Saturday, 15 December 2012

तुम हो कौन बे

सुना है आज कल एक पडोसी देश (जिनसे हमारा बहुत पुराना दोस्ताना रहा है) के मंत्री भारत आए हुए हैं। पुरानी दोस्ती को और गहरा करना चाहते हैं शायद। सुना है कुछ समझौते किये हैं। दोनों देशों के लोगों का एक दूसरे से मिलना और आसान हो गया है। और भी कई अच्छी अच्छी बातें हुई। बड़ा ही बढ़िया माहौल बन रहा है।

कल हमारे एक मंत्रीजी के साथ, इसी माहौल में, उन महाशय ने चर्चाएँ कीं और उसके बाद संवाददाताओं से बात चीत की। संवाददाताओं ने शायद उनसे आतंकवाद के बारे में कोई सवाल पूछा। (शायद ऐसा इसलिए क्योंकि उनका देश आतंकवाद के मामले में दुनिया में अग्रिणी है। जी फैलाने के मामले में नहीं, दुनियाँ को बचाने के मामले में।) खैर महाशय का कहना था कि वे 11/9 (दुनिया के  ताकतवर देश पर हमला), नासमझ एक्सप्रेस (हमारे उनके देश बीच चलने वाली एक ट्रेन में ब्लास्ट), वन डे ब्लास्ट (हमारे देश के एक महानगर में कई साल पहले हुए भयंकर धमाके) या शाबरी मस्जिद (एक ऐतिहासिक मस्जिद को देश के कुछ लोगों ने गिरा दिया) जैसे मामले नहीं चाहते हैं।

बहुत बढ़िया बात कह दी उन्होंने। कौन चाहता है लड़ाई झगड़ा? कौन चाहता है मार काट? कौन चाहता है भाई भाई में झगडा? लेकिन मैं बड़े प्रेम से उनसे पूछना चाहता हूँ कि शाबरी मस्जिद के बारे में बोलने वाले तुम कौन होते हो बे। ये हमारे देश का आंतरिक मामला है। बाकी जिन मामलों के साथ लिस्ट में इस मामले को डाल दिया है वो सब 2-3 देशों के बीच का मामला है। बाकि सब आतंकी मामले हैं और ये सामुदायिक। और तुम इन सब को एक ही सांस में गिना रहे हो। तुम्हें मंत्री बना किसने दिया।

खैर इससे भी ख़ास बात ये है कि हमारे देश के एक वरिष्ठ मंत्री उनके साथ बैठे थे पर कोई विरोध ज़ाहिर नहीं किया उन्होंने। उस वाकये के बाद हमारे देश की सरकार ने भी कोई विरोध नहीं ज़ाहिर किया है अभी तक। नेता किसने बना दिया इन लोगों को। ओह सॉरी, भूल गया, हम ही लोगों ने तो बनाया।

वैसे पडोसी महाशय को एक राय भी देना चाहता हूँ (बिन मांगे राय देना हम लोगों कि पुरानी आदत है) कि वो हमारी गलतियाँ चुपके से गिना के फालतू की पॉलिटिक्स करना छोड़ें और उनके देश की दुनियाभर में आतंकवाद के मामले में जो शाख मजबूत हो रही है उसकी चिंता करें। आतंकवाद फैलाने के मामले में नहीं, दुनियाँ को उससे बचाने के मामले में।  और हमारे देश के मामले हम पर छोड़ दें वरना हम तो कहेंगे कि मान्यवर, तुम कौन हो बे।  

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