Tuesday, 12 April 2011

अइयो अन्ना

शुक्रवार, १८ अप्रैल।

गाँधी जी का कोई फालोअर है अन्ना हजारे। भूख हरताल पर बैठा है, इंडिया से करप्सन मिटाने के लिए। भारी मात्रा में हर जगह से लोग उसके सपोर्ट में जा रहे हैं।
हमारे आफिस के लोग भी उत्साहित हैं रैली में हिस्सा लेने के लिए। आफिस से हाफ डे ले के चले हमारे मित्र चिंता स्वामी। साथ में उनकी कार में सवार हो गए बिट्टू सिंह और ज्ञान चटर्जी। आफ्टर आल करप्सन का सवाल है। सबको चलना चाहिए।

'स्वामी दादा, जरा तेज चलाओ तुम। देर होता है।'

अरे ये क्या रेड लाइट।
'ओ स्वामी प्र, रेड लाइट जम्प करीं, साडी दिल्ली विच सब चलता है।'

चिंता ने अक्सिलेटर पर पैर दबाया। और कूद गए रेड लाइट।

'ओ रुक जा ताऊ रुक जा।" ट्रेफिक पुलिस
स्वामी: 'अइयो अन्ना, अमको जाने को, बहुत क्रिटिकल काम है। अन्ना स्ट्राइक पर है। अम उसको सपोर्ट करेगा। करप्सन का सवाल है।'

'ओ चौधरी, तू मन्ने अन्ना बोल रहा है, तो अब कौण से अन्ना के पास जाना है। रुक जा इधर।'
'ट्रेफिक दादा, तुम समझा नहीं। हम अन्ना हजारे का बात करता है।'

'रे तू अन्ना का बात करे या गन्ना का, मन्ने के। चालान भर 1200 का और जा।'

1200। हमारे तीनो मित्रों ने एक दुसरे की ओर देखा और आपस में बात की।

'ट्रेफिक प्रा, गरीब विच दया करो, कुछ अपना भला करो, कुछ हमारा भला करो।'
बिट्टू के इतना कहते ही स्वामी ने एक 100 का नोट ट्रेफिक पुलिस की जेब में डाल दिया।

ट्रेफिक पुलिस ने हमारे तीनो मित्रों को एक स्माइल दी और हमारे मित्रों ने पुलिस वाले को।
'पहली गलती है, तो छोरे दे रहा हूँ। अगली बार से ध्यान रखियो।' 'जाओ अब मिटाओ करप्सन।'

एक लम्बी चैन की सांस ले के हमारे मित्र गण आगे बढे, अन्ना हजारे का साथ देने........
करप्सन को दूर करने.....