Tuesday, 5 January 2010

करवटें बदलते रहे सारि रात हम

जी हाँ.....

करवटें बदलते रहे सारि रात हम,
आपकी कसम....., आपकी कसम.....

ये रोग है ही कुछ ऐसा।
ना ठीक से नींद आती और न चैन।
न ढंग से साँस अन्दर जाती है और न ढंग से बहार आती है।

जी हैं। मैं उसी की बात कर रहा हूँ। जीवन में आपको भी कभी न कभी ज़रूर हुआ होगा।
कभी न कभी क्या साहब, आप कितना भी मना करें, मैं तो कहूँगा कि कई बार हुआ होगा।

मुझे भी वही हो गया है। कल रात सो नहीं पाया ठीक से। बस करवटें बदलता रहा।
क्या कहा, प्यार?
जी हाँ "प्यार तेरा दिल्ली की सर्दी'।
इस पंक्ति के एक हिस्से ने मुझपर वार कर दिया है। परन्तु प्यार ने नहीं, दिल्ली की सर्दी ने।
ठंढ लग गयी है। नाक बंद है।
न साँस अन्दर न बहार।
रात भर बहार तापमान बदलता रहा और मैं करवटें।

दिन रात ग्लोबल वार्मिंग की बातें करता रहता हूँ। दुनियां को इस मुसीबत से बचाने की तरकीबें सोचता रहता हूँ (आखिर सब मुझसे आस लगाए बैठे हैं)। वार्मिंग के चक्कर में ये भूल ही गया था कि जनवरी के महीने में ग्लोबल तो पता नहीं लेकिन दिल्ली कूलिंग भयंकर होती है।

खैर साहब, प्यार तो मिला नहीं, सर्दी ही सही।
सिमटम तो दोनों के एक ही हैं।
प्यार का न सही, सर्दी का ही मज़ा ले लें।

1 comment:

  1. विक्स की गोली लो
    खीच खीच दूर करो!! :)


    ’सकारात्मक सोच के साथ हिन्दी एवं हिन्दी चिट्ठाकारी के प्रचार एवं प्रसार में योगदान दें.’

    -त्रुटियों की तरफ ध्यान दिलाना जरुरी है किन्तु प्रोत्साहन उससे भी अधिक जरुरी है.

    नोबल पुरुस्कार विजेता एन्टोने फ्रान्स का कहना था कि '९०% सीख प्रोत्साहान देता है.'

    कृपया सह-चिट्ठाकारों को प्रोत्साहित करने में न हिचकिचायें.

    -सादर,
    समीर लाल ’समीर’

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