Sunday, 31 January 2010

वर्दी वाला गुंडा

दिल्ली के आस पास कहीं....

गाड़ी जैसे ही दायीं ओर की सड़क पर मुड़ी, एक हवलदार कूद कर बीच सड़क पर।
डंडा दिखाकर रुकने का इशारा।

'रुकिए रुकिए।'
'क्या बात है साहब।' 'गाड़ी क्यों रुकवाई।' (पुलिस वाले को साहब का संबोधन करना ज़रूरी है)

'गाड़ी से बहार आइये। आपने सीट बेल्ट नहीं लगाया है।'
'जी, ठीक है।'

'गाड़ी के पेपर दिखाइये।'
'जी, ये रहा।'

'इनस्योरेंस दिखाइये।'
'जी, ये रहा।'

'प्रदूषण जांच दिखाइये।'
'जी, वो तो नहीं है।'

'चलिए चालान कटेगा और आपके कागज़ आपको कोर्ट जा कर लेने होंगे।'
'ठीक है जी।'

'आप बिना सीट बेल्ट के कार चला रहे थे। उसका चालान हुआ 1000 रूपया और प्रदूषण का अलग से।'
'काट दूँ चालान?'
'जी अब नियम तो नियम है। तोड़ा है तो काट ही दीजिये चालान।'

'हज़ार रुपये लगेनेगे। और कोर्ट जा के कागज़ लेने होंगे।' कर लीजियेगा?'
'जी चालान कटेगा तो करना ही पड़ेगा।'

'ऑफिस छोड़ के कोर्ट जा पाइयेगा?' 'कोर्ट के चक्कर लगा पाइयेगा?'
'अब साहब नियम तो नियम है। करना तो पड़ेगा ही।'

परेशान पुलिस वाला.....

'अरे क्यों ये कोर्ट के चक्कर में पड़ना चाहते हैं?'
'तो क्या करें साहब?'

'ऐसा कीजिये, 2oo रुपये निकालिए और जाइए।"
(अजब माया है। हम हज़ार का चालान भरने को तैयार है फिर भी ये साहब 200 टिके हुए हैं।)

'जी 200 तो ज्यादा है।'
'और मैंने आपको गलत ही बताया था की में बैंक में काम करता हूँ, असल में में प्रेस में हूँ। वो देखिये गाड़ी पर लगा स्टीकर।'

पुलिस वाला हिला....
'अच्छा, चलिए 100 निकालिए।''साहब थोडा हमारा सोचिये हम भी क्या करें?'
(अब पुलिस वाला नहीं चालक साहब बन गया)

तो 100 रुपये की घूस दी और चलते बने।
शराफत से चालान भी नहीं भर साकते आप। क्या ज़माना आ गया है। घोर गुंडा युग।

Wednesday, 27 January 2010

साथ साथ आगे बढ़ें

जब लोग अपने करियर की शुरुआत करते हैं तो कई तरह की चीज़ें ढूंढते हैं। कुछ लोग बड़ी कंपनी के साथ काम करना चाहते हैं (बड़ा नाम, बड़ा काम)।
कुछ लोग बढ़िया काम करना चाहते हैं। (काम भावना से प्रेरित)कुछ लोग नई और छोटी कंपनियों को चुनते हैं (जैसे जैसे कंपनी आगे बढे आप भी आगे बढ़ें, जैसे जैसे कंपनी बड़ी हो आप भी बड़े हों)
ये जो तीसरी मंजिल है, ये थोड़ी ट्रिकी है।
रजनीश ने एक ऐसी ही छोटी सी कंपनी में नौकरी ली (छोटी लेकिन काम बढ़िया)। लोग कहते थे, और रजनीश भी सोचता था और सपने बुनता था। जैसे जैसे कंपनी बड़ी होगी वैसे वैसे बड़ी तनख्वाह, बड़ा ओहदा, बड़ा ऑफिस।
और सोच के मुताबिक़ कंपनी आगे बढ़ी, कंपनी बड़ी हुई। लेकिन क्या हुआ उस बड़ी तनख्वाह, बड़े ओहदे, बड़े ऑफिस के सपने का।
न तनख्वाह बड़ी हुई, न ओहदा बड़ा हुआ, न ऑफिस। उसकी टीम बड़ी हुई, उसके ऊपर बड़े लोग आए जिनके पास थी बड़ी तनख्वाह, जिनका था बड़ा ओहदा और ऑफिस खैर वो तो उनका भी उतना ही बड़ा था।
और रजनीश का क्या? कंपनी के बढ़ने के साथ उसका बढ़ा दुःख, बढ़ी उदासी, बढ़ी निराशा। लेकिन हाँ, कुछ घटा भी। उसकी घटी इज्ज़त।
तो आप चिंता न करें। आप भी कंपनी के साथ आगे बढ़ेंगे। लेकिन किस रास्ते पर ये सोच लीजियेगा। यही है कहानी इस कोरपोरेट वर्ल्ड की।

