Friday, 28 May 2010

दो बैलों की कहानी

पुणे के आस पास कहीं.....
एक्सप्रेस वे पर होकर हमारी गाड़ी चली जा रही थी।
'अरे अरे सर हम आगे बढ़ गए। पिछले कट से ही हमें मुड़ना था।'
रोंग साइड से हम वापस लौटे, धीरे धीरे। दोनों ओर से फराटे से आती गाडियाँ।

कुछ किसान अपने मवेशियों को लेकर सड़क पार करते हुए।
उनका बैल बीच सड़क कर फस गया। दोनों तरफ से तेज़ी से आती गाड़ियों को देखकर और उनकी रोशनी से चोंधिया कर परेशान एक बैल। कभी इधर भागता, कभी उधर।
एक ट्रक वाले ने हॉर्न बाजा कर उसे अपने सामने से हटाया।

अचानक मन से आवाज़ निकली (काली ज़बान, काला मन):
'ये तो मरेगा आज।'

बैल अपने मालिक की ओर बढ़ा, सड़क पार करते हुए।

तभी सामने से फर्राटे से आती हुई सफ़ेद गाड़ी। और भड़ामम्मम्मम्म !!!!!!!
बैल हवा में।
जी हाँ गाड़ी की गति इतनी थी की उसने इतने भारी बैल को हवा में उड़ा दिया।
बैल को उसके सर के बीचों बीच टक्कर लगी और वो हवा में ४-५ फीट उछल कर वापस ज़मीन पर गिरा, धराम्म्मम्म।

सफ़ेद बैल (गाड़ी) आगे बढ़ गयी। काला बैल मुश्किल से उठा और लड़खराते हुए अपने मालिक की ओर बढ़ा। सर से टपकती हुई खून की धरा।

हम अपनी गाड़ी से आगे बढे। आगे सड़क के किनारे सफेद बैल (गाड़ी) धीरे धीरे आगे बढ़ रही थी। सर फूटा हुआ और पानी की एक धरा बह रही थी नीचे से।

दोनों बैलों को भारी नुक्सान हुआ। पर शायद उनमें से एक चाँद रूपये खर्च करने से तंदरुस्त हो जाएगा और शायद दुसरे की जान चली जायेगी। एक बैल नासमझ था, घबराया हुआ। दूसरा बैल अपनी मस्ती में तेज़ी से चला जा रहा था किसी और की फ़िक्र किये बिना, समझदार होने के बावजूद।

न जाने गलती किसकी थी।


Saturday, 15 May 2010

कुत्ता किसको बोला बे?

अभी कुछ दिन पहले एक बड़ी पार्टी के एक नेता ने कुछ दूसरी पार्टी के नेताओं को कुत्ता कह दिया।
इस बात पर बहुत बवाल हुआ। इसे अभद्रता का प्रदर्शन माना गया। कई नेताओं ने इस बात पर काफी दुख भी ज़ाहिर किया।

बात दरअसल बहुत दुख की है। किसी आदमी को कुत्ता कह दिया। वो भी बड़े इज़्ज़तदार नेता को। बड़े दुख की बात है।

क्या उनकी कोई इज्ज़त नहीं है? क्या उन्हें दुख नहीं होता? बेचारे कुछ कहते नहीं हैं तो आप उन्हें कुछ भी कह देंगे?
जी हाँ मैं उन्ही की बात कर रहा हूँ।
कुत्तों को।
बेचारों को नेता से कंपेयर कर दिया।
क्या कहा आपने? फर्क क्या है?

बेचारा कुत्ता इतना ईमानदार। आज तक किसी ईमानदार नेता के बारे में सुना है आपने? न तो देश के लिए ईमानदारी, न तो पार्टी के लिए ईमानदारी और न ही जनता के लिए। तो कैसे हुए कुत्ते और नेता एक जैसे।

कुत्ता जिस घर में रहता है उसकी रक्षा करता है। सुना है आपने की कोई नेता देश की रक्षा करता है। नेता देश की रक्षा नहीं भक्षा करता है। पता नहीं कैसे कुत्ते हो गए वो?

कुत्ते के मालिक पर अगर कोई ख़तरा हो तो वो उसे काटने दौड़ता हैं। नेता अपने मालिक (जनता) को काटने दौड़ता है। कैसे कहते हैं आप नेता को कुत्ता?

