Monday, 11 January 2010

बदलती तनख्वाह

एक बहुराष्ट्रीय कंपनी का ऑफिस। कोई आम कंपनी नहीं। भारत में सबसे बड़ी भारतीय कंपनी।
बहार की एक एजेंसी को कर्मचारियों की तनख्वाह का हिसाब किताब रखने के लिए काम पर लगाया गया है।

ये तो बड़ी अच्छी बात है। कोई एक्सपर्ट काम करेगा तो काम बढ़िया होगा।
किसको पता था की ये भी कंसलटेंट हैं, हमारी ही तरह।)


6 महीने बाद.......


हरीश: यार, मेरी तो हर महीने अलग अलग तनख्वाह आती है। मुझे समझ नहीं आता है कैसे? आखिर हमारे एक्सपर्ट लोग ऐसा क्या काम कर रहे हैं?

प्रीतम: मुझे तो लगता है कि, ये लोग एक घड़े में पैसे रखते हैं। और हर महीने उसमें, हर आदमी के नाम से हाथ डाल कर पैसे निकालते हैं। जिस महीने हाथ में जितना आया उतना आपकी उस महीने कि तनख्वाह।

रजनीश: अगर ऐसी बात है तू मुझे लगता है मेरी तनख्वाह निकालने के लिए तो वो अपनी छोटी बच्ची को बुलाता होगा। क्योंकि अगर वो निकालेगा तो मेरी तनख्वाह के हिसाब से ज्यादा पैसे जी जी ऐसा।


जी हुज़ूर, आज कल ऐसा भी हो रहा है।
तनख्वाह के लिए लक्की ड्रा।
जैसा फेट, वैसे नोट।

2 comments:

  1. जब तक नकली नोट नहीं पकड़ा रहे, शुक्र मनाईये!!

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  2. बैनर तो गजब का लगाये हो गुरू.....एकदम मस्त।

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