Thursday, 21 January 2010

सबसे बड़ा वैज्ञानिक: इश्वर

ऊपर वाला भी गज़ब दिमाग लगाता है। पानी जैसी चीज़ बना दी, जिसके बिना जीवन का होना असंभव है।
और दिया भी तो इतना पानी। धरती का 75% हिस्सा पानी।
उसी की कहानी है ये।

इश्वर 1: ये धरती जो जगह है, वहां कोई ऐसी चीज़ देते हैं जिससे वहां जीवन आबाद हो सके।

इश्वर 2: अरे सर, वो है न चीज़, जो हमने मंगल ग्रह पर डाली थी। क्या नाम था उसका। अम्म्मम्म्म्मम्म
अरे वही जो बहता है, जिसका कोई रंग नहीं है। अम्म्मम्म्म्मम्म

इश्वर 3: अबे, पानी की बात तो नहीं कर रहा है?

इश्वर 2: हाँ हाँ, वही वही।

इश्वर 1: आईडिया, तो अच्छा है। और मंगल से पानी निकालने के बाद अपने पास स्टॉक भी पड़ा हुआ है।

इश्वर 3: लेकिन सर.......धरती पर हम तो आगे वो इंसान को भी डालने का प्लान कर रहे हैं न।

इश्वर 2: तो उससे क्या?

इश्वर 3: एक्चुअली, आपको याद होगा वो मंगल पर हमने 'इडियट' (तकनीकी भाषा है। आम भाषा में इंसान) वर्सन1 डाला था। आप लोगों ने देखा कितनी बर्बादी मचाई उसने वहाँ। फाइनली हमें वहाँ से सब कुछ निकालना पड़ा और दूसरा ग्रह ढूंढना पड़ा।

इश्वर 2: अरे सर, वो तो टेस्ट रन था। उसके बाद तो टेकनोलोजी इतनी आगे बढ़ी है। अब तो हमलोगों ने ये 'इडियट' (इंसान) के भी नए वर्सन बनाए हैं। अभी तो हमलोग 'इडियट' वर्सन5 पर हैं। ये पहले से ज्यादा समझदार है। प्रोसेसर (मस्तिस्क) का नया वर्सन लगाया है। और ये पहले से बेहतर काम कर रहा है।

इश्वर 3: लेकिन सर हमारे पास पानी का इतना ही स्टॉक है अब। अगर आपके इस 'इडियट' वर्सन5 ने कुछ गड़बड़ की तो फिर और कहीं और कोई प्राणी नहीं बना पायेंगे हम लोग। और 'जीवन' समाप्त हो जाएगा।

इतनी देर इश्वर 1 इस वार्तालाप को सुन रहे थे।

इश्वर 1: देखिये ये 'इडियट' पहले से बेहतर है इसमें कोई मतभेद नहीं है। लेकिन ये 'इडियट' इडियट प्रूफ है इसकी कोई गारेंटी नहीं हैं। इश्वर 3 की बात जायज़ है। अगर गड़बड़ हुई तो सब ख़त्म हो जाएगा। तो असल मसला है कि पानी को 'इडियट प्रूफ' कैसे बनाएं।

इश्वर 3: एक आईडिया है मेरे पास सर। वो जो आपने बनाया था न सर, क्या नाम था उसका...... हाँ, नमक। ऐसा करते हैं सारे पानी में नमक मिला.....

