Saturday, 29 December 2012

न वो अमानत है, न दामिनी, न निर्भया

शर्म आ रही है थोड़ी थोड़ी।
शायद घृणा के भी अंश हैं मिले हुए।

वो हम तुम जैसी ही थी।
वो जीना चाहती थी।

सफ़र आगे का करना ही बेहतर समझा।
उसने शायद अब मरना ही बेहतर समझा।

आज देश की जो हालत है उससे सच में घृणा हो रही है। एक लड़की के साथ ऐसा जघन्य अपराध हुआ। गंभीर हालत में थी वो। इस देश की एक आम लड़की। एक आम नागरिक। जिंदगी से उसे प्यार था, हम सब की तरह। उसने पहले कभी कहा नहीं, पर शायद हम सब से इतना ही चाहती थी कि उसे उसकी जिंदगी आराम से जीने दें। उसका जो हक़ है, उसे वो दें। उसे जो इज्ज़त मिलनी चाहिए, उसे वो मिले। पर हम वो उसे जीते जी न दे सके।

जब ये मामला सामने आया तो अचानक वो लड़की देश की बेटी हो गई, देश की बहन हो गई। हमने उसे जन्म नहीं दिया, न वो हमारे परिवार की है। वो जिस परिवार की है, जिसकी, बेटी है, जिसकी बहन है, उसकी क्या हालत है इसका हम अंदाजा भी नहीं लगा सकते हैं। ऐसी ही हालत में हमें अचानक अपनापन क्यों हो जाता है?

हमने उसे नाम देने शुरू कर दिए। दामिनी, क्योंकि एक फिल्म आई थी जिसमें दामिनी एक रेप की गई लड़की के लिए लड़ी थी। क्या जिस लड़की का रेप हुआ था इस फिल्म में उसका नाम किसी को याद है? शायद नहीं। महिमा मंडान करना और भूल जाना हमें पसंद है।

अमानत, क्योंकि वो अब देश की अमानत हो गयी है। वो देश जिसने उसकी जान ले ली। वो देश जो ये नहीं सोच रहा है की उसके अन्दर क्या कमी है। वो देश जो पहले फेसबुक पर इस जघन्य अपराध के खिलाफ स्टेटस मेसेज लिखता है और अगले दिन मायावती और एक इतालवी सांसद की तस्वीर शेयर करके कहता है "शायद इसीलिए हिंदुस्तानी युवा को पॉलिटिक्स में रुचि नहीं है"। कथनी और करनी का भेद समझना होगा।

निर्भया, न जाने क्यों? शायद लोगों ने सोचा कि उसे मरने का डर नहीं था। शायद उसने बाकियों के मन से डर भगा दिया। हमें कैसे पता उसे डर नहीं था? और बाकियों के मन में तो डर अभी भी है। शायद दिल्ली के लोगों के मन में डर नहीं होगा। शायद हम उसे निर्भया कहना चाहते हैं ताकि वो हमारे भय का भार खुद पर ले ले।

ये महिमा मंडान बंद करना पड़ेगा। हमने उसे जन्म नहीं दिया, नाम देने वाले हम कौन हैं। हमारा उसपे कोई हक़ नहीं है। वो एक आम आदमी थी। उसने वो भुगता जो हर आम आदमी भुगतता है। उसके साथ वो हुआ जो आम आदमी के साथ होता है। उसे आम आदमी की तरह अकेला छोड़ दो। अपनी कमजोरियों का भार उसपर मत डालो। खुद मज़बूत बनो और खुद को बदलो।

कुछ महीने पहले एक फिल्म देखी थी 'ओ माय गॉड'. फूल, दीप, मोमबत्तियां चढ़ा कर हम बहुत ही जल्दी किसी को भी भगवन बना देते हैं और उसकी मूर्ति को पूजने लगते हैं। पर शायद उसकी सच्ची भावना को नहीं समझ पाते हैं। आडम्बर तो बहुत करते हैं पर सही रास्ते पर नहीं चलते हैं। उस 23 साल की आम हिंदुस्तानी को भगवन बनाना बंद करना चाहिए हमें। सही रास्ते की तलाश उसके लिए मोमबत्ती जलाने से ज्यादा ज़रूरी है। सही रास्ते पर चलना उससे भी ज्यादा ज़रूरी।

बीते हुए कल में जब वो थी तो ज़रा सी इज्ज़त नहीं दे पाए और आज आने वाले कल में उसे राष्ट्रीय सामान देने की बात कर रहे हैं। राष्ट्रीय सामान की अब उसे ज़रुरत नहीं है। वो इससे ऊपर उठ चुकी है। राष्ट्रीय सामान और सामाजिक सम्मान की ज़रुरत हर महिला को है। उसे श्रधांजली नहीं, परिवर्तन की आवश्यकता है।

न वो अमानत है, न दामिनी, न निर्भया। वो है एक आम आदमी। 

Thursday, 27 December 2012

संशोधन

19 दिसम्बर 2012 को मैंने एक पोस्ट लिखा था दिल्ली में हुए एक गैंग रेप के बारे में। इस जघन्य अपराध के बाद दिल्ली और दिल्ली वासियों में काफी रोष है। लोग अपराधियों के लिए फंसी की मांग कर रहे हैं। रोष मुझमें भी बहुत है। इसीलिए उस दिन मैंने एक पोस्ट लिख कर अपने विचार व्यक्त किये थे।

मैं इनलोगों के लिए फंसी कि सज़ा के खिलाफ हूँ। मुझे लगता है इनके लिए ये बहुत आसान सज़ा है। मेरा मत है कि  इनको उम्रकैद, यानी उम्र भर की कड़ी कैद मिलनी चाहिए। उस दिन मैंने कहा था कि इनको उम्र भर कि कैद होनी चाहिए न की 14 साल की। तब मेरी समझ थी कि भारत में उम्र कैद का अर्थ 14 साल होता है। ऐसा इसलिए क्योंकि मैंने हमेशा उम्र कैद के कैदियों को 14 साल बाद रिहा होते सुना है। खैर धन्यवाद रोहिताश जी का जिन्होंने मेरे एक पोस्ट पर कमेंट दे कर मुझे जागृत किया इस बारे में। उन्होंने बताया कि

"उम्रकैद का मतलब 14 साल नहीं होता। इसका मतलब होता है कि जब तक सांस है यानि आखरि सांस तक की कैद....1990 से आज तक कम से कम 4-5 बार सुप्रीम कोर्ट इस बात को स्पष्ट कर चुका है कि उम्रकैद का मतलब जब तक कैी जिंदा है उसे जेल में रखा जाएगा....औऱ 14 साल का मतलब है कि 14 साल से पहले उशकी रिहाई पर भी विचार नहीं किया जाएगा।"

