Sunday, 12 September 2010

पटवारी एक अजीब सा जीव है.....

मुझे पता नहीं था कि पटवारी नाम कि भी कोई चीज़ होती है। हमारे इलाके में न तो तहसील होती है, न तहसीलदार, न पटवारी। जो जब मैं पहली बार पटवारी के इलाके में गया तो पता चला कि आखिर ये कौन है और क्या चीज़ है।

पटवारी अपने पटवार सर्कल का न सिर्फ ज़मीन जाय्दात का हिसाब रखता है बल्कि वहां के छोटे मोटे झगडे, झंझट और बाकी ला एंड आर्डर को भी देखता है। वो लोगों के जनम (कभी कभी मरे लोगों के) को भी प्रमाणित करता है और उनकी मृत्यु (कभी कभी जिन्दा लोगों के) को भी।

खैर जब पहली बार में पटवारियों के चक्कर में पड़ा तो काफी हैरत हुई उनके काम को देख कर। वेराइटी वेराइटी के सैम्पल हैं। पेश हैं उनमें से कुछ:

कन्सल्तैंत (मखान लगाते हुए): पटवारी साब आप लोगों को इतने तरह का काम करना पड़ता है और किसी तरह कि कोई मदद नहीं है, ये तो बड़ी गलत बात है।
पटवारी: गलत तो है ही साब। क्या करें? पटवारी एक अजीब सा जीव है, वो कुछ भी कर सकता है।
एक बार, काफी समय पहले, जब ये मोबाइल और फोन नहीं हुआ करते थे। उस समय वो जो होना है न पुलिस स्टेशन पर.........
कन्सल्तंत: रेडियो ट्रांसमीटर
पटवारी: हाँ हाँ वही। उस समय उसी से ख़बरें आती थी। जिले से तहसील के थाने, वहां से तहसीलदार के पास और फिर पटवारी के पास।
तो एक जिले के जिलाध्यक्ष (कलक्टर) ने कहा कि, जिले में जितने भी 'मंदिर' हैं, उनकी गिनती कर के बताई जाए। ट्रांसमीटर से खबर गयी पुलिस स्टेशन और अंततः पटवारियों को बता दिया गया।
करीब १० दिन बाद कलक्टर के पास एक लिस्ट पहुँच गयी।
'जिले में 'बंदरों' कि संख्या'

दरअसल, ट्रांसमीटर में आवाज़ सही से ना आने के कारण, थाने वालों ने 'मंदिरों' को 'बंदरों' सुना और बस प्रक्रिया शुरू हो गई। जिलाध्यक्ष ने भी हैरानी से पूछा कि आखिर बंदरों को गिना कैसे?

कन्सल्तंत: कैसे गिना आखिर?
पटवारी: अरे साब ये मत पूछो कैसे गिना? पटवारी एक ऐसा जीव है जो सब कुछ कर सकता है।

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