इश्वर 2: अरे यार, ये नहीं हो सकता। अभी तक इडियट नमक वाला पानी पीने लायक नहीं हुआ है। वो काम नहीं कर पायेगा। इसके अलावा बाकी जो थल प्राणी बनाये हैं हम लोगों ने वो भी नमकीन पानी के साथ काम नहीं कर पायेंगे।

इश्वर 3: सर, नंबर 2 को बोल दीजिये बीच में न टोके। पूरी बात सुनो भाई।
नमक मिला देते हैं। और सूर्य देव को कह देते हैं की वो अपनी गर्मी से पानी को नमक से अलग करें और ज़मीन पर 'थल प्राणियों' के लिए गिरा दें ताकि आपका नया इडियट और बाकी प्राणी अपना काम चला सकें। इससे क्या होगा कि, जितना पानी डालेंगे पृथ्वी पर उसका सिर्फ 5% आपके इडियट के हिस्से में आएगा। एक तो हमारा बाकी पानी खराब होने से बच जाएगा। और आपका इडियट कम पानी में जीने के लिए ट्रेन हो जाएगा (शायद)।

इश्वर 1: वाट एन आईडिया सर जी। यही करेंगे हमलोग। पानी, नमक, सूर्य देव। अल्टीमेट कम्बिनेसन।

तो आखिर इन सारे वैज्ञानिकों ने मिलकर ये गज़ब आईडिया निकाला।
सफल हुआ या नहीं ये सोचना हमारा काम है। लेकिन आईडिया बहुत बढ़िया था। सारा पानी दे दो लेकिन इस्तेमाल करने को सिर्फ थोडा सा दो।
डबल फायदा।

खैर, ये भी बता दूँ की इश्वर 1 मैनेजमेंट वैज्ञानिक थे, इश्वर 2 आई टी वज्ञानिक थे और इश्वर 3 केमिकल वैज्ञानिक थे। टीम वर्क कर के ही इस धमाकेदार धरती को बसाया उन्होंने।
टीम में और भी इश्वर थे जिनकी बात हमलोग आगे के पोस्टों में करेंगे।


Monday, 18 January 2010

मोक्ष

ये 'मोक्ष' क्या चीज़ है?

मैं आज तक समझ नहीं पाया। शायद मेरे जैसा 'अज्ञानी' समझ भी न सके।
मेरे लिए तो 'मोक्ष' एक बियर बार, एक डिस्को और एक कॉलेज महोत्सव का नाम है।

कुछ लोग कहते हैं की जीवन में अच्छे कर्म करोगे, सही राह पर चलोगे तो मोक्ष की प्राप्ति होगी।
और ये भी सुना है की ये 'मोक्ष' लौकिक 'चीज़' नहीं है, अलौकिक है। दूसरे लोक की।
जब इसकी प्राप्ति होगी तो हम कहीं और होंगे।

पता नहीं इस लोक पर मौजूद किसी प्राणी ने मोक्ष का अनुभव किया है या नहीं। प्रोबबिलिटी कम है, क्योंकि 'मोक्ष' तो है की अलौकिक। अब ये 'चीज़' जिसको किसी लोकिक प्राणी ने अनुभव नहीं किया है, उसको प्राप्त करने के लिए होड़ मची हुई है।

कुछ लोग तर्क देते हैं, कि वेदों और पुराणों में लिखा हुआ है इसके बारे में और इसको प्राप्त करने की विधि के बारे में।

तो माज़रा ये है। कुछ पुरानी पुस्तकें हैं जिनकी बताई विधि पर हम अपनी खिचड़ी पका रहे हैं।
ये किताबें उन कालों की हैं जब सभ्यता का प्रारंभ ही हो रहा था।