मैंने भी फ़ौरन गूगल देव का आह्वाहन किया। थोड़ी छानबीन के बाद पता चला कि रोहताश जी 100% सही थे। अक्सर कोर्ट उम्र कैद कि सज़ा देते हैं परन्तु जेल नियमों के अनुसार उन्हें 14 साल बाद छूट मिल सकती है इसलिए शायद हमने अक्सर 14 साल बाद मुजरिमों को बरी होते देखा और सुना है। परन्तु कुछ मामलों में उच्चतम न्यायालय ने इस 14 साल की सीमा को बढ़ा कर 30 साल किया है। एक मामले में न्यायालय ने मृत्यु दंड को बदल के उम्र कैद किया परन्तु साथ में ये भी कहा कि मुजरिम की साड़ी उम्र जेल में कटेगी, बिना किसी छूट के।

तो उम्र भर के उम्र कैद हो सकती है और दी भी गई है। ये हमारे कानून में है। कोई संशोधन लाने की आवश्यकता नहीं लगती है। दिल्ली गैंग रेप मामले के जघन्य अपराधियों को उम्र भर की कैद मिलनी चाहिए। उम्र भर की कड़ी कैद। ताकि उनको और बाकि लोगों को हर पल एहसास हो इस अपराध का। पल पल वो उस एहसाह से गुजरें जो एहसास समाज रेप की पीड़ित को देता है। जो एहसास पीड़ित के लिए गलत है पर अपराधियों के लिए सही। 



Tuesday, 25 December 2012

बल, बुद्धि, विद्या: जब ईश्वर स्त्री था

कुछ महीने पहले जब इंग्लैंड में था तो बी बी सी पर एक प्रोग्राम देखा था। नाम था 'व्हेन गॉड वास अ गर्ल' (when God was a Girl) यानी, जब इश्वर स्त्री था। बहुत ही बढ़िया रिसर्च पर आधारित कार्यक्रम था ये। इतिहास विद Bettany Hughes के रिसर्च पर आधारित और उन्हीं के द्वारा प्रस्तुत किया गया ये 3 एपिसोर्ड काफी मनमोहक थे। पर उससे भी ज़रूरी के ये सब मुझे उस सत्य कि याद दिला गया जो शायद हमारा समाज भूलता जा रहा है।

पूरी दुनिया घूम कर, काफी प्राचीन सभ्यताओं की छान बीन करके, ये बताया गया, कि करीब करीब सभी सभ्यताओं में नारियों की अराधना होती थी। 'थी' पर ध्यान दें। जी हाँ, वर्तमान परिवेश में अगर धर्मों पर ही सिर्फ ध्यान दें तो देखेंगे कि पुरुषों का बोलबाला है। हम जब भी भगवान् की बात करते हैं तो उसे पुरुष रूप में संबोधित करते हैं। 'इश्वर जो करता है ('करती है' नहीं) अच्छे के लिए करता है। अंग्रेजी का गॉड भी पुरुष है। हॉलीवुड की सभी फिल्मों में हम गॉड को पुरुष रूप में देखते हैं। सभी पैगम्बर भी पुरुष है। उनके साथ की महिलों के बारे में, बातों को या तो दबाया गया है या छुपाया गया है।

वर्तमान दुनियाँ में शायद कुछ ही ऐसी सभ्यताएँ हैं, संस्कृतियाँ हैं, जिनमें स्त्रियों को पूजा जाता हो। मेरे विचार से इसमें अग्रिणी है भारतीय संस्कृति। वो भी शायद इसलिए कि हमारी संस्कृति की प्राचीनता अभी भी बाकी है। हम अब भी धार्मिक रूप से स्त्रियों की पूजा करते हैं। पर सामाजिक रूप से?

बल चाहिए तो दुर्गा और काली माँ के सामने सर झुकाओ। 
बुद्धि और विद्या चाहिए तो सरस्वती माँ की अराधना करो। 
धन और समृद्धि चाहिए तो लक्ष्मी माता का आह्वाहन करो। 

सब स्त्रियाँ। दैनिक रूप से पूजा करते हैं हम इनमें से किसी न किसी की, या सब की। पर हमारी संस्कृति में ये ढकोसला क्यों? क्यों एक और स्त्री को सबसे ऊँचा पायदान देते हैं और दूसरी तरफ सबसे नीचा?

दिल्ली बलात्कार काण्ड या देश में अन्य बलात्कार कण्डों में आरोपित पुरुष क्या पूजा पाठ नहीं करते थे? क्या उन्होंने कभी नवरात्र या दुर्गा पूजा नहीं मनाया? क्या कभी दिवाली की पूजा नहीं की? क्या कभी सरस्वती पूजा में शामिल नहीं हुए? ज़रूर हुए होंगे। फिर क्यों ये नासमझी, इस प्राचीन संस्कृति और इस समाज की? क्या सिर्फ ढकोसली पूजा अर्चना से माताएँ प्रसन्न हो जायेंगी?

बिलकुल नहीं। जब तक ये पूजा, ये संस्कार, ये इज्ज़त हम अपने व्यवहार में नहीं लायेंगे तब तक माताएँ प्रसन्न नहीं होंगी।

मुझे गर्व है अपनी संस्कृति पर कि हम तन, मन और धन, हर चीज़ की पूर्ती के लिए देवियों, महिलाओं, स्त्रियों के आगे सर झुकाते हैं। हम ही वो संस्कृति हैं जो हज़ारों साल पहले भी ऐसा करते थे और अब भी ऐसा करते हैं। पर ये गर्व अधूरा है। ये पूरा तभी होगा जब हम अपनी संस्कृति को विचारों के भी धरातल पर लायेंगे। हमारी संस्कृति को बल, बुद्धि, विद्या और धन की प्राप्ति तभी होगी। महज़ साल के एक दिन मूर्ति बना कर उसे इज्ज़त देने से नहीं, जो साक्षात् साल भर हमारे आस पास होती है उसे इज्ज़त देने से।

ये बात न सिर्फ हम सब के लिए है बल्कि संस्कृति के उन ठेकेदारों के लिए भी है तो महिलाओं को दबा कर, छुपा कर, पीछे रख कर चलने को अपनी संस्कृति की रक्षा करने के पर्याय समझते हैं।

कुछ के लिए शायद इश्वर स्त्री था पर हमारे लिए तो इश्वर अब भी स्त्री है।

Sunday, 23 December 2012

आज थोड़ा गर्व है देश पर....


