Sunday, 28 March 2010

रिश्ते

चारो तरफ विवाह की चहल पहल। लोग खुशियाँ मन रहे हैं। मिठाइयाँ बंट रही हैं। बधाइयों के दौर चल रहे हैं।

विदाई का वक्त हो गया। कुछ लोगों में चर्चा हो रही है।
"अब तो लड़की रोएगी।"
"क्यों रोएगी भला? पड़ोस के शहर में ही तो जा रही है। कभी फुदक के इधर, कभी फुदक के उधर।"
"रोने की क्या बात है? कोई दूर थोड़े ही जी रही है?"

समझने की ये आवश्यकता है की लड़की दूरी या नजदीकी की वजह से नहीं रोती है। रोने का कारण कुछ और ही है।
रोने का कारण हैं उसके 'रिश्ते'। या और ज्यादा स्पस्ट कर के कहा जाए तो वो रोती है अपने 'बदलते रिश्तों' के कारण। पहले उसपर जिन लोगों का हक़ था वो अब कम हो गया है और कुछ नए लोगों का हक़ ज्यादा हो गया है। पहले उसका जिन लोगों पर हक़ था वो अब कम हो गया है। अब उसे अपने 'पुराने रिश्ते' छोड़ कर 'नए रिश्तों' को अपनाना होगा और पूरे तन, मनन और धन से निभाना होगा।

ये आंसू उन्ही 'रिश्तों' के हैं। जो अब पहले जैसे नहीं रह जायेंगे। अगर माँ बीमार है तो २४ घंटे उनकी सेवा नहीं कर पाएगी। भाई की परीक्षा है तो उसके लिए आधी रात में चाय बना कर नहीं ला पाएगी। बहिन के साथ झूले पर नहीं झूल पाएगी। बहुत कुछ बदल जाएगा। ये सिर्फ शहर या घर की बात नहीं है।

रिश्ते पेड़ों की तरह होते हैं। सालो उनमें खाद, पानी (प्रेम, सौहार्द) देते हैं हम। तब कहीं जा कर चाव मिलती है उनकी, फल मिलते हैं उनके। वो कहते हैं न 'ढलान से नीचे गाड़ी लाना बहुत आसान है, ढलान के ऊपर चढ़ाना बहुत ही मुश्किल'। रिश्ते भी ऐसे ही होते हैं। उनको बनाना बड़ा ही मुश्किल है। तोडना बड़ा आसान (ऐसा हम में से कईयों को लगता है)। लेकिन सच मानिए तो टूटे हुए रिश्तों की टीस हमेशा के लिए रह जाती है। रिश्ते तोड़ते वक्त शायद बड़ा आसान लगे लेकिन एक न एक दिन ऐसा आता है जब सच का एहसास होता है। जब उस पेड़ का, उस छाव का, उन फलों की कीमत का एहसास होता है।

कुछ रिश्ते हम बना नहीं सकते, सिर्फ तोड़ सकते हैं। जैसे की हमारा परिवार। इन रिश्तों को बदलने से भी नहीं रोक सकते हम (जैसे वो मजबूर दुल्हन)। कुछ ही ऐसे रिश्ते होते हैं जिन्हें बनाने और तोड़ने की ताकत सिर्फ हममे होती है। जैसे की हमारे दोस्त। एक बहुत की अहम रिश्ता। एक सचे दोस्त को बनाने में बहुत खाद, बहुत पानी लगता है। कई बार हमें इस बात का एहसास नहीं होता है। और ये रिश्ते टूट जाते हैं, या हम तोड़ देते हैं, बिना सोचे, बिना समझे। लेकिन सच मानिए एक दिन ऐसा ज़रूर आएगा जब ये टीस आएगी और शायद हमेशा के लिए रह जायेगी।

वही दिन होगा दुल्हन की विदाई का। तब शायद दुल्हन की आँखों में पानी न हो परन्तु कहीं न कहीं आंसू ज़रूर होंगे........ तब भी शायद आपके पास 'रिश्ते' होंगे, लेकिन 'बदलते रिश्ते'.....



