'यार, डॉक्टर तो है नहीं।' 'क्या करें ?'
'उधर वाले हॉस्पिटल में ले चलते हैं जल्दी से रिक्शे में बिठा कर।'

सामने से अफगानी आंटी दौड़ी आ रही हैं।
'आंटी, हम इसे हॉस्पिटल ले जाते हैं। आप दूसरे रिक्शे से आइये।'

वो आंटी से माँ हो चुकी थी। उनके कानो में जैसे राजन की आवाज़ ही नहीं गयी।
बच्चे को राजन की गोद से जैसे छीन लिया और खुद दौड़ पड़ी।
रिक्शे पर चढ़ी और हॉस्पिटल की ओर......

किसी और पर कैसे भरोसा करती माँ? आखिर उस बच्चे का नहीं, उस माँ का अपना खून बह रहा था।

बाद में सारे दोस्त हॉस्पिटल गए।
बच्चे को वेंटिलेटर पर रखा है। हालत बहुत नाज़ुक है।
'अंकल अगर किसी चीज़ की ज़रुरत हो तो बताएं। खून या कुछ और भी....'

वो नन्ही से जान तो विदा हो गयी लेकिन माँ का वो खून आज भी कमीज़ पर ताज़ा है।

Saturday, 13 February 2010

साधन (रिसोर्स)

क्या आप एक बहुराष्ट्रिये कम्पनी में काम करते हैं?
क्या आपकी नए ज़माने की नयी नौकरी है?
क्या आप निचले या माध्यम दर्जे पर के कर्मचारी हैं?

अगर इन सब का जवाब हाँ है तो आप इंसान नहीं हैं।

आप सिर्फ एक नाम हैं।
आप सिर्फ एक कर्मचारी नंबर हैं।
आप सिर्फ एक संसाधन हैं। (रिसोर्स)

क्या आपकी जिंदगी में कुछ लक्ष्य हैं?
क्या आपने अपना व्यावसायिक जीवन का प्लान बना रखा है?

तो में ज़रा हंस लेता हूँ आप पर........और खुद पर।

याद रखिये आप एक रिसोर्स हैं। एक संसाधन।
और हर रिसोर्स का एक यूज़र होता है। संसाधन को इस्तेमाल करने वाला।
और वो हैं आपके ऊपर काम करने वाले। आपके सरकार। आपके बॉस।

जब आप इस कॉरपोरेट दुनिया के एक प्यादे हैं तो आपके लक्ष्य क्या होंगे वो फैसला सरकार का होगा।
आपके लिए कौन सा काम ज़रूरी है ये सरकार राज तै करेगी। आपके व्यावसायिक जीवन का प्लान सरकार बनाएगी।
क्योंकि आप एक रिसोर्स हैं। और रिसोर्स का यूज़ कैसे होना है ये तो यूज़र (सरकार) फैसला करेगी।

तो मेरे साथी रिसोर्सों जागो और यूज़र बनने की कोशिश करो।

Sunday, 31 January 2010

वर्दी वाला गुंडा

दिल्ली के आस पास कहीं....

गाड़ी जैसे ही दायीं ओर की सड़क पर मुड़ी, एक हवलदार कूद कर बीच सड़क पर।
डंडा दिखाकर रुकने का इशारा।

'रुकिए रुकिए।'
'क्या बात है साहब।' 'गाड़ी क्यों रुकवाई।' (पुलिस वाले को साहब का संबोधन करना ज़रूरी है)

'गाड़ी से बहार आइये। आपने सीट बेल्ट नहीं लगाया है।'
'जी, ठीक है।'

'गाड़ी के पेपर दिखाइये।'
'जी, ये रहा।'

'इनस्योरेंस दिखाइये।'
'जी, ये रहा।'

'प्रदूषण जांच दिखाइये।'
'जी, वो तो नहीं है।'

'चलिए चालान कटेगा और आपके कागज़ आपको कोर्ट जा कर लेने होंगे।'
'ठीक है जी।'

'आप बिना सीट बेल्ट के कार चला रहे थे। उसका चालान हुआ 1000 रूपया और प्रदूषण का अलग से।'
'काट दूँ चालान?'
'जी अब नियम तो नियम है। तोड़ा है तो काट ही दीजिये चालान।'

'हज़ार रुपये लगेनेगे। और कोर्ट जा के कागज़ लेने होंगे।' कर लीजियेगा?'
'जी चालान कटेगा तो करना ही पड़ेगा।'

'ऑफिस छोड़ के कोर्ट जा पाइयेगा?' 'कोर्ट के चक्कर लगा पाइयेगा?'
'अब साहब नियम तो नियम है। करना तो पड़ेगा ही।'

परेशान पुलिस वाला.....