सुना आज भारत के एक महानायक ने हथियार डाल दिए। अब कुछ बड़े युद्धों में ही लड़ेंगे। छोटे युद्धों में बहुत लड़ लिए। अब उम्र हो चली है। शेर बूढ़ा हो चला है। प्रकृति का नियम है, हमारी भी बारी आएगी। 

खैर, उन्होंने तो हथियार डाल दिए। वो बूढ़े हो चले हैं। पर हमारी नवयुवतियाँ और हमारे नौजवान हथियार नहीं डाल रहे हैं। उन्हें इन्साफ चाहिए। इन्साफ उस लड़की के लिए, जिसके साथ जघन्य अपराध हुआ था कुछ दिनों पहले। इस बर्बरता के साथ हुए अपराध के लिए इन्साफ चाहिए। 

यदि कोई साधारण दिन होता तो शायद सारे मीडिया, पारंपरिक और सोशल, पर महानायक, उनके हथियार डालने और उनके महायुद्धों की ही बात छाई रहती। पर ये समय साधारण नहीं है। यह असाधारण वक्त, एक असाधारण कांड का परिणाम है और इस आसाधारण वक्त में असाधारण कार्य हो रहे हैं। सुनता हूँ हिंदुस्तान का युवा जाग गया है और नेता सो नहीं पा रहे हैं। 

इस बात के लिए आज थोड़ा गर्व है देश पर। महानायक साइड और असल नाइकाएँ और नायक मेन फ्रेम में। कारण, कुछ खलनायकों को सज़ा दिलवाना है। गर्व है थोडा आज देश पर। 

पर गर्व थोड़ा ही है। 

इसका कारण है, थोड़ी नासमझी लोगों की। हम नवयुवतियों और नौजवानों की नासमझी। हो-हल्ला, हंगामा। कुछ लोग कल रात 'विदेशी राजमाता' से मिले। उनसे जल्द से जल्द सक्त कारवाई कि माँग की, कारवाई माने फांसी। राजमाता ने जल्द कारवाई कि कोशिश का आश्वाशन दिया। लोग निश्चित समय बताने कि माँग कर रहे थे। राजमाता की 'कोशिश' के आश्वासन से संतोष नहीं हुआ उनको। शायद उनको पता नहीं है कि अपराधियों कि किस्मत का फैसला कोर्ट के हाँथ है, सरकार या राजमाता के नहीं। क्या सज़ा और कितने समय में सज़ा, ये भी न्यायालय के ही हाँथ है, राजमाता या सरकार के नहीं। हाँ सरकार और राजमाता पुख्ता छानबीन और ठोस केस का आश्वाशन दे सकते हैं और सिर्फ आश्वासन ही नहीं, इस बात को पक्का भी करना चाहिए उनको। लेकिन फैसला वो नहीं कर सकते हैं और उनको हक़ होना चाहिए फैसला करने का। अगर ऐसा हक़ मिल गया तब तो राजमाता अपने सारे बलात्कारी सांसदों (ओह सॉरी, मेरा मतलब है जिनपर रेप का केस है) को तुरंत बरी (अंग्रेजी वाला नहीं) करवा देंगी। 

आज कुछ नवयुवतियाँ और नौजवान फिर राजमाता से मिले। साथ में 'राजकुमार' भी थे। उन्होंने भी करवाई में सरकार की तरफ से कोई कसर छोड़ने का आश्वाशन दिया। पर निश्चित समय वो भी दे सके। न्यायालय तो हैं नहीं वो। इस बात को लोगों को, ख़ास कर हमारी नवयुवतियों और नौजवानों को समझना चाहिए कि हमारे यहाँ सिर्फ न्यायालय ही सज़ा दे सकता है। और न्यायालय को कोई बरगला नहीं सकता है और बरगलाने की कोशिश करनी चाहिए। 

प्रजातंत्र के तीन पायों को याद रखिये और कृपया समझिए कि लेजिस्लेचर (माने हमारे सांसद), एग्जीक्यूटिव (माने पुलिस) और जुडिसियरी (माने न्यायालय) के काम अलग अलग हैं और तीनों में से किसी को एक दुसरे के रास्ते में नहीं आना चाहिए। इससे प्रजातंत्र कमज़ोर होगा। 

विरोध प्रदर्शन, हो हल्ला करने से पहले ये बातें समझना ज़रूरी है ताकि हम सही माँग सही लोगों के सामने उठाएं। 
जन जागरण पर गर्व है पर इस समझ कि थोड़ी कमी लग रही है। ये समझ कर आगे बढ़ें तो और भी गर्व होगा अपने देश पर। इसलिए शायद, आज गर्व है देश पर कि महानायक को साइड रखा और असली नाईकाओं और नायकों को मेन फ्रेम में रखा। पर गर्व पूरा नहीं है। 

इसलिए कहा, आज थोड़ा गर्व है देश पर........

Saturday, 22 December 2012

क्या ऐसे बदलेगा देश

मुझे लगता है कि आज कल घर में काफी समय बिता रहा हूँ। पिछले 3-4 दिन से हर पोस्ट में टीवी की कोई न कोई बात होती है। आज भी है। खैर आलसी (मेरे जैसे) को कौन हिला सकता है?

आज टीवी पर ख़बरें देख कर देश कि स्थिति दयनीय लग रही है। नागरिक सुरक्षित नहीं हैं। सुरक्षा की कमी ने लोगों को विरोध प्रदर्शन करने पर मजबूर कर दिया है। सुबह से सारे न्यूज़ चैनल रायसेना हिल्स के पास होने वाले प्रदर्शनों को दिखा रहे हैं और कह रहे हैं कि आज 'देश' का गुस्सा फूट पड़ा है। बहुत सह लिया 'देश' ने। ट्विटर और फेसबुक जैसी वेबसाइटओं पर भी 'देश' का गुस्सा फूट रहा है। लोग ट्वीट कर कर के गुस्सा जता रहे हैं। 'देश' गुस्सा जता रहा है।

जिस तरह की घिनौनी हरकत दिल्ली में पिछले दिनों हुई उसके लिए फंसी की सज़ा की माँग हो रही है। देश के अभी के कानून के हिसाब से ज्यादा से ज्यादा उम्रकैद हो सकती है। माने 14 साल। लोग कानून बदलने की माँग कर रहे हैं। कुछ का कहना है कि उनको इन्साफ चाहिए और इन्साफ फांसी से ही मिलेगा। इन्साफ लिए बिना वो धरना प्रदर्शन ख़त्म नहीं करने वाले हैं। अभी कोर्ट में केस शुरू भी नहीं हुआ है। थोड़े समय बैठना पड़ेगा पड़ेगा शायद उनको। और कोर्ट का फैसला शायद उनको और हमको इन्साफ भी न लगे।

अभी अभी खबर आई कि सरकार कानून में संसोधन का प्रस्ताव लाने के लिए राज़ी हो गई है और 'देश' को इसके बारे में जल्दी बताया जा सकता है। कानून में परिवर्तन लाने के लिए संसद का विशेष सत्र बुलाया जा सकता है। कानून 'देश' के लिए बदला जा सकता है।

मेरा कुछ सवाल हैं इन सब के बीच। क्या ऐसे बदलेगा देश? क्या सरकार नागरिकों को सुरक्षित नहीं कर पाएगी? क्या लोग ऐसे ही विरोध प्रदर्शन करते रहेंगे?