गजब करते हैं आप लोग। बेचारे कुत्ते की इज्ज़त का कोई ख़याल ही नहीं है। किसी कुत्ते ने इन बातों को सुन लिया (खुदा न खासते) तो उस पर क्या बीतेगी?

और नेताजी का भी गुस्सा करना लाज़मी है। अगर नेता का व्यक्तित्व कुत्ते जैसा हो गया तो उसे कौन सी पार्टी लेगी, कैसे बनेगा वो बड़ा नेता। ये लक्षण उसके लिए प्रतिकूल हैं।

कृपया इस प्रकार के प्रतिकूल प्रचार से बचें। नेता और कुत्ता दोनों।

Saturday, 8 May 2010

अगुआ

उत्तर भारत के एक छोटे से शहर में गर्मी की एक दोपहर। डिस्ट्रिक्ट कोर्ट का एक कोना।
याद रखें कि अगर आप कोर्ट के प्रांगण मैं बैठे हुए हैं तो इत्मीनान से बैठिए। वहाँ सब कुछ अपनी ही गति से होता है। न आप उसे तेज़ कर सकते हैं और न धीमा।

खैर, उस कोने मैं भी कुछ लोग इत्मीनान से बैठे हुए थे। संदीप अपने कंपनी के काम से वकील साहब से मिलने आया था। आस पास वकील साहब के और हाकीम (क्लाएंट) बैठे हुए थे।
संदीप वकील साहब से: "जी इसका तो बिल बनवाना पड़ेगा, उसके बिना दिक्कत हो जाएगा।"

एक बुज़ुर्ग धोती कुर्ते और चन्दन टीके से सज़े हुए।
"बिल का क्या कीजिएगा? यहाँ बिल थोड़े मिलता है।"
संदीप
"क्या करें? कंपनी बिल के बिना थोड़े मानता है। मजबूरी है।"
बुज़ुर्ग
"अच्छा अच्छा तो कंपनी का काम है।""कहाँ काम करते हैं आप?"
संदीप
"जी दिल्ली का एक कंपनी है, यहाँ फैक्टरी लगाना चाहता है।"
बुज़ुर्ग
"अच्छा अच्छा। बहुत बढ़िया बात है। वैसे आप रहने वाले कहाँ के हैं?"
संदीप
"जी मुंगेर जिला"
बुज़ुर्ग
"तो यहाँ रहते हैं कंपनी के काम से?"
संदीप
"जी नई, दिल्ली मैं ही रहते हैं। यहाँ आते जाते रहते हैं।
बुज़ुर्ग
"ओ!! तो वहाँ तो बढ़िया तनख्वाह मिलता होगा।"
संदीप
"जी बस रहने खाने लायक हो जाता है।"
बुज़ुर्ग
"अकेले रहने खाने लायक या परिवार के साथ रहने खाने लायक।"
संदीप
"जी अभी तो अकेले ही हैं।"
बुज़ुर्ग
"बस बस........ यही तो जानना चाहते थे हम।"
"वैसे कौन से गाँव के रहने वाले हैं आप?"
संदीप
"जी रामगढ़।"
बुज़ुर्ग
"रामगढ़...... वहां के कोई नेता भी हैं शायद......"
संदीप
"जी रामजीवन बाबू हैं।"
बुज़ुर्ग
"हाँ हाँ वही।"
संदीप
"वैसे मुंगेर के बेदा बाबू (वेद प्रकाश सिंह) आज कल आपके पास नवादा से ऍम पी हैं।""हमारे मोहल्ले में ही घर हैं उनका।"
बुज़ुर्ग
"अच्छा अच्छा बेदा बाबू। तो आपका उनसे कुछ .........."
संदीप
"जी नहीं नहीं। हमारा कोई रिलेसन नहीं हैं उनसे...........बस हमारी ही बिरादरी से आते हैं वो।"
बुज़ुर्ग
"बस बस यही तो जानना था हमको।"
"बगल में बैठे सज्जन से: हें हें हें.......... आज कल के ज़माना में सीधा सीधा ऐसा सवाल नहीं पूछ सकते हैं न।"

"बस हमको जो जानकारी चाहिए वो मिल गया। वैसे भी हम हर साल कम से कम १० शादी तो करवाते ही हैं।"
"आप अपना फोन नंबर दे दीजिये ज़रा..........."