Friday, 19 March 2010

एकलव्य और अर्जुन

इस कहानी में तीन पात्र हैं।

पहले हैं गुरु द्रोण (सुपरवाइसर)।
दूसरा है अर्जुन।
और तीसरा है एकलव्य।

कुछ लोगों का मानना है कि एकलव्य अर्जुन से बेहतर धनुर्धर था। इस मान्यता को अभी के लिए ले कर आगे बढ़ते हैं। एकलव्य भी गुरु द्रोण का ही शिष्य था। उसने भी उनसे ही धनुष कला सीखी थी। फिर भी गुरुदेव को उसकी कला का पता नहीं था। कारण? वो कभी पहले खुद को गुरुदेव के सामने लाया ही नहीं। उसने कभी अपनी कला का एहसास गुरुदेव को दिलाया ही नहीं।
तो अगर आप एक बहुराष्ट्रिये कम्पनी में कार्य करते हैं तो एक बात याद रखें। चाहे आपको धनुष कला आती हो या न आती हो, आप अपनी कला और शिष्य के द्वारा कला प्राप्ति के लिए उठाये गए कष्टों का एहसास गुरु द्रोण को अवश्य दिलाएं। तभी आप अर्जुन बन पायेंगे (गुरुदेव कि नज़र में सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर)। और यदि आप धनुष कला में लगे हुए हैं अपना कर्म समझ कर (और उसका एहसास गुरुवार को नहीं दिला पा रहे हैं) तो आप कहीं एकलव्य न बन जाएँ।
आप कहेंगे इसमें क्या बुराई है। हम अपना कर्म पूरी इमानदारी से करेंगे तो गुरुदेव हमें अवश्य नोटिस करेंगे। जागिये महाशय। गुरुदेव वही नोटिस करेंगे जो उन्हें कराया जाएगा और जो वो करना चाहेंगे।

और यदि आप फिर भी जंगल में चुप कर धनुष कला का अभ्याश करना चाहते हैं और ये सोचते हैं कि सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर बन जाऊँगा (अर्जुन से भी बेहतर) तो वो बाद याद रखें जो महाभारत में हुई थी। कभी कभी गुरुदेव अपने अर्जुन को सर्वश्रेष्ठ बनाए रखने के लिए एकलव्य का अंगूठा भी मांग लेते हैं।

तो मित्रों, मेरे प्यारे एकलव्यों, कम से कम अपने अंगूठे को बचाने के लिए जागो और चिरियाँ कि एक आँख को देखो। अर्जुन ही सर्वाइव करता है एकलव्य नहीं।

Tuesday, 16 March 2010

बाघ बचाएं

आज कल टीवी पर काफी इश्तेहार आ रहे हैं, बाघ बचाने के लिए।

इतने सालों से बाघों की संख्या कम होती जा रही है, तो अब भारत की एक मोबाइल कम्पनी ने बाघों को बचाने का बीड़ा उठाया है। बहुत अच्छी बात है की लोग जागरूक हो रहे हैं और औरों को भी जागरूक कर रहे हैं।

इन इश्तेहारों का असर भी हो रहा है। वो कहते हैं की आप हर तरह से सहियोग दे सकते हैं, ब्लॉग लिख कर भी। तो भैया हमने सोचा हम भी थोडा सहियोग दें। इसी सन्दर्भ में ये पोस्ट लिखने का विचार आया।
ये विचार आया तो और भी कई विचार आये। उनमें से प्रमुख ये है की पोस्ट तो लिख दूँ बाघ बचाने के लिए लेकिन पोस्ट में क्या लिखूं।

टीवी के इश्तेहारों में भारत की कई प्रमुख हस्तियों को देखा। कुछ क्रिकेटर और फ़िल्मी लोग। उनको देखा तो मनन में एक और विचार आया।

