Tuesday, 4 December 2012

हेमा, रेखा, जया और सुषमा

कल टीवी पर एक सिनेमा देख रहा था। बीच में ब्रेक हुआ। कुछ प्रचार आने शुरू हुए। आम तौर पर आपलोगों की तरह प्रचार आने पर मैं भी चैनल बदल देता हूँ। पर आज सिनेमा के साथ साथ कुछ काम भी कर रहा था। सो इतना ध्यान नहीं दिया। सर उठा कर टीवी की ओर देखा तो एक छोटी एम्बुलेंस फंसी हुई थी कीचड़ में। आस पास लोगों की भीड़ इकट्ठा थी, जो पुरुष बाहुल्य लगी मुझे। कोई मदद नहीं कर रहा था एम्बुलेंस को कीचड से निकालने में।

तभी पीछे से भीड़ को तोड़ती हुई 3 महिलायें आईं। एक ने नीली और बैगनी साड़ी पहन रखी थी, दूसरी हरे लिबास में थी, तीसरी ने नीला टॉप और सफ़ेद पैंट पहन रखा था और चौथी सफ़ेद सूट में थी। चारों ने आस पास खड़े मर्दों की ओर लानत भरी निगाह से देखा और घुस पड़ीं कीचड़ में। तब तक किनारे पर खड़े एक महाशय अपने सूट पर पड़े कीचड़ के छीटे  हटाने में व्यस्त थे। चारों महिलायें एम्बुलेंस के पीछे अड़ गयीं और अपना नारीत्व दिखाते हुए उसे धक्का लगाने लगीं।

मैंने यहाँ नारीत्व शब्द इसलिए प्रयोग किया है क्योंकि मुझे लगता है कि ऐसे मौकों पर पुरुषत्व या पौरुष शब्द का प्रयोग सही नहीं है। ये शब्द जो पुरुषों के बल को दर्शाने के लिए प्रयुक्त होते हैं, नारियों के साथ भेदभाव करते हैं। नारियों के लिए ऐसे शब्द नहीं हैं। इसलिए आज नारित्वा को हिम्मत और बल से जोड़ रहा हूँ। 

बस होना क्या था? देखते ही देखते एम्बुलेंस के चक्के घूमे। खीचड़ उड़ के चरों महिलाओं पर गिड़ा और एम्बुलेंस गंगानाती हुई कीचड़ से बाहर। चरों कीचड में सन गईं और मुंह हाँथ पोंछते हुए बाहर निकलीं पर इतने निठल्ले मर्दों के सामने उन्हों एम्बुलेंस को कीचड़ से निकाल दिया। तब मुझे मालुम चला की इन महान युवतियों के नाम  हेमा, रेखा, जया और सुषमा हैं। जय हो हेमा जी की। जय हो रेखा जी की। जय हो जया जी की। जय हो सुषमा जी की। जय हो नारी की। जय हो नारीत्व की।

ये प्रचार था एक कपड़े धोने वाले पाउडर का। मुझे बड़ा अच्छा लगा कि इसमें नारी के नारित्वा की महिमा को इस प्रकार दर्शाया गया है। पर मुझे लगता है कि यह प्रचार अधूरा रह गया। वो महाशय जो पहले अपने सूट पर से कीचड़ के छीटे हटा रहे थे उनके बारे में नहीं दिखाया। खैर मैं बताता हूँ।

वो घर गए। घर पर बीवी ने उनके सूट की हालत देखी। बस उनका नारित्व उफान मारने लगा। बरस पड़ीं बेचारे पर। कहने लगीं,"मेरा काम करते करते दम निकलता है पूरे दिन और तुम हो कि कीचड़ में खेल कर आ रहे हो। शर्म नहीं आती तुम्हें। ये साफ़ कौन करेगा।"
सूट वाले भाई साब ने मिमियाते हुए कहा,"जी मैं।"
बीवी ने कहा,"जाओ साफ़ करो। और हाँ, जाते जाते मेरी वो साड़ी भी ले कर जाओ।"

जनाब ये तो हालत थी सूट वाले भाई साब की जब वो साइड में खड़े थे और कीचड़ के कुछ छीटे उड़ कर उन पर स्थापित हो गए। न जाने कीचड़ में घुस के एम्बुलेंस को धक्का लगा देते तो क्या हश्र होता। शायद घर की इन्हीं नारियों के नारित्वा के डर से बाकी सारे पुरुष भी कीचड़ में नहीं उतरे। वरना घर आके दीपा, शीतल, कमला और विमला , उनकी पूरी खबर लेतीं। इससे अच्छा तो बहार हेमा, रेखा, जया और सुषमा के नारीत्व को चलने दो और घर पर दीपा, शीतल, कमला और विमला के नारीत्व से बच जाओ।

बस इल्तजा है आप लोगों से की उन कीचड के किनारे खरे मर्दों पर इतनी लानत न डालिए। उन बेचारों के तो आगे कीचड़ था और उसके आगे खाई।

जय हो हेमा जी की। जय हो रेखा जी की। जय हो जया जी की। जय हो सुषमा जी की। जय हो नारी की। जय हो नारीत्व की। 

2 comments: