Friday, 23 April 2010

जीवन का क्रम

स्कूल
क्लास 10
'बेटा बस दसवीं मैं अच्छे से पढ़ाई कर लो। इसके बाद अच्छे स्कूल में एड्मिशन बाद जाएगा, बस फिर आगे तो आराम ही है।

क्लास 12
'बेटा बस अभी अच्छे से पढ़ाई कर लो, अच्छे कॉलेज (मेडिकल इंजीन्यरिंग) में एड्मिशन हो जाएगा, बस फिर आगे तो आराम ही आराम है।

ग्राजुएशन कॉलेज
'बेटा बस यहाँ मेहनत कर लो, अच्छी जगह पोस्ट ग्राजुएशन में एड्मिशन हो जाएगा, बस फिर आराम ही आराम है।

पोस्ट ग्राजुएशन कॉलेज
'बस यहाँ अगर ध्यान और मेहनत लगा ली तो बढ़िया नौकरी मिल जाएगी, बस फिर तो आराम ही आराम है।

नौकरी
'बेटा बस ध्यान लगा कर और मेहनत से शुरू में काम किया तो आगे बढ़िया पोस्ट और पैसा मिलेगा, फिर तो बस जिंदगी में आराम ही आराम है।

विवाहोप्रांत
'बेटा बस थोड़ा मेहनत से काम किया अभी तो बढ़िया घर और गाड़ी हो जाएगी, फिर तो लाइफ में मौज ही मौज है।

बाल बच्चे
'बेटा थोड़ा बच्चों पर ध्यान दो और मेहनत करो। बढ़िया से पढ़ लिख लिए तो बस, फिर तो तुम्हारी जिंदगी ऐश में कटेगी।

बच्चों के सैटल होने के बाद
'बस अभी थोड़ा मेहनत कर लो, तो रिटायरमेंट के लिए पैसे जमा हो जाएँगे, फिर तो बस आराम ही आराम है।

रिटायरमेंट के बाद
बाल बच्चे सब बाहर रहते हैं। दाल चवाल सब्जी अंटा लाने के लिए खुद ही मेहनत करनी पड़ती है। खैर ये कुछ दिन मेहनत कर लो, फिर तो आराम ही आराम है।
हाँ जिंदगी नहीं, आराम हो होगा, मृत्यु के पश्चात।

यही है जीवन का क्रम। जीवन का मतलब है, संघर्ष। जब तक जीवन है तब तक आराम नहीं।

याद होगा आपको, अमित जी (बच्चन) ने कहा था:
"एक रास्ता है जिंदगी, जो थम गए तो कुछ नहीं"

Monday, 19 April 2010

राजदूत की टंकी पर

धरम पा जी सच ही कहते थे।
"शानदार सवारी..... एक जानदार सवारी।"

हमारे परिवार की पहली गाड़ी, राजदूत। मेडिकल कॉलेज से निकलने के बाद जब पिताजी ने प्राइवेट प्रैक्टिस शुरू की तो हमारे घर आया महाराणा प्रताप का चेतक, हमारा राजदूत। हमारे छोटे से परिवार की बड़ी गाड़ी। हम सिर्फ चार लोग हैं परिवार में। पिताजी, माताजी, बड़ा भाई और मैं।

सेटिंग कुछ यूँ होती थी।
आगे पिताजी, पीछे माताजी। उनके बीच में हमारे बड़े भाई साहब।
और सबसे आगे, राजदूत की टंकी पर महाराणा प्रताप। जी बिलकुल, नाचीज़ अपने बारे में ही बात कर रहा है।

आज भी याद है हवा का वो बालों में सरसराना। बार बार पिताजी मुझे आगे की ओर धकेलते और बार बार मैं फिसलकर पीछे आ जाता। सच में धरमजी, शानदार सवारी, एक जानदार सवारी।

कुछ समय बाद हम शहर में रहने चले गए। और साथ में आया हमारा चेतक।
ज़माना बदला। स्टेज पर स्कूटर की एंट्री हुई।

मेरे चाचाजी की लड़की मेरी ही उम्र की है। चाचाजी नयी स्कूटर लाए घर पर।
उस समय बच्चे स्कूटर में आगे खड़ा हुआ करते थे। ये बड़ा ही उत्साहित और उत्तेजित करने वाला नज़ारा था (बाकी बच्चों के लिए)। ऐसा लगता था जैसे आप सुपरमैन की तरह उड़े जा रहे हैं।
और आप तो जानते ही हैं, खरबूजा खरबूजे को देख कर रंग बदलता है। बस अपनी बहन के इस मज़े को देख कर मैंने भी रंग बदला। मेरी स्कूटर की ज़िद शुरू।

अब पिताजी की कमाई भी पहले से बेहतर हो गयी थी। सो वो भी सकेंड हैण्ड मोटर साइकिल से आगे बढ़ना चाहते थे। सो, मेरी जिद और परिवार की इक्षा ले आई हमारे घर एक नए 'एल ऍम एल वेस्पा' को। और बिक गयी हमारी राजदूत।
जी हाँ, सुपरमैन बनने की लालसा में मैंने महाराणा प्रताप को त्याग दिया।

काफी दिनों तक उड़ने का मज़ा लिया स्कूटर पर। लेकिन लम्बी यात्राओं पर आगे खड़े खड़े पैर दुखते थे। 'चेतक' की टंकी नहीं थी मुझे बचाने को।
तब मेरे बचाव के लिए आता था मेरा सुपरमैन, मेरे असल महाराणा प्रताप। मेरे पिताजी।
जी, तब मेरे पिताजी मुझे अपने पैरों पर बैठा लेते थे। चाहे उन्हें लाख मुश्किल होती चलाने मैं लेकिन मुझे (और परिवार को) आराम देना हमेशा उनकी प्राथमिकता रही।

जी वो थे दिन जब पिताजी ही थे सुपरमैन, वही थे महाराणा प्रताप और वही थे राजदूत। शानदार और जानदार (आज भी हैं)।

Sunday, 18 April 2010

खूब लड़ी मर्दानी वो तो स्कूटी वाली रानी थी

आज कल सुबह सुबह भी काफी गर्मी हो जाती है। 9 बजे सुबह भी ऑफिस जाना भी मुश्किल हो जाता है।
खैर, आँखों में सपने लिए घर से हम चल तो दिए........