जी ये थे एक प्रोफेसनल अगुआ। आपको बता दूँ अगुआ लोग जो होते हैं वो बहुत भलाई का काम करते हैं, बहुत पुण्य प्राप्त करते हैं। एक्चुअली अगुआ वो होता है जो लड़की या लड़के का रिश्ता (जेनरली लड़की का) रिश्ता ले के दूसरी पार्टी के पास जाते हैं और दोनों पार्टियों के बीच सामंजस्य का माहोल बनाते हैं। वो दोनों के बीच एडजस्टमेंट करवाते हैं और रिश्ते बनवाते हैं। जी रिश्ते आसमान में नहीं बनते, अगुआ लोगों के यहाँ बनते हैं।

Tuesday, 4 May 2010

बेटी और बाछा

लेख शुरू करने से पहले जो लोग नहीं जानते उन्हें बता दूँ की 'बाछा' गाय के पुत्र को कहते हैं और बाछी पुत्री को।

भकोरन कुछ दिनों से काम पर नहीं आ रहा है।
क्या बात हो गई?
उसकी गाय को बच्चा होने वाला है। वो ज़रा देख रेख में लगा हुआ है।

कुछ दिनों के पश्चात.......

की भकोरन? गाय बिआय गेलो? (क्यों भकोरन गाय को बच्चा हो गया?)
उदास भकोरन: जी। भै गेलै।
की भेलो, बाछा की बाछी।
'बाछा' भेलै।
तब त घटे न लैग गेलो तोरा।
जी घटे छै।

जी हाँ इंसान की बेटी और गाय के बाछे का एक ही हश्र होता है।
आम समझ कहती है की बाछे और बेटी दोनों पर साधन खर्च करने पड़ते हैं। और दोनों ही वापस कुछ नहीं दे पाते हैं, कुछ ले कर ही जाते हैं। न बाछा दूध दे पाता है और न बेटी सहारा। गाय और बेटा दोनों घर का पोषण करते हैं और कमाई भी।

लेकिन आपको बता दूँ की बाछे की हमेशा ऐसी हालत नहीं थी। एक समय था जब लोग बाछे को ज्यादा तवज्जो देते थे। वो समय था जब खेती में बैलों का इस्तेमाल होता था। बाछा बड़ा होकर खेत संभालता। लेकिन अब तो 'कल युग' आ गया है (कल-कारखाने का युग)। बैलों का इस्तेमाल ख़त्म हो चुका है और कल (मशीन) यानी ट्रैक्टर का इस्तेमाल शुरू हो गया है। अब बाछे की क्या आवश्यकता?

आज कल वैसे ज़माना बदल रहा है। ऐसा आभास हो रहा है की अब बेटियां भी बाछे की तरह नहीं बल्कि गाय की तरह होती जा रही हैं। कुछ लोग कहते हैं की बेटे तो धोखेबाज़ होते हैं, जिंदगी भर पालो पोसो और फिर धोखा दे देते हैं। बेटियों में एक अपनेपन की भावना होती है। जिंदगी भर जितना बन पड़ता है ज़रूर करती हैं। बेटी ही अपनी होती है बेटा नहीं।
हालत ऐसी हो गई है कि अगर किसी एक का बेटा उसके लिए थोडा कुछ कर दे तो उसे तुरंत 'श्रवणकुमार' की उपाधि दे दी जाती है। जैसे की कुछ अजूबा हो गया हो।

तो कल युग में कई चीज़ें बदल रही हैं। बेटियां अब बाछा नहीं बाछी (जो आगे चल के गाय बनेगी) होती जा रही हैं।

जय हो कल युग की। जय हो बेटियों की।

Sunday, 2 May 2010

भारत बंद

आपने भी सुना होगा, देखा होगा या महसूस किया होगा। कुछ दिनों पहले भारत बंद था।
ये मत समझिएगा की भारत बंद का मतलब भारत दूसरों के लिए बंद था।

