Sunday, 2 May 2010

भारत बंद

आपने भी सुना होगा, देखा होगा या महसूस किया होगा। कुछ दिनों पहले भारत बंद था।
ये मत समझिएगा की भारत बंद का मतलब भारत दूसरों के लिए बंद था।

पकिस्तान से आने वाले आतंकियों के लिए भारत बंद नहीं था। वो अपने च्वाइस के रास्ते से भारत आ सकते हैं (चाहे कश्मीर के रास्ते या समुन्दर का आनंद लेते हुए मुंबई के रास्ते)। और अगर वो पश्चिमी दुनिया से वास्ता रखते हैं तो डेविड हेडली की तरह हवाई यात्रा करके भी आ रकते हैं। भारत नेपाल के नक्सलियों के लिए हथियार लाने वालों के लिए भी बंद नहीं था। न ही भारत बंगलादेश से आने वाले अनाधिकृत 'भारतवासियों' के लिए बंद था।
इन सबके लिए भारत बंद करने की ताकत न अलग थलग विपक्ष में है, न संयुक्त विपक्ष में है और न सरकार में।

भारत बंद तो सिर्फ भारतवासियों के लिए था। बढती कीमतों के विरोध में। मकसद साफ़ था, भारत बंद कर दो, आम आदमी न खरीददारी कर पायेगा और न ही उसपर बढती कीमतों का असर होगा। अदभुद आईडिया।

खैर में उत्तर भारत के एक राज्य के एक शहर से उसकी राजधानी की ओर जा रहा था।
सामने सड़क पर दो बसों को ऐसे लगाया गया है कि कोई गाड़ी न निकल सके। कुछ गुंडे जैसे लोग धोती कुरता पहने एक बेंच लगा कर सड़क पर वहीं बैठे हैं और आती जाती गाड़ियों को तोड़ने फोड़ने कि धमकी दे रहे हैं।
हम भी गाड़ी साइड लगा कर खड़े हो गए।

बगल में एक दुकान के बाहर ठंढी छाया में इस उपद्रव के नेता (प्रधान जी) बैठे हुए हैं। वो सड़क पर नहीं उतर रहे (धुप काफी है)। उनके चेले सड़क पर उपद्रव मचा रहे हैं। बढ़िया चल रहा है भारत बंद।

कुछ देर में एक एम्बुलेंस आई। उसे भी रोका गया। पूछ ताछ की गयी। कुछ काम से जा रहे हो तो जाओ वरना यहीं रुकना पड़ेगा। हाँ भाई एम्बुलेंस की क्या औकाद है। देश से ऊपर थोड़े है। देश की भलाई के लिए भारत बंद है। खैर एम्बुलेंस को १० मिनट में छोड़ दिया गया (१-२ मिनट की देरी से जीवन मरण का फैसला होता है वैसे)।

कुछ समय पश्चात स्तानीय थाना अध्यक्ष आए। बंद खुलने की कुछ आशा बंधी। जा कर बैठे प्रधान जी के साथ। बात चीत का दौड़ चल रहा है। चाय ठंढा मंगवाया गया। एक घंटा और गुज़रा।

दूर से एक मोटर साइकिल पर बैठा एक आदमी आता दिखा जिसके हाथ में एक विडियो कैमरा था। अब असल माजरा समझ आया।

कैमरा मेन आकर सड़क पर खड़ा हुआ।
'प्रधान जी, आइये।"
प्रधान जी आए सड़क पर। साथ में २०-२५ चेले खड़े हुए। गाड़ी से एक दो झंडे निकाले गए।
सड़क के किनारे थानाद्यक्ष महोदय भी अपने हवाल्दारों के साथ खड़े हो गए।
कैमरा चालू हुआ।
नारेबाजी।
'भारत बंद सफल हुआ।'
'कीमतें घटाओ।'

२ मिनट के बाद कैमरा बंद हुआ। भारत बंद सफल रहा। और प्रधान जी अपने घर की ओर चले।
अब हवाल्दारों ने अपनी लाठियां घुमाई। सड़क पर से गाड़ियाँ हटवाई। भारत को खुलवाया (जो पहले बंद था)।

प्रधान जी ने अपना फ़र्ज़ निभाया। थानाध्यक्ष महोदय ने अपना काम मुस्तैदी से किया। दोनों के कामों की रेकॉर्डिंग हो गयी कैमरे में।

आम जनता के हक़ के रखवाले अभी जिन्दा हैं। चिंता की कोई आवश्यकता नहीं है।
चार घंटे आरामही करके, तेल बचा के, महंगाई से बच के हम भी आगे बढे।

धन्यवाद नेता। धन्यवाद अभिनेता।

1 comment:

  1. हमारा धन्यवाद भी दे दिजियेगा दोनों को..नेता और अभिनेता को.

    ReplyDelete