Monday, 19 April 2010

राजदूत की टंकी पर

धरम पा जी सच ही कहते थे।
"शानदार सवारी..... एक जानदार सवारी।"

हमारे परिवार की पहली गाड़ी, राजदूत। मेडिकल कॉलेज से निकलने के बाद जब पिताजी ने प्राइवेट प्रैक्टिस शुरू की तो हमारे घर आया महाराणा प्रताप का चेतक, हमारा राजदूत। हमारे छोटे से परिवार की बड़ी गाड़ी। हम सिर्फ चार लोग हैं परिवार में। पिताजी, माताजी, बड़ा भाई और मैं।

सेटिंग कुछ यूँ होती थी।
आगे पिताजी, पीछे माताजी। उनके बीच में हमारे बड़े भाई साहब।
और सबसे आगे, राजदूत की टंकी पर महाराणा प्रताप। जी बिलकुल, नाचीज़ अपने बारे में ही बात कर रहा है।

आज भी याद है हवा का वो बालों में सरसराना। बार बार पिताजी मुझे आगे की ओर धकेलते और बार बार मैं फिसलकर पीछे आ जाता। सच में धरमजी, शानदार सवारी, एक जानदार सवारी।

कुछ समय बाद हम शहर में रहने चले गए। और साथ में आया हमारा चेतक।
ज़माना बदला। स्टेज पर स्कूटर की एंट्री हुई।

मेरे चाचाजी की लड़की मेरी ही उम्र की है। चाचाजी नयी स्कूटर लाए घर पर।
उस समय बच्चे स्कूटर में आगे खड़ा हुआ करते थे। ये बड़ा ही उत्साहित और उत्तेजित करने वाला नज़ारा था (बाकी बच्चों के लिए)। ऐसा लगता था जैसे आप सुपरमैन की तरह उड़े जा रहे हैं।
और आप तो जानते ही हैं, खरबूजा खरबूजे को देख कर रंग बदलता है। बस अपनी बहन के इस मज़े को देख कर मैंने भी रंग बदला। मेरी स्कूटर की ज़िद शुरू।

अब पिताजी की कमाई भी पहले से बेहतर हो गयी थी। सो वो भी सकेंड हैण्ड मोटर साइकिल से आगे बढ़ना चाहते थे। सो, मेरी जिद और परिवार की इक्षा ले आई हमारे घर एक नए 'एल ऍम एल वेस्पा' को। और बिक गयी हमारी राजदूत।
जी हाँ, सुपरमैन बनने की लालसा में मैंने महाराणा प्रताप को त्याग दिया।

काफी दिनों तक उड़ने का मज़ा लिया स्कूटर पर। लेकिन लम्बी यात्राओं पर आगे खड़े खड़े पैर दुखते थे। 'चेतक' की टंकी नहीं थी मुझे बचाने को।
तब मेरे बचाव के लिए आता था मेरा सुपरमैन, मेरे असल महाराणा प्रताप। मेरे पिताजी।
जी, तब मेरे पिताजी मुझे अपने पैरों पर बैठा लेते थे। चाहे उन्हें लाख मुश्किल होती चलाने मैं लेकिन मुझे (और परिवार को) आराम देना हमेशा उनकी प्राथमिकता रही।

जी वो थे दिन जब पिताजी ही थे सुपरमैन, वही थे महाराणा प्रताप और वही थे राजदूत। शानदार और जानदार (आज भी हैं)।

1 comment:

  1. nice





    shekhar kumawat

    http://kavyawani.blogspot.com/

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