Sunday, 4 July 2010

बंगाल का जादू

अरे अरे! वहां भीड़ किस बात की लगी हुई है?
सर, वो एक ट्रक आया था सामन लेने। उसका ड्राईवर कुछ पैसे ले के आया था, माल खरीदने के लिए। सीट के नीचे रख के गया था, झाड़ा (संडास) करने। वापस आया त पैसे नै था।
उसी का झगडा चल रहा है। के लिया पते नै चल रहा है।
कोनो मजदूर ले लिया होगा।

तो फिर अब क्या करेंगे वो लोग? कैसे पैसा मिलेगा उसका।

अभी ड्राईवर मालिक को फोन किया है। उ बंगाल में है। ओझं से कोई मंतर बताया है। आ कहा है की जेतना लोग है उहाँ, ओतना लकड़ी ले ले एके साइज़ का। उ में से एक क आधा तोड़ दे।
बिना देख सब लोग को एक एक लकड़ी लेना है। मंतर पढ़ल लकड़ी सब है, ता जेकरा टुटलका लकड़ी मिलेगा, उहे होगा चोर। इ है सर बंगाल क जादू।

तो किया क्या ये जादू?

जी सर अभी सब इंतजाम कर क आ मंतर मारा है लकरी सब पे। सब लोग लकड़ी लेने के लिए तयारे है लेकिन ए गो मजदूर है जे लकड़ी उठाबे से मन कर रहा है।

तो फिर उसके मन में खोट है? वही है क्या चोर?

जी सरकार, ऐसने बात होगा। उहे चोराया होगा। इहे लिए नै लै के चाह रहा है लकड़ी।

जी साहब, यही है बंगाल का जादू। जो पकड़ता है चोरों को........

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