Sunday, 27 January 2013

लता जी के उस गीत से इस गीत तक...

थोड़ा देर से ही सही पर सभी देश वासियों को गणतंत्र दिवस की हार्दिक सुभकामनाएँ। कल कुछ लिखना चाहता था परन्तु आधा दिन तो भारतीय गणतंत्र के बारे में सोचते सोचते निकल गया और बाकी इन्टरनेट से जूझते जूझते। खैर....

कल शायद चौसठवां (64) गणतंत्र दिवस था। सुना किसी राज्य सरकार के कार्यक्रम में तिरसठवां (63) लिखा हुआ पाया गया और इस बात पर काफी हंगामा मचा। माफ़ कर दो भईया उनको। शायद वो भी हमारी तरह गणित में कमज़ोर होंगे। होता है ऐसा।

खैर मैं तो कल टीवी पर देख रहा था कि लताजी के द्वारा गाया गया एक गीत "ए मेरे वतन के लोगों" कल 50 वर्षों का हो गया।

ए मेरे वतन के लोगों (सौजन्य से: यू ट्यूब) 

बचपन से ही सुनता आ रहा हूँ ये गीत (जी मैं 50 साल से कम उम्र का हूँ). साल में 2 बार स्कूल में बजा करता था। 15 अगस्त और 26 जनवरी को। जब भी सुनता हूँ, भाव विभोर हो जाता हूँ। किसी ने कल टीवी पर सच ही कहा था, ये गीत सुनते ही रोंगटे खड़े हो जाते हैं। जब ये गीत लिखा और गाया गया था तब मौका भी कुछ ऐसा था। भारतीय सेना के न जाने कितने जवान सीमा पर चीनी सेना से लड़ते हुए शहीद हुए थे। सेना और देश का मनोबल गिरा हुआ था। पर इस गीत ने सबमें नई स्फूर्ति का संचार किया। चाचा नेहरु ने स्वयं इस गीत की सराहना की थी और कहा था की उनकी आँखों में भी इसे सुन कर आंसू आ गए थे। जी तब नेता भी लोगों के भाव को समझते और सराहते थे।

कल काफी चर्चा रही इस गीत की। परंपरा के मुताबिक़ हर जगह बजता भी सुनाई दिया ये गीत। पर इस गीत को सुनते हुए मुझे लता जी के एक दूसरे गीत कि याद आ रही थी, "वनदे मातरम्"।

"वनदे मातरम्" (सौजन्य से: यू ट्यूब)

ये दूसरा गीत लता जी ने कुछ वर्षों पहले गाया था। परन्तु आज देश जहाँ है वहां, शायद लता जी के 50 वर्ष पुराने गीत को छोड़ कर ये नया गीत सुनने की आवश्यकता लगती है मुझे। इसलिए नहीं कि मेरी नज़र में पुराने की कोई कीमत नहीं है। मैं तो मानता हूँ कि ओल्ड इस गोल्ड। पर जहाँ "ए मेरे वतन के लोगों" हमें उन जवानों के बलिदान को याद दिलाता है, वहीँ 'वनदे मातरम्" हमें याद दिलाता है कि आज देश को हमारी ज़रुरत हैं। ये गीत हमसे कहता है कि आज विचार करने की ज़रुरत है कि हमारा देश कहाँ तक पहुंचा है, हमारे देश का कैसा नाम हैं विश्व पटल पर। हमें पुकारता है बलिदान के लिए ये गीत। हमें पुकारता है सही राह पर चलने के लिए ये गीत। शायद आज वक्त इसी का है। बस हम ये देख कर गर्व न करें करें कि हमारे देश के और लोगों ने देश के लिए क्या किया, हमारी फ़ौज ने कितने बलिदान दिए। जो हमने देश के लिए किया है हम उसपर गर्व करें। हम कदम आगे बढ़ाएँ और देश का गर्व बाधाएँ। शायद ये गीत सुनने की आवश्यकता आज के नेताओं को भी है। शायद समय के परिचायक इस गीत को सुन कर चाचा नेहरु कि तरह उनकी आँखों में भी आंसू आ जाएँ। हो सकता है वो भी देश के बारे में कुछ विचार करें। शायद ये वर्तमान परिवेश का गीत हम सब को प्रेरित करे।

मेरे विचार से वक्त आ गया है उस गीत से इस गीत की ओर  बढ़ने का। समय आ गया है कुछ करने का। 

No comments:

Post a Comment