'अरे क्यों ये कोर्ट के चक्कर में पड़ना चाहते हैं?'
'तो क्या करें साहब?'

'ऐसा कीजिये, 2oo रुपये निकालिए और जाइए।"
(अजब माया है। हम हज़ार का चालान भरने को तैयार है फिर भी ये साहब 200 टिके हुए हैं।)

'जी 200 तो ज्यादा है।'
'और मैंने आपको गलत ही बताया था की में बैंक में काम करता हूँ, असल में में प्रेस में हूँ। वो देखिये गाड़ी पर लगा स्टीकर।'

पुलिस वाला हिला....
'अच्छा, चलिए 100 निकालिए।''साहब थोडा हमारा सोचिये हम भी क्या करें?'
(अब पुलिस वाला नहीं चालक साहब बन गया)

तो 100 रुपये की घूस दी और चलते बने।
शराफत से चालान भी नहीं भर साकते आप। क्या ज़माना आ गया है। घोर गुंडा युग।

Wednesday, 27 January 2010

साथ साथ आगे बढ़ें

जब लोग अपने करियर की शुरुआत करते हैं तो कई तरह की चीज़ें ढूंढते हैं। कुछ लोग बड़ी कंपनी के साथ काम करना चाहते हैं (बड़ा नाम, बड़ा काम)।
कुछ लोग बढ़िया काम करना चाहते हैं। (काम भावना से प्रेरित)कुछ लोग नई और छोटी कंपनियों को चुनते हैं (जैसे जैसे कंपनी आगे बढे आप भी आगे बढ़ें, जैसे जैसे कंपनी बड़ी हो आप भी बड़े हों)
ये जो तीसरी मंजिल है, ये थोड़ी ट्रिकी है।
रजनीश ने एक ऐसी ही छोटी सी कंपनी में नौकरी ली (छोटी लेकिन काम बढ़िया)। लोग कहते थे, और रजनीश भी सोचता था और सपने बुनता था। जैसे जैसे कंपनी बड़ी होगी वैसे वैसे बड़ी तनख्वाह, बड़ा ओहदा, बड़ा ऑफिस।
और सोच के मुताबिक़ कंपनी आगे बढ़ी, कंपनी बड़ी हुई। लेकिन क्या हुआ उस बड़ी तनख्वाह, बड़े ओहदे, बड़े ऑफिस के सपने का।
न तनख्वाह बड़ी हुई, न ओहदा बड़ा हुआ, न ऑफिस। उसकी टीम बड़ी हुई, उसके ऊपर बड़े लोग आए जिनके पास थी बड़ी तनख्वाह, जिनका था बड़ा ओहदा और ऑफिस खैर वो तो उनका भी उतना ही बड़ा था।
और रजनीश का क्या? कंपनी के बढ़ने के साथ उसका बढ़ा दुःख, बढ़ी उदासी, बढ़ी निराशा। लेकिन हाँ, कुछ घटा भी। उसकी घटी इज्ज़त।
तो आप चिंता न करें। आप भी कंपनी के साथ आगे बढ़ेंगे। लेकिन किस रास्ते पर ये सोच लीजियेगा। यही है कहानी इस कोरपोरेट वर्ल्ड की।

Thursday, 21 January 2010

सबसे बड़ा वैज्ञानिक: इश्वर

ऊपर वाला भी गज़ब दिमाग लगाता है। पानी जैसी चीज़ बना दी, जिसके बिना जीवन का होना असंभव है।
और दिया भी तो इतना पानी। धरती का 75% हिस्सा पानी।
उसी की कहानी है ये।

इश्वर 1: ये धरती जो जगह है, वहां कोई ऐसी चीज़ देते हैं जिससे वहां जीवन आबाद हो सके।

इश्वर 2: अरे सर, वो है न चीज़, जो हमने मंगल ग्रह पर डाली थी। क्या नाम था उसका। अम्म्मम्म्म्मम्म
अरे वही जो बहता है, जिसका कोई रंग नहीं है। अम्म्मम्म्म्मम्म

इश्वर 3: अबे, पानी की बात तो नहीं कर रहा है?

इश्वर 2: हाँ हाँ, वही वही।

इश्वर 1: आईडिया, तो अच्छा है। और मंगल से पानी निकालने के बाद अपने पास स्टॉक भी पड़ा हुआ है।

इश्वर 3: लेकिन सर.......धरती पर हम तो आगे वो इंसान को भी डालने का प्लान कर रहे हैं न।

इश्वर 2: तो उससे क्या?

