Saturday, 16 October 2010

दुर्गा पूजा: १५ मिनट का मज़ा

उस समय हम लोग टाइप ३ बी क्वार्टर में रहते थे और डी ए वी पब्लिक स्कूल में पढ़ते थे। घर से स्कूल और स्कूल से घर वापस पैदल ही आते थे। हमारे यहाँ कोई स्कूल बस नहीं थी।
पैदल खुद स्कूल जाने का अपना ही मज़ा था। गप्पें हाकते हुए घर से निकले, मैदान पार किया, मंदिर के बगल से गुज़रते हुए, सिस्बन्नी के बगल वाले फिल्ड से होते हुए, बाज़ार के साइड से स्कूल के गेट में। कुल मिला कर १५ मिनट जाने में और १५ मिनट वापस घर आने में। कमाल का समय था वो।
पास स्कूल था, सुरक्षा की कोई दिक्कत थी नहीं और समय कम लगता था। पैदल ही मस्ती होती थी।
लेकिन साल का एक समय ऐसा था जब ए १५ मिनट स्कूल आने के तो १५ ही रहते थे लेकिन वापस घर जाने के १५ मिनट, ३० हो जाया करते थे। स्कूल से घर जाने के रास्ते में जितनी भी जगहें आती थी उनमें से एक जगह इस समय पर ख़ास आकर्षण बन जाती थी। ये जगह थी हमारी कालोनी का मंदिर। और ये समय था दुर्गा पूजा का। हर साल हमारे मंदिर में माता दुर्गा की मूर्ति बनती थी। साथ में माता से पिटता एक राक्षश (महिसासुर) और माता से शेर से पिटता एक छुटका राक्षश (महिसासुर का चेला)। इन सब के आस पास होते थे कई देवी देवता। उल्लू पर सवार देवी लक्ष्मी, पेट में मटका रख्खे गणेश जी और उनके पास बैठा उनका चूहा। दूसरी तरफ खड़ी हैं सरस्वती माता और मयूर के साथ कार्तिकेय जी। और पीछे पहाड़ों के ऊपर आशीर्वाद की मुद्रा में भोले बाबा।
ये आकर्षण था दुर्गापूजा के ३ दिनों का (माता के पट खुलने के बाद)। हमारा आकर्षण शुरू होता था इससे एक महीने पहले। तब ये सारे देवी देवता और राक्षश दिखते नहीं थे। दीखता था सिर्फ पुआल का एक बड़ा ढेर। और कुछ लोग जो हर साल इसी समय यहाँ प्रकट हो जाते थे लुंगियां और बनियानें पहन के।
स्कूल जाते वक्त समय की कमी के कारण कुछ करना संभव नहीं था। परन्तु लौटते वक्त तो समय अपना ही था (वैसे लेट घर पहुचने पर कभी कभी डांट ज़रूर लगती थी)। तो इस समय का सदुपयोग करते थे। बड़ी तलीनता और श्रद्धा से देखते थे उस पुआल के ढेर से अलग अलग देवी देवताओं को प्रकट होते हुए। जी जी राक्षश भी वहीँ से प्रकट होते थे। मनो ब्रह्मा सृष्टि की उत्पत्ति कर रहे हों। पहले देवताओं को बनाया और फिर दानवों को और फिर इंसानों को।
खैर वो एक महिना कमाल का होता था। रोज़ वापसी में मंदिर पर रुकना और मूर्तियों के बनने के हर स्टेप को देखना। पुआल के ढेर को अलग अलग बंडलों में बंधा गया। उनको आकार दिए गए। अब मिटटी का एक बड़ा सा ढेर आ गया है। मिटटी को पुआल के पुतलों पर लेपा जा रहा है। अरे गणेश जी का क्या होगा? उनके लिए ख़ास एक बड़ी सी मटकी लायी गयी। मटकी ने गणेश जी के पेट का रूप ले लिया। आखिर में सबका रंग रोगन, कपडे लत्ते। और लास्ट स्टेप में सब देवी देवता और राक्षस हथियारों से लैस कर दिए गए। रोज़ स्कूल से वापर जाने वक्त १५ मिनट रिज़र्व होते थे काम का मुआयना करने के लिए।
इसके बाद शुरू होता था मेला। खिलौनों की दुकाने। बंदूकें, पिस्तौलें खरीदते बच्चे। छोटू की चाट की दूकान पर लगी भीड़।
इस बड़े शहर में आकर ये सब खो गया है। न उम्र वो रही न ही ज़माना। यहाँ तो छुट्टी भी नहीं होती दुर्गा पूजा की। न एहसास होता है।

Wednesday, 6 October 2010

ए भाई ज़रा देख के चलो

ए भाई, ज़रा देखके चलो, आगे ही नही, पीछे भी
दाए, ही नही, बाए भी , ऊपर ही नही, नीचे भी
ए भाई

तू जहाँ, आया है, वो तेरा,
घर नही, गाव नही
गली नही, कूचा नही, रास्ता नही, बस्ती नही

दफ्तर है,
और प्यारे, दफ्तर ये एक सरकस है
और इस सरकस में - प्रिंसिपल कन्सल्तंत को भी, सिनिअर कन्सल्तंत को भी
कन्सल्तंत को भी, अस्सोसिअत कन्सल्तंत को भी, ट्रेनी को भी, इन्टरन को भी
नीचे से ऊपर को, ऊपर से नीचे को
आना-जाना पड़ता है

और रिंग मास्टर (बॉस / यजमान) के कोड़े पर -
कोड़ा जो भूख है
कोड़ा जो तनखा है , कोड़ा जो किस्मत है
तरह -तरह नाच के दिखाना यहाँ पड़ता है
बार -बार रोना और गाना यहाँ पड़ता है (अप्रैसल के लिए)
हीरो से जोकर बन जाना पड़ता है