पर इससे भी बड़ी बात क्या दिल्ली में प्रदर्शन करने वाले ये 5-10000 लोग ही 'देश' हैं? मैं तो नहीं चाहता इन अपराधियों के लिए फंसी की सजा। मेरा विचार है कि उम्र कैद के नियम को बदलना चाहिए। 14 साल नहीं, सच में उम्र कैद मिलना चाहिए। और इन अपराधियों को उम्र भर की कड़ी उम्र कैद मिलनी चाहिए। मैं भी इस 'देश' का हिस्सा हूँ। क्या मेरा विचार मायने नहीं रखता? क्या हम जल्दबाजी में क़ानून बदल देंगे? मेरे विचार से कानून बदलने से पहले ठंढे दिमाग से व्यापक चर्चा होनी चाहिए। वरना दिल्ली के इस गरम माहौल को देख कर हमारे नेता नेताबाज़ी के चक्कर मैं हड़बड़ी मैं क़ानून बदल देंगे और उन 10000 लोगों की माँग का भुगतान भरना पड़ेगा पूरे देश को।

और हाँ, इस एक केस में फंसी हो जाने से हमारे देश की महिलाओं के लिए कुछ ख़ास नहीं बदलेगा। मैं फिर कहूँगा कि इसके लिए व्यापक सामाजिक परिवर्तन की आवश्यकता है। इस बात को सबसे पहले महिलाओं को समझना होगा। और शहरों के लड़कों लड़कियों को शहरों से निकल कल देश के बाकी हिस्सों में सामाजिक परिवर्तन के लिए काम करना पड़ेगा। परिवर्तन सिर्फ रायसेन हिल्स पर सप्ताहांत में धरना देने से नहीं आएगा। देश में परिवर्तन लाना होगा। और देश सिर्फ दिल्ली नहीं हैं। मेरा छोटा सा शहर और उससे भी छोटा गाँव भी इस देश का ही हिस्सा हैं।

क्या इस हड़बड़ी और गरमजोशी से काम चलेगा? क्या ऐसे बदलेगा देश? 

Friday, 21 December 2012

टीवी पर ठुमके लगाने वाली......नेता कैसे बन गाई

आज मेरे लिए नेता शब्द का अर्थ ढूंढना अति आवश्यक हो गया। आगे बताऊंगा क्यों। खैर एक वेबसाइट पर नेता का अर्थ अंग्रेजी में देखा तो ये शब्द निकल कर आए
जिन भाइयों और बहनों को अंग्रेजी का अच्छा ज्ञान है, वो अंदाजा लगा सकते हैं कि कितने उत्तम शब्दों का प्रयोग किया गया है 'नेता' के लिए। खैर देश के नेताओं कि जो भी स्थिति हो, मैं 10 नंबर और 12 नंबर अर्थ से जोड़ता हूँ नेताओं को। वो नयी चीज़ों की शुरुआत करते हैं। अच्छी चीज़ों की शुरुआत। और समाज का नेतृत्व करते हैं, उन अच्छी चीज़ों कि दिशा में। 

मेरे हिसाब से नेता समाज का आईना है और समाज नेता का। खैर ये मेरी समझ है। 

नेता का अर्थ इसलिए ढूंढ रहा था क्योंकि आज कुछ ऐसा देखा और सुना जो अनसुना सा लगा। टीवी पर चर्चा देखने का बड़ा शौक़ीन हूँ। उससे बढ़िया मनोरंजन और कहीं नहीं। ऐसी ही एक चर्चा में मौजूद थे दो राष्ट्रीय पार्टियों के नेता। एक पुरुष और एक महिला। जैसा की स्वाभाविक है राजनितिक चर्चा में, आरोपों प्रत्यारोपों का दौड़ चल रहा था। महिला नेता ने पुरुष नेता पर कुछ आरॊप लगाए। जवाब में पुरुष जी, जो देश कि सबसे पुरानी पार्टी का नेतृत्वा कर रहे थे, बोले 

"कल तक टेलीविज़न पर ठुमके लगा रही थीं और आज नेता बन कर घूम रही हैं" 
(उन्होंने 'थीं' कहा, उनके लहज़े में झलकती इज्ज़त पर ध्यान दें)

ये महिला नेता पहले टीवी की बड़ी कलाकारा रहीं हैं, हम सब की प्रिय बहू रहीं हैं। महिला सांसद ने इसका विरोध किया और कहा की पुरुष सांसद छिछोरी बातें कर रहे हैं, जैसे सड़क पर छेड़छाड़ करने वाले करते हैं, जो आगे चलके रेपिस्ट बनते हैं। रेपिस्ट वाली बात छोड़ कर बाकी कथन से मैं सहमत हूँ। पुरुष सांसद का जवाब 

"शट अप!! अरे क्या बात कर रही हो? क्या करैक्टर है आपका?"
('आपका' नोट करे दी गई इज्ज़त को)

ये नेता हैं हमारे। समाज का आइना। महिला की इज्ज़त इस प्रकार करते हैं। और यही इनसे समाज सीखता है। और इसी राह पर ये समाज का नेतृत्व करते हैं। इसी दिशा में ले चले हैं ये समाज को। शायद समाज ऐसा है इसलिए नेता ऐसे हैं। जो भी हो पुरुष जी के इन छोटे वक्तव्यों ने हमें आइना तो दिखाया ही है। आखिर नेता समाज का आइना है। 

पर शायद 10 और 12 नेता के सही अर्थ नहीं हैं। शायद बाकी के कुछ अंग्रेजी शब्द जो लिस्ट में हैं वही नेता के अर्थ हैं। आप खुद ही चुन लें आपको जो अर्थ बढ़िया लगे। 

मैंने पहले भी महिलाओं की इज्ज़त को समाज में स्थापित करने कि बात कही थी। ये इस प्रकार न हो पायेगा। ये नेताओं के पीछे चलने से न हो पायेगा। ये हमारे और आपके नेतृत्व से ही हो पाएगा। अगर ऐसे नेताओं के साथ चलते रहे तो सही में दोषी हम सब होंगे।  

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टीवी चैनल ने पुरुष जी के कथनों का विरोध किया। इसके लिए उनको धन्यवाद और बधाईयाँ। 

Thursday, 20 December 2012

मैं इसका दोषी हूँ, हम सब दोषी हैं

 कल टीवी पर एक चर्चा देख रहा था। विषय दिल्ली में हुए उस जघन्य अपराध का था, एक लड़की के साथ सामूहिक बलात्कार। शायद आज निकलने वाले गुजरात और हिमाचल चुनावों के परिणामों से पहले ये आखरी चर्चा थी। आज सुबह से टीवी पर बस चुनाव है। वैसे चैनलों की एक बड़ाई करनी होगी कि चुनावी परिणामों के इस हल्लम हल्ला के बीच भी उन्होंने उस अपराध से जुड़ी एक खबर दिखाने का समय निकाल लिया। लड़की कि हालत में सुधार है पर अभी 10 दिनों तक कुछ कहा नहीं जा सकता।

खैर कल की चर्चा पर लौटते हैं। उसमें महिला के वस्तुतिकरण का भी मुद्दा उठा। कैसे हम एक महिला को एक चीज़ या वास्तु समझ लेते हैं। आज मुझे अपने कॉलेज के दिन याद आ गए। शायद मज़ाक के लहज़े में ही, पर हम लड़कियों को देख कर आपस में बात करते थे