इश्वर 3: एक्चुअली, आपको याद होगा वो मंगल पर हमने 'इडियट' (तकनीकी भाषा है। आम भाषा में इंसान) वर्सन1 डाला था। आप लोगों ने देखा कितनी बर्बादी मचाई उसने वहाँ। फाइनली हमें वहाँ से सब कुछ निकालना पड़ा और दूसरा ग्रह ढूंढना पड़ा।

इश्वर 2: अरे सर, वो तो टेस्ट रन था। उसके बाद तो टेकनोलोजी इतनी आगे बढ़ी है। अब तो हमलोगों ने ये 'इडियट' (इंसान) के भी नए वर्सन बनाए हैं। अभी तो हमलोग 'इडियट' वर्सन5 पर हैं। ये पहले से ज्यादा समझदार है। प्रोसेसर (मस्तिस्क) का नया वर्सन लगाया है। और ये पहले से बेहतर काम कर रहा है।

इश्वर 3: लेकिन सर हमारे पास पानी का इतना ही स्टॉक है अब। अगर आपके इस 'इडियट' वर्सन5 ने कुछ गड़बड़ की तो फिर और कहीं और कोई प्राणी नहीं बना पायेंगे हम लोग। और 'जीवन' समाप्त हो जाएगा।

इतनी देर इश्वर 1 इस वार्तालाप को सुन रहे थे।

इश्वर 1: देखिये ये 'इडियट' पहले से बेहतर है इसमें कोई मतभेद नहीं है। लेकिन ये 'इडियट' इडियट प्रूफ है इसकी कोई गारेंटी नहीं हैं। इश्वर 3 की बात जायज़ है। अगर गड़बड़ हुई तो सब ख़त्म हो जाएगा। तो असल मसला है कि पानी को 'इडियट प्रूफ' कैसे बनाएं।

इश्वर 3: एक आईडिया है मेरे पास सर। वो जो आपने बनाया था न सर, क्या नाम था उसका...... हाँ, नमक। ऐसा करते हैं सारे पानी में नमक मिला.....

इश्वर 2: अरे यार, ये नहीं हो सकता। अभी तक इडियट नमक वाला पानी पीने लायक नहीं हुआ है। वो काम नहीं कर पायेगा। इसके अलावा बाकी जो थल प्राणी बनाये हैं हम लोगों ने वो भी नमकीन पानी के साथ काम नहीं कर पायेंगे।

इश्वर 3: सर, नंबर 2 को बोल दीजिये बीच में न टोके। पूरी बात सुनो भाई।
नमक मिला देते हैं। और सूर्य देव को कह देते हैं की वो अपनी गर्मी से पानी को नमक से अलग करें और ज़मीन पर 'थल प्राणियों' के लिए गिरा दें ताकि आपका नया इडियट और बाकी प्राणी अपना काम चला सकें। इससे क्या होगा कि, जितना पानी डालेंगे पृथ्वी पर उसका सिर्फ 5% आपके इडियट के हिस्से में आएगा। एक तो हमारा बाकी पानी खराब होने से बच जाएगा। और आपका इडियट कम पानी में जीने के लिए ट्रेन हो जाएगा (शायद)।

इश्वर 1: वाट एन आईडिया सर जी। यही करेंगे हमलोग। पानी, नमक, सूर्य देव। अल्टीमेट कम्बिनेसन।

तो आखिर इन सारे वैज्ञानिकों ने मिलकर ये गज़ब आईडिया निकाला।
सफल हुआ या नहीं ये सोचना हमारा काम है। लेकिन आईडिया बहुत बढ़िया था। सारा पानी दे दो लेकिन इस्तेमाल करने को सिर्फ थोडा सा दो।
डबल फायदा।

खैर, ये भी बता दूँ की इश्वर 1 मैनेजमेंट वैज्ञानिक थे, इश्वर 2 आई टी वज्ञानिक थे और इश्वर 3 केमिकल वैज्ञानिक थे। टीम वर्क कर के ही इस धमाकेदार धरती को बसाया उन्होंने।
टीम में और भी इश्वर थे जिनकी बात हमलोग आगे के पोस्टों में करेंगे।


Monday, 18 January 2010

मोक्ष

ये 'मोक्ष' क्या चीज़ है?

