Wednesday, 6 October 2010

ए भाई ज़रा देख के चलो

ए भाई, ज़रा देखके चलो, आगे ही नही, पीछे भी
दाए, ही नही, बाए भी , ऊपर ही नही, नीचे भी
ए भाई

तू जहाँ, आया है, वो तेरा,
घर नही, गाव नही
गली नही, कूचा नही, रास्ता नही, बस्ती नही

दफ्तर है,
और प्यारे, दफ्तर ये एक सरकस है
और इस सरकस में - प्रिंसिपल कन्सल्तंत को भी, सिनिअर कन्सल्तंत को भी
कन्सल्तंत को भी, अस्सोसिअत कन्सल्तंत को भी, ट्रेनी को भी, इन्टरन को भी
नीचे से ऊपर को, ऊपर से नीचे को
आना-जाना पड़ता है

और रिंग मास्टर (बॉस / यजमान) के कोड़े पर -
कोड़ा जो भूख है
कोड़ा जो तनखा है , कोड़ा जो किस्मत है
तरह -तरह नाच के दिखाना यहाँ पड़ता है
बार -बार रोना और गाना यहाँ पड़ता है (अप्रैसल के लिए)
हीरो से जोकर बन जाना पड़ता है

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