"वाह क्या माल है यार"
"वाह क्या चीज़ है यार"

कभी किसी लड़की से यह कहने की हिम्मत न हुई, पर आपस में कई बार इन वाक्यों का प्रयोग किया। ये शर्म की बात है। बिना सोचे, बिना समझे और बिना इसका परिणाम जाने, हमने हमेशा महिला का वस्तुतिकरण कर दिया। आज समझता हूँ कि ये सारे कारण आगे जुड़ कर महिलाओं का समाज में स्थान गिराने के कारण बनते हैं।

पर कल के पोस्ट के बाद आज मीडिया की बात उठाना चाहता हूँ। वैसे तो हम सब मीडिया के हिस्से हैं (सोशल मीडिया) लेकिन मैं पारंपरिक मीडिया कि बात करना चाहता हूँ।

हमारे यहाँ एक हिंदी अखबार आता है। आज उसमें साइना नेहवाल से जुड़ी एक खबर आई थी। घायल होने के कारण उन्हें एक मैच छोड़ना पड़ा। उसके साथ एक तस्वीर थी। वो तस्वीर देख कर महिलाओं के वास्तुतिकरण कि बात याद आ गई। मीडिया हर चीज़ को खंघालता है, टटोलता है पर अपने अन्दर शायद ही झाँक कर देखता है। शायद हम सब ऐसे ही हैं। खैर पहले आपको तस्वीर दिखऊं


इस तस्वीर को धयान से देखिये। क्या ऐसी तस्वीर छापना ज़रूरी है? कुछ लोग कहेंगे कि ये एक खिलाड़ी की तस्वीर है, खेलते हुए ही तो होगी, इसमें क्या बुराई है? पर मैं पूछता हूँ, खेलते हुए और भी तो तस्वीरें होंगी और भी कोणों से। फिर यही क्यों? कई वर्षों के बैडमिंटन, टेनिस जैसे खेलों को देखा है। उनकी ख़बरों पर धयान दिया है। पर जब भी किसी महिला टेनिस खिलाड़ी कि तस्वीर देखता हूँ कुछ ऐसी ही झलक मिलती है। चाहे वो स्टेफी ग्राफ का समय हो या अब का समय। कोई उठी टीशर्ट, कोई उछली स्कर्ट, कोई सर्विस का इंतज़ार करती, झुकी हुई खिलाड़ी। क्या और तस्वीरें नहीं उपलब्ध होती हैं? 

और ऐसा भी नहीं था की इस अखबार कंपनी के पास यही एक तस्वीर थी। उसी अखबार कंपनी के अंग्रेजी संस्करण में यही खबर इस तस्वीर के साथ छपी थी 


क्या ये महिलाओं का वस्तुतिकरण नहीं है? क्या मैं ज्यादा सोच रहा हूँ? क्या मेरी मानसिकता विकृत है? अगर बाद की दोनों बातें सही हैं तो कृपया मुझे बताएं। अगर पहली बात सही है तो हमें ये वस्तुतिकरण बंद करना होगा।

मैं इसका दोषी हूँ, हम सब दोषी हैं। 

Wednesday, 19 December 2012

इज्ज़त हमारी लुटी है.......

कल गुजरात और हिमाचल चुनाव के नतीजे आने वाले हैं। इनमें से एक राज्य तो देश की राजनीति और देश का भविष्य तय कर सकता है। हमारे यहाँ के न्यूज़ चैनलों की आदत है की 2 दिन पहले से ही नतीजों का डंका बजाने लगें।

परन्तु कल और आज दिन भर टीवी पर बस एक ही खबर देखी। दिल्ली में कुछ लोगों ने एक चलती बस में एक लड़की के साथ सामूहिक बलात्कार किया। यही नहीं उसकी और उसके पुरुष मित्र की बर्बरता से पिटाई की। लड़की आइ सी यू में मौत से जूझ रही है और किसी तरह जिंदगी के दामन को थामे हुए है। उसके मित्र कि हालत थोड़ी बेहतर है। चोट खाया हुआ है, पर पुलिस की मदद कर रहा है।

ये तो शारीरिक चोटों कि कहानी है, मानसिक चोटों कि तो मैं कल्पना भी नहीं कर सकता।

खैर मेरे के मित्र ने फेसबुक पर लिखा

"आज िफर मन में एक सवाल उठता है, क्या वही समय अच्छा था जब औरतों को घर से निकलने पर पाबंदी थी। आँखों में आँसू तो आज भी है।"

मुझे लगता है कि ज़माना तो यही अच्छा है कि कम से कम उस लड़की को ये आज़ादी थी कि वो आधी रात के आस पास सिनेमा देख सकती थी। उसे आज़ादी थी कि वो अच्छे कॉलेज में अच्छी पढाई कर पा रही थी।
कई लोगों ने कई बातें कहीं। पर मुझे लगता है कि हमारा समाज और हमारा देश आज एक परिवर्तन के दौड़ से गुज़र रहा है। भारत आज एक नहीं है। कई भारत आज बसते हैं इस एक भारत में। और वो सारे भारत अलग अलग जगह नहीं हैं। वो दिल्ली जैसे शहरों में आपस में मिलते हैं, टकराते हैं। जहाँ महिलाओं की इज्ज़त, उनके स्थान, हमारे अस्तित्व के लिए उनकी ज़रुरत को एक भारत ने समझा है, दूसरा भारत अब भी उसे पूरी तरह नहीं समझ पाया है। मुझे लगता है आज आवश्यकता है उस इज्ज़त, उस स्थान, उस अस्तित्व, उस ज़रुरत को हर किसी को समझाने की। हर व्यक्ति, समाज के हर हिस्से को एक सतह पर लाने की।

हमारा देश रंग बिरंगा है। यहाँ अलग अलग विचारों कि आज़ादी है। पर कुछ विषयों पर हमारे विचार एक होने आवश्यक हैं। महिलाओं को सामान मिलना ही चाहिए, समाज के हर हिस्से में। मुझे लगता है कि हम इस विषय पर हिन्दू पर्सनल लॉ या मुस्लिम पर्सनल लॉ का हवाला नहीं दे सकते। हमे हर वर्ग को समझाना होगा और समाज के अंतरमन में महिलाओं के लिए इज्ज़त को लाना होगा।

हमें ये सोचना और समाज को ये समझना बंद करना होगा कि "उस लड़की की इज्ज़त लूट ली गयी।" 'इज्ज़त' समाज से बनती है। हम  खुद जब तक इस धारणा से नहीं उबरेंगे तब तक सज़ा अपराधी को नहीं, जिसके साथ अपराध हुआ है, उसे मिलती रहेगी। अगर किसी की इज्ज़त लुटी है तो उन अपराधियों की, उस लड़की की नहीं। उसे समाज में अब भी वही इज्ज़त मिलनी चाहिए।

