Tuesday, 16 March 2010

बाघ बचाएं

आज कल टीवी पर काफी इश्तेहार आ रहे हैं, बाघ बचाने के लिए।

इतने सालों से बाघों की संख्या कम होती जा रही है, तो अब भारत की एक मोबाइल कम्पनी ने बाघों को बचाने का बीड़ा उठाया है। बहुत अच्छी बात है की लोग जागरूक हो रहे हैं और औरों को भी जागरूक कर रहे हैं।

इन इश्तेहारों का असर भी हो रहा है। वो कहते हैं की आप हर तरह से सहियोग दे सकते हैं, ब्लॉग लिख कर भी। तो भैया हमने सोचा हम भी थोडा सहियोग दें। इसी सन्दर्भ में ये पोस्ट लिखने का विचार आया।
ये विचार आया तो और भी कई विचार आये। उनमें से प्रमुख ये है की पोस्ट तो लिख दूँ बाघ बचाने के लिए लेकिन पोस्ट में क्या लिखूं।

टीवी के इश्तेहारों में भारत की कई प्रमुख हस्तियों को देखा। कुछ क्रिकेटर और फ़िल्मी लोग। उनको देखा तो मनन में एक और विचार आया।

आखिर बाघों की संख्या कम क्यों हो रही है? दिक्कत क्या है?
जवाब सादारण सा है। जो गाँधी जी ने कहा था। नहीं नहीं बाघों के बारे में नहीं कहा था उन्होंने। ये कथन पृथ्वी और मनुष्य के रिश्ते पर था।
गाँधी जी ने कहा था 'Earth provides enough to satisfy every man's need, but not every man's greed'। अर्थात पृथ्वी हर एक की ज़रूरतों के लिए काफी देती है लेकिन हर एक के लोभ के लिए नहीं। और आज हम यही कर रहे हैं। हम में से कईयों की ज़रूरतें तो पूरी हो चुकी हैं लेकिन हमें चैन नहीं है। हमें और चाहिए। एक घर है तो एक और पहले से बड़ा घर चाहिए। एक गाड़ी है तो उससे बड़ी एक और चाहिए।

खैर इन इस्तेहारों में जब अपने दिल अज़ीज़ सितारों को देखा तो ऐसा ही ख़याल आया। ये बाघ बचाना चाहते हैं। इन्हें खुद तो बहुमंजिलिये घर चाहिए। और घर की छत पर एक नकली क्रिकेट का मैदान और पहली मंजिल पर एक स्विमिंग पूल। एक गाड़ी से मनन नहीं भरता है। एक से बढ़ कर एक गाड़ियाँ चाहियें (पैसे हैं ज़रूर लीजिये)। ऐसी ऐसी गाड़ियाँ जो एक लीटर तेल में २ किलोमीटर चलें। माना आपके पास साधनों की कमी नहीं है। आज जो चाहें खरीदें।
इल्तजा आपसे बस ये है की टीवी पर आकर मुझे बाघ बचाने की राय देने से पहले कृपा कर के आप स्वयं इस राह पर चलें। आप स्वयं बाघ बचाएं। आपके पास काफी साधन हैं। उनमें से थोडा दान कर के आप कह सकते हैं की मैंने तो योगदान दिया है। लेकिन क्या आपको लगता है की इतना काफी होगा?

क्या बाघ को बचाने के लिए मुझे और आपको नहीं बदलना होगा?

5 comments:

  1. वाह! बाघ के लिए बदल जायेंगे हम ...बदलना ही होता तो बाघ संकट में नहीं आते.. बढ़िया लेख

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  2. "सारे विनाश के जड़ सिर्फ लोभ है। आज ही पढ़ा पेपर में कि जो संख्या विज्ञापन में बताई जाती थी उनमे से 2 बाघों की हत्या कर दी गई (मैं तो इसे हत्या ही मानूँगा)...बाघ अगर लुप्त होता है तो सके ज़िम्मेदारी हमारी भी होगी ...अपने ठीक ही लिखा हमें खुद ही बाघों को बचाना होगा........"
    प्रणव सक्सैना
    amitraghat.blogspot.com

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  3. सभी को बदलना होगा..

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  4. jee har ek baagh ka marna hatya hi hai. humain apne jeewan ka tareeka badalna hoga taki na sirf baagh balki ye prithwi aur hum khud bhi bach paayen

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