धूल भरी सड़क (गुडगाँव की हर सड़क ऐसी ही होती है)। चिलचिलाती धुप।
मैं अपनी 'पक्की मर्द' बाइक पर चला जा रहा था। रिअर व्यृ मिरर पर नज़र गई अचानक।
पीछे से फर्राटे से आती हुई एक स्कूटी दिखी।
मैं मन ही मन हंसा...... ये पिद्दी गाड़ी इतनी तेज़ चल रही है। हेलीकाप्टर समझ रही है खुद को क्या?

मिरर से नज़र हटाई और अपनी धुन में आगे बढ़ गया।
कान में ज़ूउउउउउउउउउउउउउम की आवाज़ आई अचानक और बगल से निकली एक स्कूटी।
उसपर बैठ सवार ने हेलमेट पहन रखा था काला। चेहरा पीली चुनरी से ढाका हुआ था। जैसे ही मुझसे आगे बढ़ी स्कूटी उसके हेलमेट से पीछे उसकी चुनरी उड़ रही थी, सुपरमैन के कपड़े की तरह।

आपको बता दूँ मै उस समय 60 से ऊपर की गति पर चल रहा था। जैसे ही उस स्कूटी और उसके सवार ने मुझे ओवरटेक किया, मन से आवाज़ निकली......... जय हो झाँसी की रानी की।

जी बिल्कुल, उस हवा से बातें करती वीरांगना को देख के लगा जैसे झाँसी की रानी अपने घोड़े पर सवार हो कर युद्ध पर जा रही हो।

खैर, मैं कौन सा हार मानने वाला था। मेरे पास भी थी मेरी 'पक्की मर्द' बाइक। मैंने एक्सिलेटर को थोड़ा झटका दिया।
ट्राफिक धीमा हो गया था। रानी साहिबा भी धीमी हो गयी थी।
यही था मेरा मौका। और मैंने मारा चौका। चुपके से उनके बगल से निकाल कर आगे बढ़ गया।
मुहाहाहाहाहाहा, मैं आगे वो पीछे। बड़ी आई थी हेलीकाप्टर चलाने वाली।

1 मिनट बाद।
जूउउउउउउउउउउउउउम की आवाज़ आई। और मैं देखता ही रह गया।
घोड़े पर सवार रानी लक्षमी बाई फर्राटे से आगे निकाल गयी।
मैं और मेरा 'पक्का मर्द' देखते ही रह गए।
पीछे रानी साहिबा की चुनरी लहरा रही थी। जैसे कह रही हो, "जा अपने माँ के अंचल में छुप जा'।

आधे मिनट बाद दूर वो और उनका घोड़ा दूर सिर्फ एक बिंदी मात्र दिख रहा था।

अगर कहीं मिलती वो तो बस उनसे कहना चाहता था
भारतिय नारी तुझे सलाम ...........

Sunday, 4 April 2010

मोटू और छोटू

मोटू को घर जाना है। तो उसे आई एस बी टी (बस अड्डा) तक छोड़ने जाना होगा।
बस में बैठे। चले। आई एस बी टी के पास उतरे।

अचानक, हैरान परेशान मोटू (अपनी जेबें टटोलते हुए): मेरा मोबाइल कहाँ है? (मोटू के पास नोकिया 3310 हुआ करता था, उस वक्त का पोपुलर मोबाइल)
छोटू: तेरे पास ही तो था। अच्छे से देख ज़रा।
मोटू (परेशानी की चरम सीमा पर): नहीं है यार। लगता है बस में छूट गया। कॉल करो उसपर ज़रा।
छोटू (नंबर लगाने के बाद): स्विच्ड ऑफ आ रहा है। लगता है किसी ने ले लिया होगा और ऑफ कर दिया होगा।
मोटू (झल्लाते हुए): कमीना कहीं का। कीड़ें परें उसे। वापस नहीं दे सकता था। (बेचारा एक फोन उठाने के कारण नरक जाने वाला था)
मोटू छोटू से (गुस्से में): सारी गलती तुम्हारी है।
छोटू (हैरान): मैंने क्या किया? मेरी क्या गलती?
मोटू (डांटते हुए): तुम्हारे साथ में आने का क्या मतलब? ध्यान नहीं रख सकते थे। तुम्हारी ही गलती है सारी।

भाइयों इसे ही दोस्ती कहते हैं। इस रिश्ते में आपका दोस्त पर इतना हक़ होता है कि अपनी गलती के लिए आप दोस्त को डांट सकते हैं।

इसके बाद मोटू के आँखों से मोटे मोटे आंसुओं कि धरा बहने लगी। दीदी को फोन किया बॉम्बे (फोन खो गया, पापा डांटेंगे)। दीदी ने दिलासा किया कि नहीं डांटेंगे, वो नया फोन दिला देंगी। तब जाकर माहोल में थोड़ी शांति आई।
छोटू ने अपना मोबाइल मोटू को दिया घर के सफ़र के लिए और मोटू को रवाना किया।

मोटू के मोबाइलों के कई किस्से हैं। कई मोबाइल आये और कई गए। चड्डियों कि तरह मोबाइल बदलते हैं। आगे और किस्से सुनेंगे महान मोटू के।