मेरे विचार से उपाय का एक हिस्सा ये है।

दूसरा हिस्सा है ऐसे दुष्कर्मियों की सज़ा। मैंने देखा की टीवी पर काफी लोग इन अपराधियों के लिए सज़ाए मौत मांग रहे थे। काफी नेताओं ने भी ये मांग की। यहाँ तक की पकड़े गए एक अपराधी ने भी सजाए मौत कि मांग कर दी। मुझे लगता है ये इन अपराधियों के लिए बहुत ही आसान सज़ा है। एक मिनट में गर्दन टूटी और दर्द से छुटकारा। मुझे लगता है इन जघन्य अपराधियों को उम्र कैद मिलनी चाहिए। और उम्र कैद से मेरा मतलब 14 साल नहीं है। कैद वो जिसमें उम्र निकल जाए। और साधारण उम्र कैद नहीं, ऐसी कैद जिसमें उनसे दिन रात कड़ा काम करवाया जाए। मुझे लगता है उनसे दिन रात लड़कियों के सैंडल और जूते बनवाने जाने चाहिए। उन्हें ऐसी जगह रखा जाए जो नर्क से भी बत्तर हो।  जेल में उनसे अछूतों जैसा व्यवहार करना चाहिए। कहने का अर्थ यह है कि जिंदगी ऐसी जो मौत से भी बत्तर हो। इस तरह इनका उदाहरण बनेगा। जब वो समाज मैं रहेंगे और समाज उनकी कहानी सुनता रहेगा। इतनी आसानी से किस्सा ख़तम नहीं होना चाहिए। लोगों को ये पता चलना चाहिए कि ये मर्द वो जिंदगी झेल रहे हैं जो समाज ऐसी पीड़ा से गुजरी हुई महिलाओं को झेलने पर मजबूर करता है।

और अगर समाज एक हो जाए तो ऐसे अपराधियों को जेल मैं भी बंद करने की ज़रुरत नहीं है। उनको खुला छोड़ देना चाहिए और समाज को उनके साथ वही व्यवहार करना चाहिए जो आज वो 'इज्ज़त लुटी' लड़की के साथ करता है। हमारे गाँव में असामाजिक लोगों का हुक्का-पानी बंद कर दिया जाता है। कोई न बोलता है न चालता है। मुश्किल के वक्त कोई मदद नहीं करता है। ऐसे लोगों की मदद करने वालों का भी हुक्का-पानी बंद कर दिया जाता है। इस परिस्थिति में जिंदगी फिर मौत से बत्तर हो जाती है।

ऐसे लोगों को आसान मौत नहीं मुश्किल जिंदगी की सज़ा मिलनी चाहिए.........

वरना समाज की इज्ज़त लुटती रहेगी और हम कहते रह जायेगे कि इज्ज़त हमारी लुटी है.........

Monday, 17 December 2012

न्याय मित्र

गाँव के छोटे मोटे मामलों का फ़ैसला गाँव मैं ही हो जाएगा। न्याय मित्र। गाँव के मुखिया।
साथ में एक वकील की बहाली। वो देंगें कानूनी मामलों में सलाह।
वकील साहब की तनख्वाह आएगी मुखियाजी के अकाउंट में और वो देंगे वकील साहब को।

"वकील साहब, तनख्वाह आ गई है। जा का ले आइये।"

वकील साहब ने मोटर साइकिल उठाई और हो गए रवाना।

"नमस्कार मुखियाजी! कैसे हाल चाल?"
"बस साहब, दया है आपकी।"

"क्या लेंगे, चाय पानी?"
"जी कुछ नहीं, बस मेरा चेक।"

"जी वो तो आ गया, पर हमारी बात....."
"आपकी कौन सी बात, बस चेक की बात है।"

"जी वो मोबाइल की बात थी।"
"अच्छा मोबाइल देने की ही तो बात थी, दे देंगे।"

"दरअसल एक मोबाइल देख रखा था, बारह हज़ार का।"
"अरे!!!!! बारह हज़ार ही क्यों, डेढ़ लाख का लीजिये।"
"तेंतीस हज़ार मेरे और जो बाकि बचा वो घर, ज़मीन, भैंस बेचकर इकठ्ठा कर लो (बात के लहज़े में परिवर्तन नोट करें)। कम से कम इलाके में तो नाम होगा।"

"अरे अरे! आप तो बुरा मान गए।"
"रे सार!!! तू तारी बेचे वाला, ऊहो पानी मिला के, तू बारह हज़ार के मोबाइल रखब।" "चैक निकाला अ तू जा भैंसी चरावा।"

वकील साहब चेक ले के बहार जाते हुए।

पड़ोसी।
"का बात वकील साहब, सब बात फैनल हो गईल।"
"फैनल की होइक बा, मुखिया जी का जा के कह देयें की हमार तेतीस हज़ार रुपैया निकलीं न ते केस-ऊस हो जाईल।"

नोट: मोबाइल की चक्कर में मुखियाजी वकील साहब से रिसीविंग लेना भूल गए, मतलब एक तरह से वकील साहब को पैसा ही नहीं मिला है और मुखियाजी फंस सकते हैं।

बाबूजी का बचपन

कल बाबूजी ने एक कागज़ रख दिया मेरे निकट।

मैंने पूछा, "क्या है ये बाबूजी?"

बाबूजी ने कागज़ पलटा और बोले, "फ़ोन का बिल है।" "इन्टरनेट से जमा करना है।"

मुझे याद है पिछले महीने भी इन्टरनेट से ही बिल जमा करवाया था। इसी काम के लिए हाल ही में काफी पापड़ बेलने के बाद बाबूजी ने अपने बैंक से इन्टरनेट बैंकिंग की सुविधा भी हासिल की। खैर पिछले महीने हमने साथ में बैठ कर बिल जमा किया था। और बाबूजी को अच्छे से पूरी प्रक्रिया भी समझाई थी। शायद आज फिर समझाना पड़े और शायद अगली बार भी।

खैर मैं भी अपने कंप्यूटर पर काम कर रहा था। बिना सर उठाये कह दिया बाबूजी को, "आपको तो पता ही है कैसे करना है। कर लीजिये।"

बस बाबूजी ने सारे कागज़ (फ़ोन का बिल, इन्टरनेट बैंकिंग का लेख जोखा) लिए और बैठ गए अपने लैपटॉप के सामने। बी एस एन एल की वेबसाइट खोली और लग गए कोशिश में। मुझे एहसास था कि उनको परेशानी होगी पर बचपन वाला उनका सबक याद आ गया। मैथ का हिंसाब न आने पर भी वो हमें करने देते थे कोशिश। जब कोशिश कर कर के हम छक जाते तब बाबूजी आते और अच्छे से स्टेप बाय स्टेप हिसाब समझाते। सो बाबूजी से सीखी प्रक्रिया का बाबूजी पर इस्तेमाल किया।