मैं आज तक समझ नहीं पाया। शायद मेरे जैसा 'अज्ञानी' समझ भी न सके।
मेरे लिए तो 'मोक्ष' एक बियर बार, एक डिस्को और एक कॉलेज महोत्सव का नाम है।

कुछ लोग कहते हैं की जीवन में अच्छे कर्म करोगे, सही राह पर चलोगे तो मोक्ष की प्राप्ति होगी।
और ये भी सुना है की ये 'मोक्ष' लौकिक 'चीज़' नहीं है, अलौकिक है। दूसरे लोक की।
जब इसकी प्राप्ति होगी तो हम कहीं और होंगे।

पता नहीं इस लोक पर मौजूद किसी प्राणी ने मोक्ष का अनुभव किया है या नहीं। प्रोबबिलिटी कम है, क्योंकि 'मोक्ष' तो है की अलौकिक। अब ये 'चीज़' जिसको किसी लोकिक प्राणी ने अनुभव नहीं किया है, उसको प्राप्त करने के लिए होड़ मची हुई है।

कुछ लोग तर्क देते हैं, कि वेदों और पुराणों में लिखा हुआ है इसके बारे में और इसको प्राप्त करने की विधि के बारे में।

तो माज़रा ये है। कुछ पुरानी पुस्तकें हैं जिनकी बताई विधि पर हम अपनी खिचड़ी पका रहे हैं।
ये किताबें उन कालों की हैं जब सभ्यता का प्रारंभ ही हो रहा था।

मुझे ये मामला कुछ गाजर और छड़ी (कैरट एंड स्टिक) का लगता है।
समाज में व्यवस्था बनाए रखने के लिए और जन जीवन को सुचारू रूप से चलाने के लिए आज भी सरकारें, समाज इत्यादि इसका इस्तेमाल करते हैं। तब भी शायद यही किया गया हो। (शायद... में इतना 'ज्ञानी' नहीं हूँ कि पक्का बता सकूँ)।
खैर लोग अच्छे कर्मों में लगें, एक दूसरे से सामंजस्य बनाये रखें, सुविचार बढ़ें, शायद ऐसी बातों को ध्यान में रख कर इसका इजाद हुआ।
अगर आप इस मार्ग पर चलें तो आपको 'गाजर' मिलेगी यानी 'मोक्ष'
और अगर नहीं चले तो 'छड़ी' लगेगी यानी आप अधर में ही लटके रहेंगे या फिर और किसी निम्न प्राणी (कुत्ता, सूअर इत्यादि) के रूप में आपको पृथ्वी पर जीवन यापन करना पड़ेगा।

लेकिन मेरे लिए तो ये सब काफी मुश्किल है। में इस संसार के मोह जाल में फस गया हूँ।
मैं इस धरती पर मिलने वाले 'मोक्ष' ( बियर बार, डिस्को इत्यादि) को प्राप्त करने के पीछे पड़ गया हूँ।

वैसे भी जिसको इस लोक के किसी प्राणी ने देखा नहीं, पाया नहीं, जिसकी कोई गारेंटी नहीं, उसको प्राप्त करने के लिए जिसकी गारेंटी है उसको क्यों छोड़ूं?

जीवन के बाद के जीवन के लिए इस जीवन को न जीऊँ? बहुत नाइंसाफी है।

Friday, 15 January 2010

अलिया झालिया

अलिया गे, नुनु झालिया गे,
घोड़ा-बड़ोद खेत खैलकौ गे।
कहाँ गे, डीह पर गे,
डीह छुटल पर बतिया गे।
हाँको बेटी लछमी,
गोर में देबौ पैजनी।
बड़की क तेल सिंदूर, छोटकी क जट्टा।
उठ रे नाथुन्ना बाली, देख रे तमाशा।
नया घोर उठो...............,
पुरान घोर गिरो.............
बचपन की याद आज भी ताज़ा है।
मामू पैर मोड़ कर लेट जाते। और हम उनके पैर पर।
गीत की लाइनों के साथ मामू के पैर ऊपर नीचे। और उसपर बैठे हम भी ऊपर नीचे।
हाथी घोड़े कहाँ टिक पाएँगे इस राइड के सामने।
और हाँ ध्यान रखें, आखरी की दो लाइनों आईन पैर पूरे ऊपर जायेंगे और फिर नीचें आयेंगे।
एहसास जैसे हवा में उड़ रहे हों।
बचपन की याद आज भी ताज़ा है।

Monday, 11 January 2010

बदलती तनख्वाह

एक बहुराष्ट्रीय कंपनी का ऑफिस। कोई आम कंपनी नहीं। भारत में सबसे बड़ी भारतीय कंपनी।
बहार की एक एजेंसी को कर्मचारियों की तनख्वाह का हिसाब किताब रखने के लिए काम पर लगाया गया है।

ये तो बड़ी अच्छी बात है। कोई एक्सपर्ट काम करेगा तो काम बढ़िया होगा।
किसको पता था की ये भी कंसलटेंट हैं, हमारी ही तरह।)


6 महीने बाद.......


