Thursday, 23 September 2010

रानी लक्ष्मी बाई की वापसी

दिल्ली में डेंगू का प्रकोप ज़ोरों से फैला हुआ है। अचानक एक मित्र के पिता की तबियत खराब हो गयी।

खून की ज़रुरत। वो भी एक मुश्किल ब्लड ग्रुप। कम लोगों में पाया जाने वाला।
खबर पहुची यहाँ तक। हम तो मजबूर हैं। हमारा है नहीं वो ब्लड ग्रुप। खैर सोचा जल्दी से और लोगों में खबर फैलाएं। कोई भला आदमी मिल जाए। ऑफिस में जितने लोग हैं सबको बता दिया।

जवाब आया। "मेरा है ब्लड ग्रुप"।
थोड़ी राहत मिली। तीन लोग चाहिए थे। एक हॉस्पिटल में मौजूद है, एक यहाँ मिल गया।

एक बार और इ मेल की घंटी बजी। 'मेरा भी ब्लड ग्रुप वही है।'
पता नहीं बांछें होती कहाँ हैं। पर जहाँ भी होती हैं वो खिल गयी।

बस फिर क्या था? इन धुरंधरों को लेकर चले हम।
आपको ये बता दूँ की ये कोई नॉर्मल रक्त दान नहीं था। प्लेटलेट चाहिए थे। खून से प्लेटलेट निकालने की प्रक्रिया लम्बी होती है और आम रक्तदान से ज्यादा देर चलती है।

खैर, पहुचे हम हॉस्पिटल एक घंटे की ट्राफिक में चिल्ल पों के बाद।
थोड़ी मेहनत के बाद ढूंढ लिया ब्लड बैंक।

मित्र को थोडा ढाढस बंधाया। अपने साथियों को रक्तदान के लिए आगे बढ़ाया।
ब्लड बैंक मेनेजर: 'नहीं नहीं ये लोग नहीं कर सकते दान'। 'अंडर वेट' भी हैं।
अरे अरे, ऐसा न कीजिये, दान ले लीजिये।
अच्छा, आपलोग अपना भार नापें। फिर देखते हैं।
४५ के जी
५२ के जी

दोनों अंडर वेट। नहीं कर सकते रक्त दान।
खैर कोई बात नहीं। दो और लोग मिल गए रक्तदान के लिए। खतरा अभी ताल जाएगा।

हमारे धुरंधर रक्तदान न कर पाए लेकिन मानवता के तहत बिना कुछ कहे, बिना कुछ सुने दान करने आये। किसी ऐसे आदमी के लिए जिन्हें वो जानते भी नहीं। न दर्द के बारे में सोचा न और किसी खतरे के बारे में।

ऐसा सब नहीं कर सकते। ऐसा वो कर सकते हैं जिनका ह्रदय कोमल हो, और मज़बूत भी. मानवता के लिए धड़कता हो।
हमारा सन्देश कई लोगों के पास गया, जिनमें से कई इसी ब्लड ग्रुप के होंगे लेकिन आगे आये ये।
ये है आज की भारतीय नारी। जी, हमारी धुरंधर थी दो नारी जिनके साथ था मैं अनाड़ी। जी, भारतीय नारी, जो एक ही साथ कोमल और कठोर हो सकती है।
यही है नया रूप झांसी की रानी का। वो रानी जो अपने कोमल ह्रदय के कारण अपने बच्चे को अपनी पीठ से बाँध कर चली थी और जिसने अपने कठोर ह्रदय से अंग्रेजों का डट कर मुकाबला किया था।

ये नारियाँ भले ही शारीरिक रूप से कमज़ोर हों, लेकिन मानसिक रूप से सशक्त हैं। भले ही ये अंडर वेट हों लेकिन बड़े ह्रदय वाली हैं।
इन्होने जो किया उसके लिए इन्हें तहे दिल से धन्यवाद करना चाहता हूँ और बस इतना कहना चाहता हूँ कि

भारतीय नारी, तुझे सलाम ...........

Sunday, 12 September 2010

पटवारी एक अजीब सा जीव है.....

मुझे पता नहीं था कि पटवारी नाम कि भी कोई चीज़ होती है। हमारे इलाके में न तो तहसील होती है, न तहसीलदार, न पटवारी। जो जब मैं पहली बार पटवारी के इलाके में गया तो पता चला कि आखिर ये कौन है और क्या चीज़ है।

पटवारी अपने पटवार सर्कल का न सिर्फ ज़मीन जाय्दात का हिसाब रखता है बल्कि वहां के छोटे मोटे झगडे, झंझट और बाकी ला एंड आर्डर को भी देखता है। वो लोगों के जनम (कभी कभी मरे लोगों के) को भी प्रमाणित करता है और उनकी मृत्यु (कभी कभी जिन्दा लोगों के) को भी।

खैर जब पहली बार में पटवारियों के चक्कर में पड़ा तो काफी हैरत हुई उनके काम को देख कर। वेराइटी वेराइटी के सैम्पल हैं। पेश हैं उनमें से कुछ:

कन्सल्तैंत (मखान लगाते हुए): पटवारी साब आप लोगों को इतने तरह का काम करना पड़ता है और किसी तरह कि कोई मदद नहीं है, ये तो बड़ी गलत बात है।
पटवारी: गलत तो है ही साब। क्या करें? पटवारी एक अजीब सा जीव है, वो कुछ भी कर सकता है।
एक बार, काफी समय पहले, जब ये मोबाइल और फोन नहीं हुआ करते थे। उस समय वो जो होना है न पुलिस स्टेशन पर.........
कन्सल्तंत: रेडियो ट्रांसमीटर
पटवारी: हाँ हाँ वही। उस समय उसी से ख़बरें आती थी। जिले से तहसील के थाने, वहां से तहसीलदार के पास और फिर पटवारी के पास।
तो एक जिले के जिलाध्यक्ष (कलक्टर) ने कहा कि, जिले में जितने भी 'मंदिर' हैं, उनकी गिनती कर के बताई जाए। ट्रांसमीटर से खबर गयी पुलिस स्टेशन और अंततः पटवारियों को बता दिया गया।
करीब १० दिन बाद कलक्टर के पास एक लिस्ट पहुँच गयी।
'जिले में 'बंदरों' कि संख्या'

दरअसल, ट्रांसमीटर में आवाज़ सही से ना आने के कारण, थाने वालों ने 'मंदिरों' को 'बंदरों' सुना और बस प्रक्रिया शुरू हो गई। जिलाध्यक्ष ने भी हैरानी से पूछा कि आखिर बंदरों को गिना कैसे?

कन्सल्तंत: कैसे गिना आखिर?
पटवारी: अरे साब ये मत पूछो कैसे गिना? पटवारी एक ऐसा जीव है जो सब कुछ कर सकता है।

Sunday, 5 September 2010

स्कूटी वाली रानी - २

आपको याद हो शायद, कुछ माह पहले मैंने स्कूटी वाली रानी की चर्चा की थी। जी वही स्कूटी वाली रानी जिनको मैंने अपने 'पक्के मर्द' मोटर साइकिल से पछाड़ने की बड़ी कोशिश की थी परन्तु बारम बार वो मेरे बगल से ज़ूउउउउउउउउउउउउउम कर के निकल जाती थी। उस वक्त ये विचार कई लोगों ने व्यक्त किया था की आज देश में झाँसी की रानियों की संख्या बढती जा रही है।

जी तो वही विचार मेरे मस्तिस्क में कौंध रहा था की उस दिन अचानक 'स्कूटी वाली रानी- २' से मुलाक़ात हुई। हमारे ऑफिस के बाहर खुली पार्किंग है मोटर साइकिल के लिए (जैसा की गुडगाँव के हर शानदार ऑफिस के बहार है)। वहीँ मैं रोज़ ऑफिस आते हुए और कभी अभी ऑफिस से जाते हुए अपने 'पक्की मर्द' के पास लगी एक अदना स्कूटी को देख कर मंद मंद मुस्काता था। लेकिन साथ ही साथ उस 'स्कूटी वाली रानी- १' को याद कर कर के सकते में भी आजाता था। लेकिन फिर सोचता ' हर लड़की में वो दम कहाँ।' 'हर लड़की स्कूटी वाली रानी थोड़े बन जायेगी'।

खैर, उस दिन जब ऑफिस से निकला तो उस देखा उस 'अदना स्कूटी' की मालकिन स्कूटी निकाल रही थी। में भी अपनी 'पक्की मर्द' ले कर घर की ओर निकल रहा था। खैर जो मैं करने की हिमात नहीं करता वो किसी लड़की कर पाए इसकी उम्मीद नहीं रखता (अहम्)। खैर मैंने देखा स्कूटी और रानी दोनों को उसी ओर जाना था जिस ओर मैं जाता हूँ। परन्तु जिस दिशा में जाने की आवश्यकता है उसके लिए थोड़ी दूर आगे से जाके यू-टार्न लेना पड़ता है। यही करता हूँ में रोज़।

उस दिन उस झांसी की रानी को देख कर में दांग रह गया। उसने अपनी स्कूटी के कान मरोरे और ट्राफिक से नज़रें लड़ाते उलटी दिशा में चल पड़ी। यू-टार्न लेने की ज़हमत नहीं की उसने और ज़माने से उल्टा चलने की हिम्मत की उसने। भले ही ये खतरनाक हो, भले ही ये नियमों के खिलाफ हो, भले ही मर्द ये करने की हिमात न करते हों। पर उसे क्या? वो तो आई ही है ज़माने से अलग चलने, नियमों को बदलने। तभी तो है वो झांसी की रानी का नया रूप, 'स्कूटी वाली रानी'।

मैंने आज तक ट्राफिक से उल्टा चलने की हिम्मत नहीं की है। परन्तु उस दिन उस रानी को देख कर ऐसा लगा जैसे वो कह रही हो 'यही है तुमारी मर्दानगी, यही है तुम्हारा पौरुष।' जैसे उसकी स्कूटी मुझसे कह रही हो ' बड़ा मुस्कुराते थे मुझे अदना समझ कर, अब कौन है अदना?'

खैर आज तक मैं ट्राफिक से उल्टा चलने की हिमात नहीं कर पाया हूँ और न शायद कर पाऊँगा।

पर कभी उससे बात हुई तो बस इतना कहना चाहूँगा
भारतिय नारी तुझे सलाम ...........