Saturday, 22 December 2012

क्या ऐसे बदलेगा देश

मुझे लगता है कि आज कल घर में काफी समय बिता रहा हूँ। पिछले 3-4 दिन से हर पोस्ट में टीवी की कोई न कोई बात होती है। आज भी है। खैर आलसी (मेरे जैसे) को कौन हिला सकता है?

आज टीवी पर ख़बरें देख कर देश कि स्थिति दयनीय लग रही है। नागरिक सुरक्षित नहीं हैं। सुरक्षा की कमी ने लोगों को विरोध प्रदर्शन करने पर मजबूर कर दिया है। सुबह से सारे न्यूज़ चैनल रायसेना हिल्स के पास होने वाले प्रदर्शनों को दिखा रहे हैं और कह रहे हैं कि आज 'देश' का गुस्सा फूट पड़ा है। बहुत सह लिया 'देश' ने। ट्विटर और फेसबुक जैसी वेबसाइटओं पर भी 'देश' का गुस्सा फूट रहा है। लोग ट्वीट कर कर के गुस्सा जता रहे हैं। 'देश' गुस्सा जता रहा है।

जिस तरह की घिनौनी हरकत दिल्ली में पिछले दिनों हुई उसके लिए फंसी की सज़ा की माँग हो रही है। देश के अभी के कानून के हिसाब से ज्यादा से ज्यादा उम्रकैद हो सकती है। माने 14 साल। लोग कानून बदलने की माँग कर रहे हैं। कुछ का कहना है कि उनको इन्साफ चाहिए और इन्साफ फांसी से ही मिलेगा। इन्साफ लिए बिना वो धरना प्रदर्शन ख़त्म नहीं करने वाले हैं। अभी कोर्ट में केस शुरू भी नहीं हुआ है। थोड़े समय बैठना पड़ेगा पड़ेगा शायद उनको। और कोर्ट का फैसला शायद उनको और हमको इन्साफ भी न लगे।

अभी अभी खबर आई कि सरकार कानून में संसोधन का प्रस्ताव लाने के लिए राज़ी हो गई है और 'देश' को इसके बारे में जल्दी बताया जा सकता है। कानून में परिवर्तन लाने के लिए संसद का विशेष सत्र बुलाया जा सकता है। कानून 'देश' के लिए बदला जा सकता है।

मेरा कुछ सवाल हैं इन सब के बीच। क्या ऐसे बदलेगा देश? क्या सरकार नागरिकों को सुरक्षित नहीं कर पाएगी? क्या लोग ऐसे ही विरोध प्रदर्शन करते रहेंगे?

पर इससे भी बड़ी बात क्या दिल्ली में प्रदर्शन करने वाले ये 5-10000 लोग ही 'देश' हैं? मैं तो नहीं चाहता इन अपराधियों के लिए फंसी की सजा। मेरा विचार है कि उम्र कैद के नियम को बदलना चाहिए। 14 साल नहीं, सच में उम्र कैद मिलना चाहिए। और इन अपराधियों को उम्र भर की कड़ी उम्र कैद मिलनी चाहिए। मैं भी इस 'देश' का हिस्सा हूँ। क्या मेरा विचार मायने नहीं रखता? क्या हम जल्दबाजी में क़ानून बदल देंगे? मेरे विचार से कानून बदलने से पहले ठंढे दिमाग से व्यापक चर्चा होनी चाहिए। वरना दिल्ली के इस गरम माहौल को देख कर हमारे नेता नेताबाज़ी के चक्कर मैं हड़बड़ी मैं क़ानून बदल देंगे और उन 10000 लोगों की माँग का भुगतान भरना पड़ेगा पूरे देश को।

और हाँ, इस एक केस में फंसी हो जाने से हमारे देश की महिलाओं के लिए कुछ ख़ास नहीं बदलेगा। मैं फिर कहूँगा कि इसके लिए व्यापक सामाजिक परिवर्तन की आवश्यकता है। इस बात को सबसे पहले महिलाओं को समझना होगा। और शहरों के लड़कों लड़कियों को शहरों से निकल कल देश के बाकी हिस्सों में सामाजिक परिवर्तन के लिए काम करना पड़ेगा। परिवर्तन सिर्फ रायसेन हिल्स पर सप्ताहांत में धरना देने से नहीं आएगा। देश में परिवर्तन लाना होगा। और देश सिर्फ दिल्ली नहीं हैं। मेरा छोटा सा शहर और उससे भी छोटा गाँव भी इस देश का ही हिस्सा हैं।

क्या इस हड़बड़ी और गरमजोशी से काम चलेगा? क्या ऐसे बदलेगा देश? 

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