आखिर बाघों की संख्या कम क्यों हो रही है? दिक्कत क्या है?
जवाब सादारण सा है। जो गाँधी जी ने कहा था। नहीं नहीं बाघों के बारे में नहीं कहा था उन्होंने। ये कथन पृथ्वी और मनुष्य के रिश्ते पर था।
गाँधी जी ने कहा था 'Earth provides enough to satisfy every man's need, but not every man's greed'। अर्थात पृथ्वी हर एक की ज़रूरतों के लिए काफी देती है लेकिन हर एक के लोभ के लिए नहीं। और आज हम यही कर रहे हैं। हम में से कईयों की ज़रूरतें तो पूरी हो चुकी हैं लेकिन हमें चैन नहीं है। हमें और चाहिए। एक घर है तो एक और पहले से बड़ा घर चाहिए। एक गाड़ी है तो उससे बड़ी एक और चाहिए।

खैर इन इस्तेहारों में जब अपने दिल अज़ीज़ सितारों को देखा तो ऐसा ही ख़याल आया। ये बाघ बचाना चाहते हैं। इन्हें खुद तो बहुमंजिलिये घर चाहिए। और घर की छत पर एक नकली क्रिकेट का मैदान और पहली मंजिल पर एक स्विमिंग पूल। एक गाड़ी से मनन नहीं भरता है। एक से बढ़ कर एक गाड़ियाँ चाहियें (पैसे हैं ज़रूर लीजिये)। ऐसी ऐसी गाड़ियाँ जो एक लीटर तेल में २ किलोमीटर चलें। माना आपके पास साधनों की कमी नहीं है। आज जो चाहें खरीदें।
इल्तजा आपसे बस ये है की टीवी पर आकर मुझे बाघ बचाने की राय देने से पहले कृपा कर के आप स्वयं इस राह पर चलें। आप स्वयं बाघ बचाएं। आपके पास काफी साधन हैं। उनमें से थोडा दान कर के आप कह सकते हैं की मैंने तो योगदान दिया है। लेकिन क्या आपको लगता है की इतना काफी होगा?

क्या बाघ को बचाने के लिए मुझे और आपको नहीं बदलना होगा?

Monday, 8 March 2010

मेरी पहली कोक कैन

बोतलों में मिलती थी कोल्ड ड्रिंक पहले। वैसे ही कोको कोला बड़े डिमांड में था (विदेशी ड्रिंक)।
उस समय (करीब 13 साल पहले) कोक कोल्ड ड्रिंक का कैन ले कर आया।
पता नहीं कहाँ मिलता था वो कैन लेकिन हमने उसको सिर्फ टीवी पर देखा था। शायद दिल्ली जैसे बड़े सहरों में मिलता होगा।

इश्वर की माया। काफी दिन तपस्या करने के बाद हम बिहार के एक माध्यम वर्गीय शहर में गए। देवघर।
चाचाजी रहते हैं वहां।

पहुँचते ही बड़े भईया से पहले सवाल। 'कोक कैन मिलती है क्या यहाँ?'
'हाँ मिलती है।'

'पापा पापा मुझे कोक कैन चाहिए।'
'बोतल वाली पी लो।'
'नहीं!! कैन।'

इतनी महंगी चीज़ (30 रुपये) बड़ी जद्दो जेहेद के बाद मिल ही गयी।

वो ठंडा कैन। उसपर टपकता वो पानी। लाल कैन की वो लाली आँखों में उतर आई।
खैर कैन से कोल्ड द्रिंग तो पीई ली। और फिर कैन को सहेज से वापस घर ले आया।
उसके सर को काटा।

और उस दिन से अगले कुछ महीनों तक जब भी पानी पीता तो मेरा प्यारा कैन मेरे गिलास का काम करता।
कुछ महीन बाद उस कैन ने रूप बदला और बन गया मेरा पेन स्टैंड।

आज न जाने कितने कैन पीने के बाद भी वो मज़ा नहीं आया जो उस पहले कैन में था।

वो थी 'मेरी पहली कोक कैन'......