Wednesday, 23 January 2013

राजा पहले या राज्य

कुछ  दिन पहले राजकुमार ने राजा बनने की ओर एक और कदम बढ़ाया। समर्थकों से भरे एक हॉल में काफी छू जाने वाला भाषण दिया। काफी लोग रो पड़े। भाषण एक घंटे से थोड़ा ज्यादा का था और टीवी पर शायद उसका सीधा प्रसारण हो रहा था। मैं नहीं देख पाया। सरकार राज में हमारे यहाँ हमेशा बिजली नहीं रहती है। भारत में सरकार तो कुमार की पार्टी की ही हैं पर हमारी बिजली की स्थिति में उनकी कोई गलती नहीं है। वो तो स्वयं ही व्यवस्था का परिवर्तन करना चाहते हैं। अभी की व्यवस्था में उनका कोई योगदान नहीं है।

खैर जब बिजली आई तो मैंने समाचार चैनलों का रुख किया। वहां से मालूम हुआ कि कुछ लोग अब भी रो रहे हैं, भाषण में कही गई बातों को याद कर के। एक बात, जो कई लोगों ने दोहराई और जिसका वीडियो भी कई बार दिखाया गया, थी राजमाता की मृत्यु से जुडी घटनाओं का जिक्र। वो बात मेरे दिल में भी घर कर गयी।

बात 1984 की है। तब राजकुमार काफी छोटे थे। राजमाता तब देश का राज काज चलाती थी। राजमाता के कई रक्षक थे जो राजकुमार के साथ खेल भी करते थे (जैसा कि अक्सर हिन्दुस्तान में होता है)। राजकुमार को बैडमिंटन खेलने का शौक था क्योंकि बैडमिंटन संतुलन सिखाता है। राजमाता के रक्षक (बॉडीगार्ड) राजकुमार के दोस्त थे, उनके साथ बैडमिंटन खेला करते थे। वही बैडमिंटन जो संतुलन सिखाता है। और उसी रक्षक ने एक दिन राजमाता की हत्या कर दी। रक्षक भक्षक बन गया। राजकुमार के जीवन का संतुलन बिगाड़ दिया।

बहुत मर्मस्पर्शी था ये वाक्या। हृदयविदारक। जो राजकुमार के जीवन में संतुलन लाने में मदद कर रहा था उसी ने संतुलन बिगाड़ दिया। ये खुद से सम्बंधित वाक्या बता कर कई लोगों का दिल जीत लिया उन्होंने।

परन्तु इन सब में एक बात रह गई। वो लोग जो राजमाता के रक्षक थे अचानक भक्षक कैसे बन गए? वो जो राजकुमार के दोस्त थे अचानक दुश्मन कैसे बन गए? वो जिनका संतुलित जीवन चल रहा था, अपने जीवन का संतुलन बिगाड़ने पर उतारू कैसे हो गए? क्या वो वाक्या सिर्फ राजकुमार के दुःख तक ही सीमित है या उससे पहले और उसके बाद देश में कुछ ऐसी घटनाएं हुईं थी जिनकी जिम्मेदारी भी राजमाता और उनके साथ के लोगों की ही थी? क्या इस वाकये का ज़िक्र करते हुए सिर्फ अपने व्यक्तिगत घाटे की ही बात करनी ज़रूरी थी? ख़ास कर ऐसे मौके पर जब राजकुमार को देश की कमान संभालने के लिए आगे बढ़ाया जा रहा है।

क्या ऐसे मौके पर उन्हें उन गलतियों पर भी मंथन नहीं करना चाहिए था जिनके कारण उन रक्षकों और उनके जैसे और लोगों के जीवन का संतुलन बिगड़ गया? क्या इस बात पर भी मंथन नहीं करना चाहिए था कि क्यों रक्षक भक्षक बन गया? क्या उन परिस्थितियों को उस समय का राजतंत्र बेहतर ढंग से संभाल सकता था? आगे अगर ऐसी परिस्थितियाँ आएँ तो क्या उनके बेहतर ढंग से संभाला जा सकेगा?

राजा के जीवन के संतुलन पर मंथन ज्यादा आवश्यक था या राज्य के? आप ही फैसला कीजिये 

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