मुझे ये मामला कुछ गाजर और छड़ी (कैरट एंड स्टिक) का लगता है।
समाज में व्यवस्था बनाए रखने के लिए और जन जीवन को सुचारू रूप से चलाने के लिए आज भी सरकारें, समाज इत्यादि इसका इस्तेमाल करते हैं। तब भी शायद यही किया गया हो। (शायद... में इतना 'ज्ञानी' नहीं हूँ कि पक्का बता सकूँ)।
खैर लोग अच्छे कर्मों में लगें, एक दूसरे से सामंजस्य बनाये रखें, सुविचार बढ़ें, शायद ऐसी बातों को ध्यान में रख कर इसका इजाद हुआ।
अगर आप इस मार्ग पर चलें तो आपको 'गाजर' मिलेगी यानी 'मोक्ष'
और अगर नहीं चले तो 'छड़ी' लगेगी यानी आप अधर में ही लटके रहेंगे या फिर और किसी निम्न प्राणी (कुत्ता, सूअर इत्यादि) के रूप में आपको पृथ्वी पर जीवन यापन करना पड़ेगा।

लेकिन मेरे लिए तो ये सब काफी मुश्किल है। में इस संसार के मोह जाल में फस गया हूँ।
मैं इस धरती पर मिलने वाले 'मोक्ष' ( बियर बार, डिस्को इत्यादि) को प्राप्त करने के पीछे पड़ गया हूँ।

वैसे भी जिसको इस लोक के किसी प्राणी ने देखा नहीं, पाया नहीं, जिसकी कोई गारेंटी नहीं, उसको प्राप्त करने के लिए जिसकी गारेंटी है उसको क्यों छोड़ूं?

जीवन के बाद के जीवन के लिए इस जीवन को न जीऊँ? बहुत नाइंसाफी है।

Friday, 15 January 2010

अलिया झालिया

अलिया गे, नुनु झालिया गे,
घोड़ा-बड़ोद खेत खैलकौ गे।
कहाँ गे, डीह पर गे,
डीह छुटल पर बतिया गे।
हाँको बेटी लछमी,
गोर में देबौ पैजनी।
बड़की क तेल सिंदूर, छोटकी क जट्टा।
उठ रे नाथुन्ना बाली, देख रे तमाशा।
नया घोर उठो...............,
पुरान घोर गिरो.............
बचपन की याद आज भी ताज़ा है।
मामू पैर मोड़ कर लेट जाते। और हम उनके पैर पर।
गीत की लाइनों के साथ मामू के पैर ऊपर नीचे। और उसपर बैठे हम भी ऊपर नीचे।
हाथी घोड़े कहाँ टिक पाएँगे इस राइड के सामने।
और हाँ ध्यान रखें, आखरी की दो लाइनों आईन पैर पूरे ऊपर जायेंगे और फिर नीचें आयेंगे।
एहसास जैसे हवा में उड़ रहे हों।
बचपन की याद आज भी ताज़ा है।

Monday, 11 January 2010

बदलती तनख्वाह

एक बहुराष्ट्रीय कंपनी का ऑफिस। कोई आम कंपनी नहीं। भारत में सबसे बड़ी भारतीय कंपनी।
बहार की एक एजेंसी को कर्मचारियों की तनख्वाह का हिसाब किताब रखने के लिए काम पर लगाया गया है।

ये तो बड़ी अच्छी बात है। कोई एक्सपर्ट काम करेगा तो काम बढ़िया होगा।
किसको पता था की ये भी कंसलटेंट हैं, हमारी ही तरह।)


6 महीने बाद.......


हरीश: यार, मेरी तो हर महीने अलग अलग तनख्वाह आती है। मुझे समझ नहीं आता है कैसे? आखिर हमारे एक्सपर्ट लोग ऐसा क्या काम कर रहे हैं?

