Thursday, 3 January 2013

1983 से 2013: लड़की की इज्ज़त

1 तारीख को गाँव गया हुआ था। मुखिया जी से मुलाक़ात हुई। नहीं नहीं, अभी नहीं हैं वो मुखिया। अब के मुखिया भी कोई मुखिया हैं। ये मुखियाजी 1983 में मुखिया हुआ करते थे। अब गाँव की सीट महिलाओं के लिए आरक्षित है। एक महिला मुखिया हैं अब। पति सारा काम-काज चलाते हैं।

पर गाँव की परंपरा है, भूतपुर्वों को भी लोग मुखियाजी कहके ही बुलाते हैं। खैर मुखियाजी अब सिर्फ गाँव के बुज़ुर्ग हैं। बड़ी ही सुखद मुलाक़ात थी ये। एक कहानी सुनाई उन्होंने। उस कहानी ने मुलाक़ात को और सुखद बना दिया, ख़ास कर के पिछले साल के अंत में हुई घटनाओं के परिवेश में।

तब मुखियाजी बुज़ुर्ग नहीं थे। उनके जवानी के दिन थे। आज कल के जवानों को तो आप देख ही रहे हैं। वैसे ही रहे होंगे अपने मुखियाजी। तब टी टी कॉलेज में ओनर्स के छात्र थे मुखिया जी। तब भूषण जी नहीं, भूषण हुआ करते थे। एक दिन  क्लास करने जा रहे थे। सामने सीढ़ी पर 3-4 जूनियर लडकियाँ बैठी थीं। ये छोटा सा शहर है बिहार का। आम तौर पर हर छोटे शहर की तरह यहाँ भी लडकियाँ सलवार सूट पहन कर घूमती हैं। फिर ये तो 1980 की बात है। ये लडकियाँ भी उसी परिधान में थीं। परन्तु उस ज़माने में भी इनमें से एक लड़की पैन्ट्स पहने हुए थी।

भूषण ने सामने सीढ़ी पर लड़कियों को बैठा देखा। जाने की जगह नहीं बची थी। भूषण ने आगे की दूसरी सीढ़ी से जाना ही बेहतर समझा। वो रास्ता लम्बा था मगर इस रस्ते पर लड़कियों से एनकाउंटर करना पड़ता। खैर भूषण आगे बढ़ गया। लडकियाँ समझ गयीं कि उनसे बच कर जाने की फिराक में भूषण आगे बढ़ गया है। शायद लड़कियों की मंशा भी मज़ाक करने की ही थी। ऐसी हंसी ठिठोली से ही तो कॉलेज कॉलेज लगता है।

भूषण को लम्बे रास्ते से भेजने की मंशा नहीं थी लड़कियों की। सो वो हँसते हुए उठ कर भागने लगीं। भूषण ने मुड़ कर देखा और लौटने लगा। इतने में भागने वाली पैन्ट्स वाली लड़की की पैन्ट्स पीछे से फट गयी। हड़बड़ी में गड़बड़ी। लड़की जहाँ थी वहीँ बैठ गई। भूषण उसके पास पंहुचा। पूछा, "क्या हुआ, सब भाग गईं, तुम क्यों बैठी हो?" आज कल के समय को देखते हुए और आज कल घटती घटनाओं के बारे में सोचते हुए शायद हम सब अंदाजा लगा सकते हैं कि आगे क्या हुआ होगा।

खैर आगे सुनिए।

लड़की ने भूषण को पैन्ट्स के बारे में बताया। शायद सर्दी का वक्त था तब। भूषण के पास एक चादर थी। उसने चादर लड़की को दे दी और कहा कमर से नीचे लपेट लेने को। फिर भूषण ने 10 रुपये निकाले और लड़की को देते हुए कहा, "चादर लपेट कर पैदल तो नहीं जाओगी घर तक। लोग रास्ते भर तुम्हें ही देखते रहेंगे। सो रिक्शे से जाओ।" यहाँ पर हुई एक नए रिश्ते की शुरुआत। आप तो समझ ही रहे होंगे कौन सा रिश्ता।

खैर ये मदद पा कर लड़की की जान में जान आई। घर जा कर माँ को वाक्या बताया तो माँ ने कहा,"ज़रूर किसी अच्छे गाँव का लड़का होगा।" जी हाँ, तब गाँव के गाँव अच्छे हुआ करते थे। अब वो समय नहीं रहा। किसी गाँव पर अच्छे का तमगा नहीं लगा सकते हैं। कुछ लोग अच्छे भले होंगे। पर पूरा गाँव। न।

अगले दिन चादर धो कर और इस्तिरी कर के ले आई लड़की। भूषण अपने एक शिक्षक से बातें कर रहा था। तभी आकर धन्यवाद करते हुए चादर लौटाया लड़की ने। भूषण के शिक्षक थोड़े रंगीन मिजाज़ के थे। थोड़ा मज़ा लेते हुए पुछा,"कौन थी ये लड़की"
भूषण,"जी बहन थी। चादर लौटाने वाली बहन ही तो होगी और कौन होगी।"

जी यही था वो नया रिश्ता। बहन हो गयी वो भूषण की। उस दिन के बाद शायद भूषण की कभी बात नहीं हुई उस लड़की से। पर रिश्ता तो बन गया। एक पवित्र रिश्ता।

वो था 1983 और ये है 2013. समाज बहुत बदल गया है। लोग बहुत बहुत बदल गए हैं। रिश्ते बहुत बदल गए हैं। भूषण से वो मुखियाजी हो गए, लेकिन इंसान अब भी वही हैं।

4 comments:

  1. सच तब और अब में जमीन आसमान का फर्क है ....
    बहुत बढ़िया ..

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  2. वक्त बदला पर अपने नैतिक संस्कारो को ले डूबा।
    https://plus.google.com/app/basic/112760643639266649999/about
    मेरा ब्लोग
    http://yuvaam.blogspot.com/2013_01_01_archive.html?m=0

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  3. अभी तो मेट्रो में किसी को बहनजी कहकर बुला लो फ़िर देखो रियेक्शन। FICCI meet में नरेन्द्र मोदी के भाषण के बाद एक hey girl ने एक पत्रकार से इस बात की शिकायत भी की थी ’why he is calling us maataao aur bahnon in every second sentence'

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