हरीश: यार, मेरी तो हर महीने अलग अलग तनख्वाह आती है। मुझे समझ नहीं आता है कैसे? आखिर हमारे एक्सपर्ट लोग ऐसा क्या काम कर रहे हैं?

प्रीतम: मुझे तो लगता है कि, ये लोग एक घड़े में पैसे रखते हैं। और हर महीने उसमें, हर आदमी के नाम से हाथ डाल कर पैसे निकालते हैं। जिस महीने हाथ में जितना आया उतना आपकी उस महीने कि तनख्वाह।

रजनीश: अगर ऐसी बात है तू मुझे लगता है मेरी तनख्वाह निकालने के लिए तो वो अपनी छोटी बच्ची को बुलाता होगा। क्योंकि अगर वो निकालेगा तो मेरी तनख्वाह के हिसाब से ज्यादा पैसे जी जी ऐसा।


जी हुज़ूर, आज कल ऐसा भी हो रहा है।
तनख्वाह के लिए लक्की ड्रा।
जैसा फेट, वैसे नोट।

Tuesday, 5 January 2010

करवटें बदलते रहे सारि रात हम

जी हाँ.....

करवटें बदलते रहे सारि रात हम,
आपकी कसम....., आपकी कसम.....

ये रोग है ही कुछ ऐसा।
ना ठीक से नींद आती और न चैन।
न ढंग से साँस अन्दर जाती है और न ढंग से बहार आती है।

जी हैं। मैं उसी की बात कर रहा हूँ। जीवन में आपको भी कभी न कभी ज़रूर हुआ होगा।
कभी न कभी क्या साहब, आप कितना भी मना करें, मैं तो कहूँगा कि कई बार हुआ होगा।

मुझे भी वही हो गया है। कल रात सो नहीं पाया ठीक से। बस करवटें बदलता रहा।
क्या कहा, प्यार?
जी हाँ "प्यार तेरा दिल्ली की सर्दी'।
इस पंक्ति के एक हिस्से ने मुझपर वार कर दिया है। परन्तु प्यार ने नहीं, दिल्ली की सर्दी ने।
ठंढ लग गयी है। नाक बंद है।
न साँस अन्दर न बहार।
रात भर बहार तापमान बदलता रहा और मैं करवटें।

दिन रात ग्लोबल वार्मिंग की बातें करता रहता हूँ। दुनियां को इस मुसीबत से बचाने की तरकीबें सोचता रहता हूँ (आखिर सब मुझसे आस लगाए बैठे हैं)। वार्मिंग के चक्कर में ये भूल ही गया था कि जनवरी के महीने में ग्लोबल तो पता नहीं लेकिन दिल्ली कूलिंग भयंकर होती है।

खैर साहब, प्यार तो मिला नहीं, सर्दी ही सही।
सिमटम तो दोनों के एक ही हैं।
प्यार का न सही, सर्दी का ही मज़ा ले लें।

Friday, 1 January 2010

ब्रह्मचारी सिंह

डॉक्टर साहब के पास बैठा था मैं।

एक मरीज़ आकर लेटा बेड पर।
"क्या नाम है आपका?"
"जी, ब्रह्मचारी सिंह"

ये सुनते ही मन से आवाज़ आई....
"इस बेचारे को तो परिवार वालों ने मौका भी नहीं दिया। पैदा होते ही नाम ही ऐसा रख दिया की कोई चांस ही न मिले लाइफ में।"

"किसने रखा आपका ये नाम।"
"जी चचा रखे थे।"

मन में फिर विचार उठा....
"ज़रूर चचा का इनके बाबूजी से कोई ज़मीन का झगडा रहा होगा। तभी इस तरह से बदला लिया बेचारे से।"

डॉक्टर साहब ने पुछा, "कितना बाल बच्चा है?"
मन में फिर आवाज़ उठी...
"जिसका नाम ही ब्रह्मचारी सिंह, उस बेचारे से बच्चों की बात कर के क्यों उसके ज़ख्मों पर नमक डालते है?"

"जी छौ (6) गो बच्चा है।"

मन हैरान रह गया ये सुन कर....
"हे भगवान्! नाम ब्रह्मचारी सिंह और बच्चे 6 ।"


साहब यही विडम्बना है। जब ब्रह्मचारी सिंह के ही छह बच्चे हें तो पता नहीं कामता (काम-ता) प्रशाद, कमलेश्वर(काम- लेश्वर) यादव और बाकियों ने क्या किया होगा?

जय हो मेरे देश। तेरी जय हो।