Monday, 17 December 2012

बाबूजी का बचपन

कल बाबूजी ने एक कागज़ रख दिया मेरे निकट।

मैंने पूछा, "क्या है ये बाबूजी?"

बाबूजी ने कागज़ पलटा और बोले, "फ़ोन का बिल है।" "इन्टरनेट से जमा करना है।"

मुझे याद है पिछले महीने भी इन्टरनेट से ही बिल जमा करवाया था। इसी काम के लिए हाल ही में काफी पापड़ बेलने के बाद बाबूजी ने अपने बैंक से इन्टरनेट बैंकिंग की सुविधा भी हासिल की। खैर पिछले महीने हमने साथ में बैठ कर बिल जमा किया था। और बाबूजी को अच्छे से पूरी प्रक्रिया भी समझाई थी। शायद आज फिर समझाना पड़े और शायद अगली बार भी।

खैर मैं भी अपने कंप्यूटर पर काम कर रहा था। बिना सर उठाये कह दिया बाबूजी को, "आपको तो पता ही है कैसे करना है। कर लीजिये।"

बस बाबूजी ने सारे कागज़ (फ़ोन का बिल, इन्टरनेट बैंकिंग का लेख जोखा) लिए और बैठ गए अपने लैपटॉप के सामने। बी एस एन एल की वेबसाइट खोली और लग गए कोशिश में। मुझे एहसास था कि उनको परेशानी होगी पर बचपन वाला उनका सबक याद आ गया। मैथ का हिंसाब न आने पर भी वो हमें करने देते थे कोशिश। जब कोशिश कर कर के हम छक जाते तब बाबूजी आते और अच्छे से स्टेप बाय स्टेप हिसाब समझाते। सो बाबूजी से सीखी प्रक्रिया का बाबूजी पर इस्तेमाल किया।

मैं काम में लगा रहा। बाबूजी ने वेबसाइट खोली और उसपर लिखी चीज़ें पढने लागे। कुछ अकाउंट की बातें, कुछ आटोमेटिक बिल भरने की बातें। मुझे थोडा शक हुआ की शायद वो किसी और वेबसाइट पर हैं परन्तु इन बातों से वो जाता रहा। खैर 5-10 मिनट तक बाबूजी ने वेब पेज के साथ कुश्ती लड़ी। फिर हार कर लैपटॉप मेरे पास ले आये। मुझे भी याद आया कैसे बचपन में हार कर कॉपी किताब लेकर पहुच जाते थे हम बाबूजी के पास। लैपटॉप में देखा तो फ़ोन कंपनी की बजाय किसी बैंक की वेबसाइट में उलझे हुए थे। यह देख कर फणीश्वर नाथ रेणु की पांचलाइट की बात याद आ गयी।

"इस कल कब्ज़े वाली चीज़ को कौन बाले।"

और याद आ गए बचपन के वो दिन जब हवा से पन्ना पलट जाता था और हम दिए गए सवाल से नहीं किसी और ही सवाल से जूझ रहे होते थे। स्टेप बाय स्टेप में बाबूजी ने एक स्टेप गलत ले लिया था। एड्रेस बार की बजाय वेब एड्रेस को सर्च बार मैं टाइप कर दिया था और फिर गलती से बैंक की वेबसाइट को क्लिक कर दिया। मेरे पास आकर बैठते ही अपनी गलती को खुद पकड़ लिया उन्होंने, जैसे उनके पास कॉपी रखते ही हमें अपनी गलती का खुद एहसास हो जाता था।

खीर फिर स्टेप बाय स्टेप हम दोनों ने मिलकर, फिसलते सँभालते (आज कल प्रक्रिया बड़ी ही दुर्गम हो गयी है) बिल भरा। बाबूजी अब समझ गए थे प्रक्रिया को। शायद अगले महीने खुद कर लेंगे।

बाद में माँ ने चुपके से मेरे पास आकर कहा, "इनसे नहीं होगा, अगले महीने भी तुमसे ही भरवाएंगे।"

शायद मेरे पास ही आयेंगे। शायद खुद बाज़ी मार जाएँगे। 

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