Wednesday, 17 February 2010

माँ का खून

आज भी ताज़ा है वो खून कमीज़ पर।

अपना कमरा हाल ही में बदला था। छत वाले कमरे को छोड़ कर अब नीचे वाले कमरे में रहने आ गया था।
गर्मी की उस दोपहर में हम सब दोस्त बस बैठ का आपस में बातों के पेंच लड़ा रहे थे।

यार ये बहार भीड़ कैसी। जल्दी चलो, लगता है कुछ गड़बड़ है।

लोगों की भीड़ के बीच घुसे।
ये क्या?

सामने रहने वाले अफगानी परिवार की बच्चियां बिलख रही थीं।
ज़मीन पर पड़ा हुआ है उनका 3 साल का एकलौता भाई। खून फैल रहा है।

'क्या हुआ भाई? '
'किसी ने ध्यान नहीं दिया और बच्चा बालकोनी से गिर गया।'

सब लोग एक दुसरे की ओर देख रहे हैं।
'अरे बच्चा गिर गया।' 'कोई कुछ करो।'
पर कोई कुछ कर नहीं रहा है।

बच्चियों से पुछा, 'पापा मम्मी कहाँ हैं?'
'घर पर नहीं हैं भैया,' बिलखती हुई बड़ी बच्ची ने कहा।

राजन ने लपक के बच्चे को गोद में उठाया।
रोहित और अमित दौड़ कर पड़ोस के डॉक्टर के पास भगा (भले ही वो प्रसूति विशेषज्ञ थे, लेकिन डॉक्टर तो डॉक्टर है)।

राजन भी दौड़ा क्लिनिक की ओर।

'यार, डॉक्टर तो है नहीं।' 'क्या करें ?'
'उधर वाले हॉस्पिटल में ले चलते हैं जल्दी से रिक्शे में बिठा कर।'

सामने से अफगानी आंटी दौड़ी आ रही हैं।
'आंटी, हम इसे हॉस्पिटल ले जाते हैं। आप दूसरे रिक्शे से आइये।'

वो आंटी से माँ हो चुकी थी। उनके कानो में जैसे राजन की आवाज़ ही नहीं गयी।
बच्चे को राजन की गोद से जैसे छीन लिया और खुद दौड़ पड़ी।
रिक्शे पर चढ़ी और हॉस्पिटल की ओर......

किसी और पर कैसे भरोसा करती माँ? आखिर उस बच्चे का नहीं, उस माँ का अपना खून बह रहा था।

बाद में सारे दोस्त हॉस्पिटल गए।
बच्चे को वेंटिलेटर पर रखा है। हालत बहुत नाज़ुक है।
'अंकल अगर किसी चीज़ की ज़रुरत हो तो बताएं। खून या कुछ और भी....'

वो नन्ही से जान तो विदा हो गयी लेकिन माँ का वो खून आज भी कमीज़ पर ताज़ा है।

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