Saturday, 8 May 2010

अगुआ

उत्तर भारत के एक छोटे से शहर में गर्मी की एक दोपहर। डिस्ट्रिक्ट कोर्ट का एक कोना।
याद रखें कि अगर आप कोर्ट के प्रांगण मैं बैठे हुए हैं तो इत्मीनान से बैठिए। वहाँ सब कुछ अपनी ही गति से होता है। न आप उसे तेज़ कर सकते हैं और न धीमा।

खैर, उस कोने मैं भी कुछ लोग इत्मीनान से बैठे हुए थे। संदीप अपने कंपनी के काम से वकील साहब से मिलने आया था। आस पास वकील साहब के और हाकीम (क्लाएंट) बैठे हुए थे।
संदीप वकील साहब से: "जी इसका तो बिल बनवाना पड़ेगा, उसके बिना दिक्कत हो जाएगा।"

एक बुज़ुर्ग धोती कुर्ते और चन्दन टीके से सज़े हुए।
"बिल का क्या कीजिएगा? यहाँ बिल थोड़े मिलता है।"
संदीप
"क्या करें? कंपनी बिल के बिना थोड़े मानता है। मजबूरी है।"
बुज़ुर्ग
"अच्छा अच्छा तो कंपनी का काम है।""कहाँ काम करते हैं आप?"
संदीप
"जी दिल्ली का एक कंपनी है, यहाँ फैक्टरी लगाना चाहता है।"
बुज़ुर्ग
"अच्छा अच्छा। बहुत बढ़िया बात है। वैसे आप रहने वाले कहाँ के हैं?"
संदीप
"जी मुंगेर जिला"
बुज़ुर्ग
"तो यहाँ रहते हैं कंपनी के काम से?"
संदीप
"जी नई, दिल्ली मैं ही रहते हैं। यहाँ आते जाते रहते हैं।
बुज़ुर्ग
"ओ!! तो वहाँ तो बढ़िया तनख्वाह मिलता होगा।"
संदीप
"जी बस रहने खाने लायक हो जाता है।"
बुज़ुर्ग
"अकेले रहने खाने लायक या परिवार के साथ रहने खाने लायक।"
संदीप
"जी अभी तो अकेले ही हैं।"
बुज़ुर्ग
"बस बस........ यही तो जानना चाहते थे हम।"
"वैसे कौन से गाँव के रहने वाले हैं आप?"
संदीप
"जी रामगढ़।"
बुज़ुर्ग
"रामगढ़...... वहां के कोई नेता भी हैं शायद......"
संदीप
"जी रामजीवन बाबू हैं।"
बुज़ुर्ग
"हाँ हाँ वही।"
संदीप
"वैसे मुंगेर के बेदा बाबू (वेद प्रकाश सिंह) आज कल आपके पास नवादा से ऍम पी हैं।""हमारे मोहल्ले में ही घर हैं उनका।"
बुज़ुर्ग
"अच्छा अच्छा बेदा बाबू। तो आपका उनसे कुछ .........."
संदीप
"जी नहीं नहीं। हमारा कोई रिलेसन नहीं हैं उनसे...........बस हमारी ही बिरादरी से आते हैं वो।"
बुज़ुर्ग
"बस बस यही तो जानना था हमको।"
"बगल में बैठे सज्जन से: हें हें हें.......... आज कल के ज़माना में सीधा सीधा ऐसा सवाल नहीं पूछ सकते हैं न।"

"बस हमको जो जानकारी चाहिए वो मिल गया। वैसे भी हम हर साल कम से कम १० शादी तो करवाते ही हैं।"
"आप अपना फोन नंबर दे दीजिये ज़रा..........."

जी ये थे एक प्रोफेसनल अगुआ। आपको बता दूँ अगुआ लोग जो होते हैं वो बहुत भलाई का काम करते हैं, बहुत पुण्य प्राप्त करते हैं। एक्चुअली अगुआ वो होता है जो लड़की या लड़के का रिश्ता (जेनरली लड़की का) रिश्ता ले के दूसरी पार्टी के पास जाते हैं और दोनों पार्टियों के बीच सामंजस्य का माहोल बनाते हैं। वो दोनों के बीच एडजस्टमेंट करवाते हैं और रिश्ते बनवाते हैं। जी रिश्ते आसमान में नहीं बनते, अगुआ लोगों के यहाँ बनते हैं।

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