पकिस्तान से आने वाले आतंकियों के लिए भारत बंद नहीं था। वो अपने च्वाइस के रास्ते से भारत आ सकते हैं (चाहे कश्मीर के रास्ते या समुन्दर का आनंद लेते हुए मुंबई के रास्ते)। और अगर वो पश्चिमी दुनिया से वास्ता रखते हैं तो डेविड हेडली की तरह हवाई यात्रा करके भी आ रकते हैं। भारत नेपाल के नक्सलियों के लिए हथियार लाने वालों के लिए भी बंद नहीं था। न ही भारत बंगलादेश से आने वाले अनाधिकृत 'भारतवासियों' के लिए बंद था।
इन सबके लिए भारत बंद करने की ताकत न अलग थलग विपक्ष में है, न संयुक्त विपक्ष में है और न सरकार में।

भारत बंद तो सिर्फ भारतवासियों के लिए था। बढती कीमतों के विरोध में। मकसद साफ़ था, भारत बंद कर दो, आम आदमी न खरीददारी कर पायेगा और न ही उसपर बढती कीमतों का असर होगा। अदभुद आईडिया।

खैर में उत्तर भारत के एक राज्य के एक शहर से उसकी राजधानी की ओर जा रहा था।
सामने सड़क पर दो बसों को ऐसे लगाया गया है कि कोई गाड़ी न निकल सके। कुछ गुंडे जैसे लोग धोती कुरता पहने एक बेंच लगा कर सड़क पर वहीं बैठे हैं और आती जाती गाड़ियों को तोड़ने फोड़ने कि धमकी दे रहे हैं।
हम भी गाड़ी साइड लगा कर खड़े हो गए।

बगल में एक दुकान के बाहर ठंढी छाया में इस उपद्रव के नेता (प्रधान जी) बैठे हुए हैं। वो सड़क पर नहीं उतर रहे (धुप काफी है)। उनके चेले सड़क पर उपद्रव मचा रहे हैं। बढ़िया चल रहा है भारत बंद।

कुछ देर में एक एम्बुलेंस आई। उसे भी रोका गया। पूछ ताछ की गयी। कुछ काम से जा रहे हो तो जाओ वरना यहीं रुकना पड़ेगा। हाँ भाई एम्बुलेंस की क्या औकाद है। देश से ऊपर थोड़े है। देश की भलाई के लिए भारत बंद है। खैर एम्बुलेंस को १० मिनट में छोड़ दिया गया (१-२ मिनट की देरी से जीवन मरण का फैसला होता है वैसे)।

कुछ समय पश्चात स्तानीय थाना अध्यक्ष आए। बंद खुलने की कुछ आशा बंधी। जा कर बैठे प्रधान जी के साथ। बात चीत का दौड़ चल रहा है। चाय ठंढा मंगवाया गया। एक घंटा और गुज़रा।

दूर से एक मोटर साइकिल पर बैठा एक आदमी आता दिखा जिसके हाथ में एक विडियो कैमरा था। अब असल माजरा समझ आया।

कैमरा मेन आकर सड़क पर खड़ा हुआ।
'प्रधान जी, आइये।"
प्रधान जी आए सड़क पर। साथ में २०-२५ चेले खड़े हुए। गाड़ी से एक दो झंडे निकाले गए।
सड़क के किनारे थानाद्यक्ष महोदय भी अपने हवाल्दारों के साथ खड़े हो गए।
कैमरा चालू हुआ।
नारेबाजी।
'भारत बंद सफल हुआ।'
'कीमतें घटाओ।'

२ मिनट के बाद कैमरा बंद हुआ। भारत बंद सफल रहा। और प्रधान जी अपने घर की ओर चले।
अब हवाल्दारों ने अपनी लाठियां घुमाई। सड़क पर से गाड़ियाँ हटवाई। भारत को खुलवाया (जो पहले बंद था)।

प्रधान जी ने अपना फ़र्ज़ निभाया। थानाध्यक्ष महोदय ने अपना काम मुस्तैदी से किया। दोनों के कामों की रेकॉर्डिंग हो गयी कैमरे में।

आम जनता के हक़ के रखवाले अभी जिन्दा हैं। चिंता की कोई आवश्यकता नहीं है।
चार घंटे आरामही करके, तेल बचा के, महंगाई से बच के हम भी आगे बढे।

धन्यवाद नेता। धन्यवाद अभिनेता।