Thursday, 20 December 2012

मैं इसका दोषी हूँ, हम सब दोषी हैं

 कल टीवी पर एक चर्चा देख रहा था। विषय दिल्ली में हुए उस जघन्य अपराध का था, एक लड़की के साथ सामूहिक बलात्कार। शायद आज निकलने वाले गुजरात और हिमाचल चुनावों के परिणामों से पहले ये आखरी चर्चा थी। आज सुबह से टीवी पर बस चुनाव है। वैसे चैनलों की एक बड़ाई करनी होगी कि चुनावी परिणामों के इस हल्लम हल्ला के बीच भी उन्होंने उस अपराध से जुड़ी एक खबर दिखाने का समय निकाल लिया। लड़की कि हालत में सुधार है पर अभी 10 दिनों तक कुछ कहा नहीं जा सकता।

खैर कल की चर्चा पर लौटते हैं। उसमें महिला के वस्तुतिकरण का भी मुद्दा उठा। कैसे हम एक महिला को एक चीज़ या वास्तु समझ लेते हैं। आज मुझे अपने कॉलेज के दिन याद आ गए। शायद मज़ाक के लहज़े में ही, पर हम लड़कियों को देख कर आपस में बात करते थे

"वाह क्या माल है यार"
"वाह क्या चीज़ है यार"

कभी किसी लड़की से यह कहने की हिम्मत न हुई, पर आपस में कई बार इन वाक्यों का प्रयोग किया। ये शर्म की बात है। बिना सोचे, बिना समझे और बिना इसका परिणाम जाने, हमने हमेशा महिला का वस्तुतिकरण कर दिया। आज समझता हूँ कि ये सारे कारण आगे जुड़ कर महिलाओं का समाज में स्थान गिराने के कारण बनते हैं।

पर कल के पोस्ट के बाद आज मीडिया की बात उठाना चाहता हूँ। वैसे तो हम सब मीडिया के हिस्से हैं (सोशल मीडिया) लेकिन मैं पारंपरिक मीडिया कि बात करना चाहता हूँ।

हमारे यहाँ एक हिंदी अखबार आता है। आज उसमें साइना नेहवाल से जुड़ी एक खबर आई थी। घायल होने के कारण उन्हें एक मैच छोड़ना पड़ा। उसके साथ एक तस्वीर थी। वो तस्वीर देख कर महिलाओं के वास्तुतिकरण कि बात याद आ गई। मीडिया हर चीज़ को खंघालता है, टटोलता है पर अपने अन्दर शायद ही झाँक कर देखता है। शायद हम सब ऐसे ही हैं। खैर पहले आपको तस्वीर दिखऊं


इस तस्वीर को धयान से देखिये। क्या ऐसी तस्वीर छापना ज़रूरी है? कुछ लोग कहेंगे कि ये एक खिलाड़ी की तस्वीर है, खेलते हुए ही तो होगी, इसमें क्या बुराई है? पर मैं पूछता हूँ, खेलते हुए और भी तो तस्वीरें होंगी और भी कोणों से। फिर यही क्यों? कई वर्षों के बैडमिंटन, टेनिस जैसे खेलों को देखा है। उनकी ख़बरों पर धयान दिया है। पर जब भी किसी महिला टेनिस खिलाड़ी कि तस्वीर देखता हूँ कुछ ऐसी ही झलक मिलती है। चाहे वो स्टेफी ग्राफ का समय हो या अब का समय। कोई उठी टीशर्ट, कोई उछली स्कर्ट, कोई सर्विस का इंतज़ार करती, झुकी हुई खिलाड़ी। क्या और तस्वीरें नहीं उपलब्ध होती हैं? 

और ऐसा भी नहीं था की इस अखबार कंपनी के पास यही एक तस्वीर थी। उसी अखबार कंपनी के अंग्रेजी संस्करण में यही खबर इस तस्वीर के साथ छपी थी 


क्या ये महिलाओं का वस्तुतिकरण नहीं है? क्या मैं ज्यादा सोच रहा हूँ? क्या मेरी मानसिकता विकृत है? अगर बाद की दोनों बातें सही हैं तो कृपया मुझे बताएं। अगर पहली बात सही है तो हमें ये वस्तुतिकरण बंद करना होगा।

मैं इसका दोषी हूँ, हम सब दोषी हैं। 

2 comments:

  1. यह अवसर सवाल उठाने का ही है, जवाब बेशक न मिलें।
    फ़िलहाल इतना ही कहता हूँ कि हाँ, हम सब दोषी हैं।

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    1. दोषी हम हैं, जवाब भी हमें ही निकालने पड़ेंगे

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