Tuesday, 8 June 2010

बाप का होटल

एक ज़माने में जब हम स्कूल में हुआ करते थे, तब हमारे एक महान शिक्षक थे। उस समय उनकी महानता का एहसास नहीं था हमें। अब महान हुए हैं वो हमारी नज़र में।

खैर वो अक्सर हमें डांट के कहा करते थे, 'बेटा अभी तो बाप दे होटल में ऐश कर रहे हो, जब बात खुद पर आएगी तब आंटे दाल का भाव पता लगेगा'।

खैर तब हमें बहुत गुस्सा आता था उनपर। ये कैसी भाषा का इस्तेमाल कर रहे हैं? क्या बेकार बात कर रहे हैं ये? बौरा गए हैं। साठ के हुए नहीं हैं लेकिन सठिया गए हैं।
आज उनकी बात की वैल्यू पता लगी है। शुक्रिया कारपोरेट दुनिया। मेरे महान शिक्षक शिक्षक की महानता और बढ़ा दी।
देखें 'बाप के होटल और 'कारपोरेट दुनिया' की समानता।

बाप का होटल:
पापा जेब खर्च बढ़ा दो काफी दिन हो गए।
पापा,"बेटा अभी जेब थोड़ी तंग है। अगली बार क्लास में फर्स्ट आये तो पक्का बढ़ा दूंगा"।
नहीं नहीं पापा, ये सही नहीं है, प्लीज़ प्लीज़।
पापा,"ठीक है चलो बढ़ा देते हैं।"
ख़ुशी ख़ुशी, उछालते कूदते, फ्री के पैसे लेकर चले......

कारपोरेट वर्ल्ड:
मालिक, काफी समय हो गया, तनख्वाह बढ़ा दो।
मालिक,"नहीं नहीं अभी मार्केट डाउन है।"
प्लीज़ प्लेज, मैंने बहुत अच्छा परफोर्म किया है (क्लास में फर्स्ट आया)।
मालिक,"चलो बहुत शाबाशी तुम्हें, लेकिन और बढ़िया काम करो फिर सोचेंगे........
अपना सा मुह ले कर चले, अपने मेहनत की कमाई भी नहीं मिली।

बाप का होटल:
मम्मी, मुझे कद्दू अच्छा नहीं लगता है, नहीं खाना खाऊँगा।
मम्मी," अरे बेटा में तुम्हारे लिए कुछ और बना देती हूँ। खाना खा लो।"

कारपोरेट वर्ल्ड:
क्या आज लंच में कद्दू है, और कुछ नहीं बनाया है।
खाना है तो खाओ, नहीं तो भाड़ में जाओ।

बाप का होटल:
पापा, इस बार छुट्टी में शिमला घुमाने ले चलो।
पापा,"बेटा अगली बार चलेंगे।"
नहीं नहीं पापा, प्लीज़ प्लीज़
पापा,"ठीक है चलते हैं।"

कारपोरेट वर्ल्ड:
मालिक, छुट्टी दे दीजिये, शिमला जाना है।
मालिक,"अगली बार चले जाना।"
नहीं नहीं मालिक, प्लीज़ प्लीज़।
मालिक," अच्छा जाओ, छुट्टी दी...... हमेशा के लिए।"

इतना अच्छा था वो 'बाप का होटल', तब एहसास नहीं हुआ, अब एहसास कर के भी क्या कर लेंगे?

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