Friday, 15 January 2010

अलिया झालिया

अलिया गे, नुनु झालिया गे,
घोड़ा-बड़ोद खेत खैलकौ गे।
कहाँ गे, डीह पर गे,
डीह छुटल पर बतिया गे।
हाँको बेटी लछमी,
गोर में देबौ पैजनी।
बड़की क तेल सिंदूर, छोटकी क जट्टा।
उठ रे नाथुन्ना बाली, देख रे तमाशा।
नया घोर उठो...............,
पुरान घोर गिरो.............
बचपन की याद आज भी ताज़ा है।
मामू पैर मोड़ कर लेट जाते। और हम उनके पैर पर।
गीत की लाइनों के साथ मामू के पैर ऊपर नीचे। और उसपर बैठे हम भी ऊपर नीचे।
हाथी घोड़े कहाँ टिक पाएँगे इस राइड के सामने।
और हाँ ध्यान रखें, आखरी की दो लाइनों आईन पैर पूरे ऊपर जायेंगे और फिर नीचें आयेंगे।
एहसास जैसे हवा में उड़ रहे हों।
बचपन की याद आज भी ताज़ा है।

2 comments:

  1. बड़ी दूर की याद दिलाई..

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  2. yaad door na hoti jaaye to badhiya hai. seene se laga ke rakhiye yaadon ko

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