Tuesday, 4 May 2010

बेटी और बाछा

लेख शुरू करने से पहले जो लोग नहीं जानते उन्हें बता दूँ की 'बाछा' गाय के पुत्र को कहते हैं और बाछी पुत्री को।

भकोरन कुछ दिनों से काम पर नहीं आ रहा है।
क्या बात हो गई?
उसकी गाय को बच्चा होने वाला है। वो ज़रा देख रेख में लगा हुआ है।

कुछ दिनों के पश्चात.......

की भकोरन? गाय बिआय गेलो? (क्यों भकोरन गाय को बच्चा हो गया?)
उदास भकोरन: जी। भै गेलै।
की भेलो, बाछा की बाछी।
'बाछा' भेलै।
तब त घटे न लैग गेलो तोरा।
जी घटे छै।

जी हाँ इंसान की बेटी और गाय के बाछे का एक ही हश्र होता है।
आम समझ कहती है की बाछे और बेटी दोनों पर साधन खर्च करने पड़ते हैं। और दोनों ही वापस कुछ नहीं दे पाते हैं, कुछ ले कर ही जाते हैं। न बाछा दूध दे पाता है और न बेटी सहारा। गाय और बेटा दोनों घर का पोषण करते हैं और कमाई भी।

लेकिन आपको बता दूँ की बाछे की हमेशा ऐसी हालत नहीं थी। एक समय था जब लोग बाछे को ज्यादा तवज्जो देते थे। वो समय था जब खेती में बैलों का इस्तेमाल होता था। बाछा बड़ा होकर खेत संभालता। लेकिन अब तो 'कल युग' आ गया है (कल-कारखाने का युग)। बैलों का इस्तेमाल ख़त्म हो चुका है और कल (मशीन) यानी ट्रैक्टर का इस्तेमाल शुरू हो गया है। अब बाछे की क्या आवश्यकता?

आज कल वैसे ज़माना बदल रहा है। ऐसा आभास हो रहा है की अब बेटियां भी बाछे की तरह नहीं बल्कि गाय की तरह होती जा रही हैं। कुछ लोग कहते हैं की बेटे तो धोखेबाज़ होते हैं, जिंदगी भर पालो पोसो और फिर धोखा दे देते हैं। बेटियों में एक अपनेपन की भावना होती है। जिंदगी भर जितना बन पड़ता है ज़रूर करती हैं। बेटी ही अपनी होती है बेटा नहीं।
हालत ऐसी हो गई है कि अगर किसी एक का बेटा उसके लिए थोडा कुछ कर दे तो उसे तुरंत 'श्रवणकुमार' की उपाधि दे दी जाती है। जैसे की कुछ अजूबा हो गया हो।

तो कल युग में कई चीज़ें बदल रही हैं। बेटियां अब बाछा नहीं बाछी (जो आगे चल के गाय बनेगी) होती जा रही हैं।

जय हो कल युग की। जय हो बेटियों की।

2 comments:

  1. Very Nicely written, aap itna sochte hia sir???
    Iska mujhe aaj hi pata chala:)

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