मैं काम में लगा रहा। बाबूजी ने वेबसाइट खोली और उसपर लिखी चीज़ें पढने लागे। कुछ अकाउंट की बातें, कुछ आटोमेटिक बिल भरने की बातें। मुझे थोडा शक हुआ की शायद वो किसी और वेबसाइट पर हैं परन्तु इन बातों से वो जाता रहा। खैर 5-10 मिनट तक बाबूजी ने वेब पेज के साथ कुश्ती लड़ी। फिर हार कर लैपटॉप मेरे पास ले आये। मुझे भी याद आया कैसे बचपन में हार कर कॉपी किताब लेकर पहुच जाते थे हम बाबूजी के पास। लैपटॉप में देखा तो फ़ोन कंपनी की बजाय किसी बैंक की वेबसाइट में उलझे हुए थे। यह देख कर फणीश्वर नाथ रेणु की पांचलाइट की बात याद आ गयी।

"इस कल कब्ज़े वाली चीज़ को कौन बाले।"

और याद आ गए बचपन के वो दिन जब हवा से पन्ना पलट जाता था और हम दिए गए सवाल से नहीं किसी और ही सवाल से जूझ रहे होते थे। स्टेप बाय स्टेप में बाबूजी ने एक स्टेप गलत ले लिया था। एड्रेस बार की बजाय वेब एड्रेस को सर्च बार मैं टाइप कर दिया था और फिर गलती से बैंक की वेबसाइट को क्लिक कर दिया। मेरे पास आकर बैठते ही अपनी गलती को खुद पकड़ लिया उन्होंने, जैसे उनके पास कॉपी रखते ही हमें अपनी गलती का खुद एहसास हो जाता था।

खीर फिर स्टेप बाय स्टेप हम दोनों ने मिलकर, फिसलते सँभालते (आज कल प्रक्रिया बड़ी ही दुर्गम हो गयी है) बिल भरा। बाबूजी अब समझ गए थे प्रक्रिया को। शायद अगले महीने खुद कर लेंगे।

बाद में माँ ने चुपके से मेरे पास आकर कहा, "इनसे नहीं होगा, अगले महीने भी तुमसे ही भरवाएंगे।"

शायद मेरे पास ही आयेंगे। शायद खुद बाज़ी मार जाएँगे। 

Saturday, 15 December 2012

तुम हो कौन बे

सुना है आज कल एक पडोसी देश (जिनसे हमारा बहुत पुराना दोस्ताना रहा है) के मंत्री भारत आए हुए हैं। पुरानी दोस्ती को और गहरा करना चाहते हैं शायद। सुना है कुछ समझौते किये हैं। दोनों देशों के लोगों का एक दूसरे से मिलना और आसान हो गया है। और भी कई अच्छी अच्छी बातें हुई। बड़ा ही बढ़िया माहौल बन रहा है।

कल हमारे एक मंत्रीजी के साथ, इसी माहौल में, उन महाशय ने चर्चाएँ कीं और उसके बाद संवाददाताओं से बात चीत की। संवाददाताओं ने शायद उनसे आतंकवाद के बारे में कोई सवाल पूछा। (शायद ऐसा इसलिए क्योंकि उनका देश आतंकवाद के मामले में दुनिया में अग्रिणी है। जी फैलाने के मामले में नहीं, दुनियाँ को बचाने के मामले में।) खैर महाशय का कहना था कि वे 11/9 (दुनिया के  ताकतवर देश पर हमला), नासमझ एक्सप्रेस (हमारे उनके देश बीच चलने वाली एक ट्रेन में ब्लास्ट), वन डे ब्लास्ट (हमारे देश के एक महानगर में कई साल पहले हुए भयंकर धमाके) या शाबरी मस्जिद (एक ऐतिहासिक मस्जिद को देश के कुछ लोगों ने गिरा दिया) जैसे मामले नहीं चाहते हैं।

बहुत बढ़िया बात कह दी उन्होंने। कौन चाहता है लड़ाई झगड़ा? कौन चाहता है मार काट? कौन चाहता है भाई भाई में झगडा? लेकिन मैं बड़े प्रेम से उनसे पूछना चाहता हूँ कि शाबरी मस्जिद के बारे में बोलने वाले तुम कौन होते हो बे। ये हमारे देश का आंतरिक मामला है। बाकी जिन मामलों के साथ लिस्ट में इस मामले को डाल दिया है वो सब 2-3 देशों के बीच का मामला है। बाकि सब आतंकी मामले हैं और ये सामुदायिक। और तुम इन सब को एक ही सांस में गिना रहे हो। तुम्हें मंत्री बना किसने दिया।

खैर इससे भी ख़ास बात ये है कि हमारे देश के एक वरिष्ठ मंत्री उनके साथ बैठे थे पर कोई विरोध ज़ाहिर नहीं किया उन्होंने। उस वाकये के बाद हमारे देश की सरकार ने भी कोई विरोध नहीं ज़ाहिर किया है अभी तक। नेता किसने बना दिया इन लोगों को। ओह सॉरी, भूल गया, हम ही लोगों ने तो बनाया।

वैसे पडोसी महाशय को एक राय भी देना चाहता हूँ (बिन मांगे राय देना हम लोगों कि पुरानी आदत है) कि वो हमारी गलतियाँ चुपके से गिना के फालतू की पॉलिटिक्स करना छोड़ें और उनके देश की दुनियाभर में आतंकवाद के मामले में जो शाख मजबूत हो रही है उसकी चिंता करें। आतंकवाद फैलाने के मामले में नहीं, दुनियाँ को उससे बचाने के मामले में।  और हमारे देश के मामले हम पर छोड़ दें वरना हम तो कहेंगे कि मान्यवर, तुम कौन हो बे।  

Thursday, 6 December 2012

संसद में सराबोर

कल दिन भर संसद की चर्चा में सराबोर रहा। काफी अच्छे भाषण सुने। कुछ नोक झोक देखी। कुछ का यलगार, कुछ का पलटवार देखे । कुछ मज़ा और कुछ ज्ञान पाया।

बोलते वक्त ज्यादा नेताओं और पार्टियों ने एटम बम फोड़े लेकिन मतदान के वक्त कुछ फिसफिसाते हुए संसद से निकल लिए। ऐसे फिसड्डी नेताओं ने संसद के बहार आके अपने बचाओ में कुछ छुरछुरियां छोड़ीं। सुनने में आया कि ये लोग धर्मनिरपेक्षता का झंडा उठाये घूम रहे थे। पर समझ में नहीं आया कि जिन किसानों या आम आदमियों की बुराई और भलाई कि बात हो रही थी उनका धर्मनिरपेक्षता से क्या रिश्ता?

