Tuesday, 13 September 2011

फ़ॉर्मूला वन : किस्में है कितना दम

मेरे मित्र ने बताया हिंदुस्तान में, वो भी दिल्ली के पास नोयडा में कारों की रेस होने वाली है। हमने कहा, भाई इसमें कौन सी बड़ी बात हो गई जो इतना हंगामा मचाये हुए हो। हम तो जब भी घर से निकलते हैं तो हर रोज़, हर लाल बत्ती पर रेस देखते हैं। वो भी अकेले कार की नहीं, मोटर साइकिल, साइकिल, रिक्शा, ऑटो सब एक साथ रेस लगाते हैं। बत्ती हरी होने में ५ सकेंड बाकी होते हैं की चारो ओर ब्रूमssssss ब्रूमssssss आने लगती है। और जैसे ही बत्ती हरी हुई कि हर गाड़ी दूसरे से आगे निकालने की होड में लग जाती है।
टीवी में तो कुछ ऐसा ही होते देखा है रेस में। तो अब अलग से ये रेस आयोजित करने की क्या आवश्यकता पड़ी थी। खैर अब कर दिया है तो ठीक ही है। सुना है नाम उसका है 'फ़ॉर्मूला वन' ।

तो 'फ़ॉर्मूला वन' वाले भाइयों आपके इस आयोजन को हिट करने का नंबर वन फ़ॉर्मूला है मेरे पास। लोग बताते हैं की ये रेसों में सर्वोत्तम चालाक और सर्वोत्तम वाहन का भी फैसला होता है। तो भी जब रेस हिंदुस्तान में हो रही है तो हिन्दुस्तानी अंदाज़ में भी होनी चाहिए। तो आप लोग २-३ काम करें।
  1. रेस ट्रैक पर कुछ १००-१५० बड़े छोटे गड्ढे कर दें। ज़ाहिर सी बात है फैसला वाहन और वाहन चालक का होगा की उन्हें सड़क पर गाड़ी चलानी है या गड्ढों में। और हाँ ध्यान रखें की सब गड्ढों की गहराई सामान न हो।
  2. इन १००-१५० में से कुछ ५० में पानी भर दीजिये। इससे फायदा है की चालक को गड्ढे की गहराई का अंदाजा नहीं मिलेगा। टेस्ट थोडा मुश्किल तो होना चाहिए।
  3. अगला काम ये करना है की रेस ट्रैक पर कुछ रिक्शे, ठेले, और ऑटो छोड़ दें। ये अपनी स्पीड से चले और अपनी मर्ज़ी के हिसाब से सड़क के दायीं, बायीं या बीच में चलें। और रेस ड्राईवर इन रिक्शे, ठेले और ऑटो के हिसाब से चलें। और हाँ, कुछ ठेलों में सरिये लोड करना न भूलियेगा।
  4. अच्छा अब कुछ दर्शकों का चयन करने उनको एक्शन में इन्वाल्व करने के लिए। दर्शक हमेशा एक्शन में इन्वाल्व होने के लिए बेचैन रहते हैं। तो इन दर्शकों को आकस्मिक और अनियमित तरीके से रेस ट्रैक पार करने को कहें। रेस ड्राईवर इनसे बच के चलें।
  5. अब ये सबसे ज़रूरी स्टेप है। कुछ गाय, भैंस, गधे पकड़ के लायें और उनको रेस ट्रैक पर मन मौजी करने को छोड़ दें। रेस ड्राईवर इनसे बच के चलें, इनको बचाके चलें। और हाँ कभी पूरी सड़क रोक कर अगर बैठे हों तो अपनी गाड़ी (फरारी, बी ऍम डब्लू ) रोकें। इन जानवरों को रेस ट्रैक पर से हांकें और फिर आगे बढ़ें।
अगर इंडियन ग्रांड प्रिक्स आयोजित करना है फार्मूला वन वालों को तो मेरे इन फोर्मुलों का ध्यान रखें। तब देखें क्या झकास रेस होगी। हम भी देखेंगे कौन है हैमिल्टन, बट्टन, सुमाकर, और कौन हैं उनके बाप। ये है असली टेस्ट अच्छे ड्राईवर और अच्छे वाहन का। दावा है मेरा इस रेस में यादव जी टैक्सी वाले के लड़कों को बुला लो। फर्स्ट वही आयेंगे। और आयोजन आपका होगा सुपर हिट।

हो जाए एक चैलेंज। आ देखें ज़रा किस्में है कितना दम।

Thursday, 8 September 2011

बम ही क्यों, और भी तरीके हैं भाई

कल दिल्ली में एक और बम फटा। अब तक 12 लोग मारे जा चुके हैं और 50-60 घायल। हिन्दू, मुसलमान, सिख सभी।

आप कहेंगे कोई नयी बात बताइये साहब, ये तो हर रोज़ हो रहा है। अब अखबार में और टीवी पर ब्रेकिंग न्यूज़ आना चाहिए: 'आज हिंदुस्तान में कहीं बम नहीं फटा', 'कहीं कोई आतंकवादी हमला नहीं हुआ'। कुछ नेता कहते हैं ये १% का मामला है। सरकार ज़रा नींद से जागिये, ये मामला अब १००% का बनता जा रहा है। मन कि देश कि जनसँख्या बहुत ज्यादा है और बहुत तेज़ी से बढ़ रही है। पर ये कोई तरीका थोड़े है रोकथाम का, और भी तरीके हैं भाई। एक वक्त था जब एक नेता जी लोगों को पकड़ पकड़ के नसबंदी करवा देते थेपर जान बच जाती थी। आज दूसरे नेतालोग आतंकियों को खुला छोड़ दे रहे हैं। जाओ भाई ख़तम करो लोगों को। उन नेताओं के लिए एक सन्देश है मेरा: सरकार, मेरा न विवाह हुआ है, न बच्चे हैं। परन्तु में नसबंदी करवाने को तैयार हूँ। बस जान बक्श दो मेरी।

में दिल्ली के ही पास एक शहर रुपी 'गाँव' में रहता हूँ और आफिस भी यहीं है। मेरे दोस्त लोग कभी मिलने नहीं आना चाहते। कहते हैं यार ये कौन सी दुनिया में रहते हो। पहुचना भी गंगा नहाने के बराबर है। आज में उनपे हँसता हूँ। अरे मूर्खों, ये ऐसी जगह है कि आम आदमी न आ पाए, आतंकवादी और उनके बम किस खेत कि मूली हैं। कम से कम सेफ हूँ भाई।

बचना है तो इन नेताओं पर से भरोसा छोड़िये और मेरी तरह इस सेफ 'गाँव' में आके रहिये। वैसे भी, बम ही क्यों, और भी तरीके हैं भाई हर किसी के लिए।