प्रीतम: मुझे तो लगता है कि, ये लोग एक घड़े में पैसे रखते हैं। और हर महीने उसमें, हर आदमी के नाम से हाथ डाल कर पैसे निकालते हैं। जिस महीने हाथ में जितना आया उतना आपकी उस महीने कि तनख्वाह।

रजनीश: अगर ऐसी बात है तू मुझे लगता है मेरी तनख्वाह निकालने के लिए तो वो अपनी छोटी बच्ची को बुलाता होगा। क्योंकि अगर वो निकालेगा तो मेरी तनख्वाह के हिसाब से ज्यादा पैसे जी जी ऐसा।


जी हुज़ूर, आज कल ऐसा भी हो रहा है।
तनख्वाह के लिए लक्की ड्रा।
जैसा फेट, वैसे नोट।

Tuesday, 5 January 2010

करवटें बदलते रहे सारि रात हम

जी हाँ.....

करवटें बदलते रहे सारि रात हम,
आपकी कसम....., आपकी कसम.....

ये रोग है ही कुछ ऐसा।
ना ठीक से नींद आती और न चैन।
न ढंग से साँस अन्दर जाती है और न ढंग से बहार आती है।

जी हैं। मैं उसी की बात कर रहा हूँ। जीवन में आपको भी कभी न कभी ज़रूर हुआ होगा।
कभी न कभी क्या साहब, आप कितना भी मना करें, मैं तो कहूँगा कि कई बार हुआ होगा।

मुझे भी वही हो गया है। कल रात सो नहीं पाया ठीक से। बस करवटें बदलता रहा।
क्या कहा, प्यार?
जी हाँ "प्यार तेरा दिल्ली की सर्दी'।
इस पंक्ति के एक हिस्से ने मुझपर वार कर दिया है। परन्तु प्यार ने नहीं, दिल्ली की सर्दी ने।
ठंढ लग गयी है। नाक बंद है।
न साँस अन्दर न बहार।
रात भर बहार तापमान बदलता रहा और मैं करवटें।

दिन रात ग्लोबल वार्मिंग की बातें करता रहता हूँ। दुनियां को इस मुसीबत से बचाने की तरकीबें सोचता रहता हूँ (आखिर सब मुझसे आस लगाए बैठे हैं)। वार्मिंग के चक्कर में ये भूल ही गया था कि जनवरी के महीने में ग्लोबल तो पता नहीं लेकिन दिल्ली कूलिंग भयंकर होती है।

खैर साहब, प्यार तो मिला नहीं, सर्दी ही सही।
सिमटम तो दोनों के एक ही हैं।
प्यार का न सही, सर्दी का ही मज़ा ले लें।

Friday, 1 January 2010

ब्रह्मचारी सिंह

डॉक्टर साहब के पास बैठा था मैं।

एक मरीज़ आकर लेटा बेड पर।
"क्या नाम है आपका?"
"जी, ब्रह्मचारी सिंह"

ये सुनते ही मन से आवाज़ आई....
"इस बेचारे को तो परिवार वालों ने मौका भी नहीं दिया। पैदा होते ही नाम ही ऐसा रख दिया की कोई चांस ही न मिले लाइफ में।"

"किसने रखा आपका ये नाम।"
"जी चचा रखे थे।"

मन में फिर विचार उठा....
"ज़रूर चचा का इनके बाबूजी से कोई ज़मीन का झगडा रहा होगा। तभी इस तरह से बदला लिया बेचारे से।"

डॉक्टर साहब ने पुछा, "कितना बाल बच्चा है?"
मन में फिर आवाज़ उठी...
"जिसका नाम ही ब्रह्मचारी सिंह, उस बेचारे से बच्चों की बात कर के क्यों उसके ज़ख्मों पर नमक डालते है?"

"जी छौ (6) गो बच्चा है।"

मन हैरान रह गया ये सुन कर....
"हे भगवान्! नाम ब्रह्मचारी सिंह और बच्चे 6 ।"


साहब यही विडम्बना है। जब ब्रह्मचारी सिंह के ही छह बच्चे हें तो पता नहीं कामता (काम-ता) प्रशाद, कमलेश्वर(काम- लेश्वर) यादव और बाकियों ने क्या किया होगा?

जय हो मेरे देश। तेरी जय हो।