एक मोहतरमा कुछ कह रहीं थीं। बीच में उनके ही राज्य के एक भाई साहब बोल पड़े। बस फिर क्या, दोनों में शुरू हो गई नोक झोक। नोक झोक मेरे ब्लॉग के नाम में बदल गई। इतने पर रुके नहीं, इससे भी बढ़े। याद आ गए अपने गाँव के टोले के वो झगड़े जहाँ औरत मर्द सब गली में निकल जाते हैं और लोक लाज भूल कल बातों का बतंगड़ बनाने लगते हैं। खैर, ये देख कर ख़ुशी हुई की हमारे सांसद भी हमारी ही तरह मिट्टी के बने हुए हैं, हमारे ही गांवों से आए हैं, हमारे ही टोले जैसे हैं। अपनापन फील करा दित्ता बाय गॉड।

हमारे इलाके के एक सांसद, जो पहले हमारे राज्य के मुखिया भी होते थे, भी बोले। बड़े मजाकिया किस्म के हैं बाय गॉड। हमेशा कुलबुलाते चुल्बुलाते रहते हैं। कल भी चुल्बुलाए। फिर कुछ साथी सांसदों, जिनका अंदाज़ चुटकट्टों जैसा था, ने उनपर कुछ छीटाकशी कर दी। बस कुलबुला गए। आनन् फानन में कुछ ऐसा कह दिया जो असंसदीय मान लिया गया। हो हल्ला शुरू। संसद 5 मिनट के लिए स्थगित। चुलबुल बाबू को माफ़ी मांगनी पड़ी, अपने शब्द खाने पड़े, फिर जाके बात आगे बढ़ी। पर अंत अंत तक माने नहीं। चुल्बुलाते हुए एक महिला सांसद पर एक सस्ता शेर फेक दिया। खैर उसका जवाब भी बाद में चुलबुल बाबू को तीखा मिला।

कुल मिलाके, दिन बड़ा की आनंददायक रहा। मुझे लगता है लोकसभा टीवी की टी आर पी सबसे मज़बूत होनी चाहिए।  कौन से चैनेल की सास बहुएँ हमारे संसद की सास बहुओं का सामना करेंगी। कौन टाइगर और कौन गजनी टिकेगा इनके सामने। कौन सचिन और कौन पोंटिंग करेगा मुकाबला (शायद इसीलिए अब क्रिकेट पिच छोड़ के लोकसभा पिच मैं चले). भाई मस्त एंटरटेनमेंट है।

आज फिर रहूँगा संसद में सराबोर.........  

Tuesday, 4 December 2012

हेमा, रेखा, जया और सुषमा

कल टीवी पर एक सिनेमा देख रहा था। बीच में ब्रेक हुआ। कुछ प्रचार आने शुरू हुए। आम तौर पर आपलोगों की तरह प्रचार आने पर मैं भी चैनल बदल देता हूँ। पर आज सिनेमा के साथ साथ कुछ काम भी कर रहा था। सो इतना ध्यान नहीं दिया। सर उठा कर टीवी की ओर देखा तो एक छोटी एम्बुलेंस फंसी हुई थी कीचड़ में। आस पास लोगों की भीड़ इकट्ठा थी, जो पुरुष बाहुल्य लगी मुझे। कोई मदद नहीं कर रहा था एम्बुलेंस को कीचड से निकालने में।

तभी पीछे से भीड़ को तोड़ती हुई 3 महिलायें आईं। एक ने नीली और बैगनी साड़ी पहन रखी थी, दूसरी हरे लिबास में थी, तीसरी ने नीला टॉप और सफ़ेद पैंट पहन रखा था और चौथी सफ़ेद सूट में थी। चारों ने आस पास खड़े मर्दों की ओर लानत भरी निगाह से देखा और घुस पड़ीं कीचड़ में। तब तक किनारे पर खड़े एक महाशय अपने सूट पर पड़े कीचड़ के छीटे  हटाने में व्यस्त थे। चारों महिलायें एम्बुलेंस के पीछे अड़ गयीं और अपना नारीत्व दिखाते हुए उसे धक्का लगाने लगीं।

मैंने यहाँ नारीत्व शब्द इसलिए प्रयोग किया है क्योंकि मुझे लगता है कि ऐसे मौकों पर पुरुषत्व या पौरुष शब्द का प्रयोग सही नहीं है। ये शब्द जो पुरुषों के बल को दर्शाने के लिए प्रयुक्त होते हैं, नारियों के साथ भेदभाव करते हैं। नारियों के लिए ऐसे शब्द नहीं हैं। इसलिए आज नारित्वा को हिम्मत और बल से जोड़ रहा हूँ। 

बस होना क्या था? देखते ही देखते एम्बुलेंस के चक्के घूमे। खीचड़ उड़ के चरों महिलाओं पर गिड़ा और एम्बुलेंस गंगानाती हुई कीचड़ से बाहर। चरों कीचड में सन गईं और मुंह हाँथ पोंछते हुए बाहर निकलीं पर इतने निठल्ले मर्दों के सामने उन्हों एम्बुलेंस को कीचड़ से निकाल दिया। तब मुझे मालुम चला की इन महान युवतियों के नाम  हेमा, रेखा, जया और सुषमा हैं। जय हो हेमा जी की। जय हो रेखा जी की। जय हो जया जी की। जय हो सुषमा जी की। जय हो नारी की। जय हो नारीत्व की।

ये प्रचार था एक कपड़े धोने वाले पाउडर का। मुझे बड़ा अच्छा लगा कि इसमें नारी के नारित्वा की महिमा को इस प्रकार दर्शाया गया है। पर मुझे लगता है कि यह प्रचार अधूरा रह गया। वो महाशय जो पहले अपने सूट पर से कीचड़ के छीटे हटा रहे थे उनके बारे में नहीं दिखाया। खैर मैं बताता हूँ।

वो घर गए। घर पर बीवी ने उनके सूट की हालत देखी। बस उनका नारित्व उफान मारने लगा। बरस पड़ीं बेचारे पर। कहने लगीं,"मेरा काम करते करते दम निकलता है पूरे दिन और तुम हो कि कीचड़ में खेल कर आ रहे हो। शर्म नहीं आती तुम्हें। ये साफ़ कौन करेगा।"
सूट वाले भाई साब ने मिमियाते हुए कहा,"जी मैं।"
बीवी ने कहा,"जाओ साफ़ करो। और हाँ, जाते जाते मेरी वो साड़ी भी ले कर जाओ।"

जनाब ये तो हालत थी सूट वाले भाई साब की जब वो साइड में खड़े थे और कीचड़ के कुछ छीटे उड़ कर उन पर स्थापित हो गए। न जाने कीचड़ में घुस के एम्बुलेंस को धक्का लगा देते तो क्या हश्र होता। शायद घर की इन्हीं नारियों के नारित्वा के डर से बाकी सारे पुरुष भी कीचड़ में नहीं उतरे। वरना घर आके दीपा, शीतल, कमला और विमला , उनकी पूरी खबर लेतीं। इससे अच्छा तो बहार हेमा, रेखा, जया और सुषमा के नारीत्व को चलने दो और घर पर दीपा, शीतल, कमला और विमला के नारीत्व से बच जाओ।

बस इल्तजा है आप लोगों से की उन कीचड के किनारे खरे मर्दों पर इतनी लानत न डालिए। उन बेचारों के तो आगे कीचड़ था और उसके आगे खाई।

जय हो हेमा जी की। जय हो रेखा जी की। जय हो जया जी की। जय हो सुषमा जी की। जय हो नारी की। जय हो नारीत्व की।