Tuesday, 25 December 2012

बल, बुद्धि, विद्या: जब ईश्वर स्त्री था

कुछ महीने पहले जब इंग्लैंड में था तो बी बी सी पर एक प्रोग्राम देखा था। नाम था 'व्हेन गॉड वास अ गर्ल' (when God was a Girl) यानी, जब इश्वर स्त्री था। बहुत ही बढ़िया रिसर्च पर आधारित कार्यक्रम था ये। इतिहास विद Bettany Hughes के रिसर्च पर आधारित और उन्हीं के द्वारा प्रस्तुत किया गया ये 3 एपिसोर्ड काफी मनमोहक थे। पर उससे भी ज़रूरी के ये सब मुझे उस सत्य कि याद दिला गया जो शायद हमारा समाज भूलता जा रहा है।

पूरी दुनिया घूम कर, काफी प्राचीन सभ्यताओं की छान बीन करके, ये बताया गया, कि करीब करीब सभी सभ्यताओं में नारियों की अराधना होती थी। 'थी' पर ध्यान दें। जी हाँ, वर्तमान परिवेश में अगर धर्मों पर ही सिर्फ ध्यान दें तो देखेंगे कि पुरुषों का बोलबाला है। हम जब भी भगवान् की बात करते हैं तो उसे पुरुष रूप में संबोधित करते हैं। 'इश्वर जो करता है ('करती है' नहीं) अच्छे के लिए करता है। अंग्रेजी का गॉड भी पुरुष है। हॉलीवुड की सभी फिल्मों में हम गॉड को पुरुष रूप में देखते हैं। सभी पैगम्बर भी पुरुष है। उनके साथ की महिलों के बारे में, बातों को या तो दबाया गया है या छुपाया गया है।

वर्तमान दुनियाँ में शायद कुछ ही ऐसी सभ्यताएँ हैं, संस्कृतियाँ हैं, जिनमें स्त्रियों को पूजा जाता हो। मेरे विचार से इसमें अग्रिणी है भारतीय संस्कृति। वो भी शायद इसलिए कि हमारी संस्कृति की प्राचीनता अभी भी बाकी है। हम अब भी धार्मिक रूप से स्त्रियों की पूजा करते हैं। पर सामाजिक रूप से?

बल चाहिए तो दुर्गा और काली माँ के सामने सर झुकाओ। 
बुद्धि और विद्या चाहिए तो सरस्वती माँ की अराधना करो। 
धन और समृद्धि चाहिए तो लक्ष्मी माता का आह्वाहन करो। 

सब स्त्रियाँ। दैनिक रूप से पूजा करते हैं हम इनमें से किसी न किसी की, या सब की। पर हमारी संस्कृति में ये ढकोसला क्यों? क्यों एक और स्त्री को सबसे ऊँचा पायदान देते हैं और दूसरी तरफ सबसे नीचा?

दिल्ली बलात्कार काण्ड या देश में अन्य बलात्कार कण्डों में आरोपित पुरुष क्या पूजा पाठ नहीं करते थे? क्या उन्होंने कभी नवरात्र या दुर्गा पूजा नहीं मनाया? क्या कभी दिवाली की पूजा नहीं की? क्या कभी सरस्वती पूजा में शामिल नहीं हुए? ज़रूर हुए होंगे। फिर क्यों ये नासमझी, इस प्राचीन संस्कृति और इस समाज की? क्या सिर्फ ढकोसली पूजा अर्चना से माताएँ प्रसन्न हो जायेंगी?

बिलकुल नहीं। जब तक ये पूजा, ये संस्कार, ये इज्ज़त हम अपने व्यवहार में नहीं लायेंगे तब तक माताएँ प्रसन्न नहीं होंगी।

मुझे गर्व है अपनी संस्कृति पर कि हम तन, मन और धन, हर चीज़ की पूर्ती के लिए देवियों, महिलाओं, स्त्रियों के आगे सर झुकाते हैं। हम ही वो संस्कृति हैं जो हज़ारों साल पहले भी ऐसा करते थे और अब भी ऐसा करते हैं। पर ये गर्व अधूरा है। ये पूरा तभी होगा जब हम अपनी संस्कृति को विचारों के भी धरातल पर लायेंगे। हमारी संस्कृति को बल, बुद्धि, विद्या और धन की प्राप्ति तभी होगी। महज़ साल के एक दिन मूर्ति बना कर उसे इज्ज़त देने से नहीं, जो साक्षात् साल भर हमारे आस पास होती है उसे इज्ज़त देने से।

ये बात न सिर्फ हम सब के लिए है बल्कि संस्कृति के उन ठेकेदारों के लिए भी है तो महिलाओं को दबा कर, छुपा कर, पीछे रख कर चलने को अपनी संस्कृति की रक्षा करने के पर्याय समझते हैं।

कुछ के लिए शायद इश्वर स्त्री था पर हमारे लिए तो इश्वर अब भी स्त्री है।

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