Saturday, 27 February 2010

स्वर्ग या नर्क: बोर्डर के आर पार

कल में टीवी पर आत्मघाती हमलावरों के बारे में एक कार्यकर्म देख रहा था। इसराइल और फिलिस्तीन का बोर्डर।

एक आदमी एक बम भरी कार में सवार हुआ और बोर्डर के पार जाके एक मकान में टकरा गया।
बड़ा धमाका।
न मकान रहा। न कार रही। न आदमी रहा।

अचानक ज़ेहन में ख़याल आया। ये आदमी स्वर्ग जाएगा या नर्क।

फिलिस्तीन के लोग उसे शहीद मान रहे हैं और कह रहे हैं की ये स्वर्ग जाएगा।
इसराइल में लोग उसे आतंकवादी मान रहे हैं और बद्दुआओ के साथ कह रहे हैं की ये ज़रूर नर्क में जाएगा।

इंसान की बनाई हुई एक लाइन का इतना असर। भगवान् भी कंफिउस हो जाएँ की कहाँ भेजें इसे।
अपने देश के लिए वो धर्म युद्ध लड़ रहा था लेकिन दुसरे देश के लिए क्या.........

Tuesday, 23 February 2010

भावी प्रोजेक्ट मेनेजर

आपको पता ही है। रजनीश 'देश की, देश में' एक सब से बड़ी बहुराष्ट्रिये कंपनी में काम करता है।
जब उसने कंपनी जब ज्वाइन की थी तब कंपनी दंतमंजन का नया बिजनेस शुरू कर रही थी। उससे कहा गया की जाओ ये नयी जगह है, यहाँ दंतमंजन का काम कैसे कब कहाँ शुरू किया जाए पता करो।
खैर, जो काम कहा गया वो पूरा किया रजनीश ने। उसे कहा गया की कंपनी चाहेगी की रजनीश आगे चल के इस दंतमंजन के प्रोजेक्ट का 'प्रोजेक्ट मेनेजर' बने (भावी प्रोजेक्ट मेनेजर)। काफी ख़ुशी हुई। फ्यूचर परफैक्ट।

दंतमंजन के काम पर विचार चल रहा है। काम अभी रुका हुआ है।
रजनीश का क्या किया जाए? चलो तब तक तुम हमारे साबुन वाले बिज़नस पर काम करो।
ठीक है साहब। जो काम मिला मेहनत और निष्ठा से करें।
साबुन का काम करते करते रजनीश उसे आचे से सीख गया।

अब हम दंतमंजन का काम फिर से शुरू कर रहे हैं। तुम्हारी उसमें बहुत ज़रुरत है क्योंकि तुमने ही उसमें काम किया है और तुम आगे भी कर सकते हो।
रजनीश नया था उससमय कोरपोरेट दुनिया में। असमंजस की स्थिति। साबुन पर काम करूँ या दंतमंजन पर। साबुन का काम अच्छे से जानता हूँ। आगे अच्छा काम कर सकता हूँ। लेकिन दंतमंजन का काम बड़ा ज़रूरी है और भविष्य में बड़ा हो सकता है। कैसे लें फैसला।
लोगों ने कहा, तुम ही उस इलाके में दंतमंजन का काम जानते हो। आगे चल के तुम्हें 'प्रोजेक्ट मेनेजर' (भावी प्रोजेक्ट मेनेजर) बना देंगे। फ्यूचर परफेक्ट।
चुन लिया दंतमंजन को, साबुन छोड़ कर (आज भले पछतावा हो)।

दंतमंजन का काम बड़ा हो रहा है। टीम बड़ी हो रही है। नए लोग आये। ज़ाहिर सी बात है, रजनीश के ऊपर (कोरपोरेट दुनिया का रिवाज़)। वो बने 'प्रोजेक्ट मेनेजर'।
रजनीश का काम। जाओ देखो कहाँ, कैसे, कब दंतमंजन का काम हो सकता है।

खैर कुछ दिनों पहले किसी ने कहा की तुम हो दंतमंजन के 'भावी प्रोजेक्ट मेनेजर'।

तो अचानक रजनीश हो एहसास हुआ और उसने कहा।
'नहीं नहीं ये कोई नयी बात नहीं है। में पिछले 5 साल से 'भावी प्रोजेक्ट मेनेजर' हूँ और वही रहूँगा। तो आप कोई नयी बात बताएं मुझे।' अभी तो मेरा है 'फ्यूचर परफेक्ट'।


Wednesday, 17 February 2010

माँ का खून

आज भी ताज़ा है वो खून कमीज़ पर।

अपना कमरा हाल ही में बदला था। छत वाले कमरे को छोड़ कर अब नीचे वाले कमरे में रहने आ गया था।
गर्मी की उस दोपहर में हम सब दोस्त बस बैठ का आपस में बातों के पेंच लड़ा रहे थे।

यार ये बहार भीड़ कैसी। जल्दी चलो, लगता है कुछ गड़बड़ है।

लोगों की भीड़ के बीच घुसे।
ये क्या?

