Sunday, 4 April 2010

मोटू और छोटू

मोटू को घर जाना है। तो उसे आई एस बी टी (बस अड्डा) तक छोड़ने जाना होगा।
बस में बैठे। चले। आई एस बी टी के पास उतरे।

अचानक, हैरान परेशान मोटू (अपनी जेबें टटोलते हुए): मेरा मोबाइल कहाँ है? (मोटू के पास नोकिया 3310 हुआ करता था, उस वक्त का पोपुलर मोबाइल)
छोटू: तेरे पास ही तो था। अच्छे से देख ज़रा।
मोटू (परेशानी की चरम सीमा पर): नहीं है यार। लगता है बस में छूट गया। कॉल करो उसपर ज़रा।
छोटू (नंबर लगाने के बाद): स्विच्ड ऑफ आ रहा है। लगता है किसी ने ले लिया होगा और ऑफ कर दिया होगा।
मोटू (झल्लाते हुए): कमीना कहीं का। कीड़ें परें उसे। वापस नहीं दे सकता था। (बेचारा एक फोन उठाने के कारण नरक जाने वाला था)
मोटू छोटू से (गुस्से में): सारी गलती तुम्हारी है।
छोटू (हैरान): मैंने क्या किया? मेरी क्या गलती?
मोटू (डांटते हुए): तुम्हारे साथ में आने का क्या मतलब? ध्यान नहीं रख सकते थे। तुम्हारी ही गलती है सारी।

भाइयों इसे ही दोस्ती कहते हैं। इस रिश्ते में आपका दोस्त पर इतना हक़ होता है कि अपनी गलती के लिए आप दोस्त को डांट सकते हैं।

इसके बाद मोटू के आँखों से मोटे मोटे आंसुओं कि धरा बहने लगी। दीदी को फोन किया बॉम्बे (फोन खो गया, पापा डांटेंगे)। दीदी ने दिलासा किया कि नहीं डांटेंगे, वो नया फोन दिला देंगी। तब जाकर माहोल में थोड़ी शांति आई।
छोटू ने अपना मोबाइल मोटू को दिया घर के सफ़र के लिए और मोटू को रवाना किया।

मोटू के मोबाइलों के कई किस्से हैं। कई मोबाइल आये और कई गए। चड्डियों कि तरह मोबाइल बदलते हैं। आगे और किस्से सुनेंगे महान मोटू के।

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