सामने रहने वाले अफगानी परिवार की बच्चियां बिलख रही थीं।
ज़मीन पर पड़ा हुआ है उनका 3 साल का एकलौता भाई। खून फैल रहा है।

'क्या हुआ भाई? '
'किसी ने ध्यान नहीं दिया और बच्चा बालकोनी से गिर गया।'

सब लोग एक दुसरे की ओर देख रहे हैं।
'अरे बच्चा गिर गया।' 'कोई कुछ करो।'
पर कोई कुछ कर नहीं रहा है।

बच्चियों से पुछा, 'पापा मम्मी कहाँ हैं?'
'घर पर नहीं हैं भैया,' बिलखती हुई बड़ी बच्ची ने कहा।

राजन ने लपक के बच्चे को गोद में उठाया।
रोहित और अमित दौड़ कर पड़ोस के डॉक्टर के पास भगा (भले ही वो प्रसूति विशेषज्ञ थे, लेकिन डॉक्टर तो डॉक्टर है)।

राजन भी दौड़ा क्लिनिक की ओर।

'यार, डॉक्टर तो है नहीं।' 'क्या करें ?'
'उधर वाले हॉस्पिटल में ले चलते हैं जल्दी से रिक्शे में बिठा कर।'

सामने से अफगानी आंटी दौड़ी आ रही हैं।
'आंटी, हम इसे हॉस्पिटल ले जाते हैं। आप दूसरे रिक्शे से आइये।'

वो आंटी से माँ हो चुकी थी। उनके कानो में जैसे राजन की आवाज़ ही नहीं गयी।
बच्चे को राजन की गोद से जैसे छीन लिया और खुद दौड़ पड़ी।
रिक्शे पर चढ़ी और हॉस्पिटल की ओर......

किसी और पर कैसे भरोसा करती माँ? आखिर उस बच्चे का नहीं, उस माँ का अपना खून बह रहा था।

बाद में सारे दोस्त हॉस्पिटल गए।
बच्चे को वेंटिलेटर पर रखा है। हालत बहुत नाज़ुक है।
'अंकल अगर किसी चीज़ की ज़रुरत हो तो बताएं। खून या कुछ और भी....'

वो नन्ही से जान तो विदा हो गयी लेकिन माँ का वो खून आज भी कमीज़ पर ताज़ा है।

Saturday, 13 February 2010

साधन (रिसोर्स)

क्या आप एक बहुराष्ट्रिये कम्पनी में काम करते हैं?
क्या आपकी नए ज़माने की नयी नौकरी है?
क्या आप निचले या माध्यम दर्जे पर के कर्मचारी हैं?

अगर इन सब का जवाब हाँ है तो आप इंसान नहीं हैं।

आप सिर्फ एक नाम हैं।
आप सिर्फ एक कर्मचारी नंबर हैं।
आप सिर्फ एक संसाधन हैं। (रिसोर्स)

क्या आपकी जिंदगी में कुछ लक्ष्य हैं?
क्या आपने अपना व्यावसायिक जीवन का प्लान बना रखा है?

तो में ज़रा हंस लेता हूँ आप पर........और खुद पर।

याद रखिये आप एक रिसोर्स हैं। एक संसाधन।
और हर रिसोर्स का एक यूज़र होता है। संसाधन को इस्तेमाल करने वाला।
और वो हैं आपके ऊपर काम करने वाले। आपके सरकार। आपके बॉस।

जब आप इस कॉरपोरेट दुनिया के एक प्यादे हैं तो आपके लक्ष्य क्या होंगे वो फैसला सरकार का होगा।
आपके लिए कौन सा काम ज़रूरी है ये सरकार राज तै करेगी। आपके व्यावसायिक जीवन का प्लान सरकार बनाएगी।
क्योंकि आप एक रिसोर्स हैं। और रिसोर्स का यूज़ कैसे होना है ये तो यूज़र (सरकार) फैसला करेगी।

तो मेरे साथी रिसोर्सों जागो और यूज़र बनने की कोशिश करो।